सप्तवर्ग के फल(ग्रह बल)

मुख्यतः सप्तवर्ग के फल का विचार ग्रह के बल जानने के उद्देश्य से ही किया जाता है, कि ग्रह में शुभ या अशुभ फल देने की कितनी सामर्थ्य है.

आपने अनेक जगह देखा पढ़ा सुना होगा की तुम्हारा तो फलां ग्रह कमजोर है या पीड़ित है लेकिन ये कोई भी कहीं नहीं बताता की ऐसा कैसे होता है.जब हम ग्रहो को अलग अलग अंशात्मक श्रेणियों में रखते है तो इन श्रेणियों के भारतीय ज्योतिष साहित्य में नाम रखे गए है उन्हें ही वर्ग कहते है इसी के आधार पर ग्रहो के सप्तवर्ग के फल का निरूपण किया गया है.

यो तो वर्ग अनेक है यथा षड्वर्ग,सप्तवर्ग,दश्वर्ग,षोडश वर्ग. लेकिन हम यहाँ केवल सप्त वर्ग के ही फलो का वर्णन करेंगे.

लगन

वर्गों के फल (लग्न)
वर्गों के फल(लग्न)

कुंडली में लगन का विचार देह सुख से होता है. विभिन्न भावो से सम्बंधित जातक को कैसे सुख प्राप्त होंगे इसका विचार ही लग्न कुंडली का उद्देश्य होता है. इसी से व्यक्ति का चरित्र भी ज्ञात किया जा सकता है.

होरा

होरा लग्न से व्यक्ति की आर्थिक और प्रकृतिक सम्पदा का विचार किया जाता है. सूर्य की होरा में जन्म होतो व्यक्ति में पौरुष और क्रूरता यदि सूर्य बलि ग्रह से भी युक्त हो. इसके उलट यदि चन्द्र की होरा में जन्म हो तो स्त्रियों के सामान सोम्य व् पौरुष हीन होगा. विशेषकर पुरुषो का सूर्य होरा में और स्त्रियों का चंदर होरा में लग्न हो तो प्राकृतिक दृष्टि से अच्छा है. इसके विपरीत स्त्री की कुंडली में बलवान सूर्य की होरा हो तो उसका चरित्र पुरुष तुल्य और चन्द्र की होरा में पुरुष का लग्न हो तो वह स्त्री तुल्य होता है.

होरा सारिणी
राशी 1-3-5-7-9-112-4-6-8-10-12होरा पति
15 अन्श तक 5 4 देव
15 से 30 अंश तक 4 5 पितर

सप्तवर्ग के फल

आर्थिक रूप से संलग्न में चंद्रमा की होरा और विषम लग्न में भी चन्द्र की होरा होना शुभ है. मतलब ये की चन्द्र होरा में जन्मा जातक संपन्न और सूर्य की होरा में निर्धन होगा. भावार्थ ये की समलग्न में 15 अंश के अन्दर और विषम लग्न में 15 अंश के बाद जन्म शुभ होता है.

चंद्रमा का सूर्य की होरा में होना कष्टपूर्ण ,दरिद्रता सूचक है. सूर्य चन्द्र स्वयं की होरा में हो तो शुभ होते है. सूर्य चंद्रमा की होरा में भी हो तो शुभ है. सूर्य की होरा में पाप ग्रह हो तो सम्पन्नता सूचक है पर चन्द्र की होरा में पाप ग्रह शुभ नहीं होते. चंद्रमा की होरा में शुभ ग्रह सम्पन्नता सूचक होते है.

द्रेष्कान

द्रेष्कान से जीवन में उच्च पदवी या कर्मो के फलो का विचार किया जाता है. कोई अपने प्रयासों से कितने ऊँचे उठेगा कितना प्रयास करेगा यह द्रेष्कान से पता चलता है. द्रेष्कान कुंडली में जो ग्रह स्वे क्षेत्री, उच्च, मित्र क्षेत्री होकर केंद्र में होतो वेह उन्नति करता है और इस प्रकार के ग्रहो को देख कर उसके पड़ प्राप्त कने का अनुमान किया जा सकता है.

जन्म लग्न से दशमेश किस स्थान में है इसका विचार करना चाहिए. द्रेष्कान कुंडली में त्रिकोण स्थित या पणफर(2-5-8-11 भाव) में स्थित ग्रह भी शुभ होते है.लेकिन अपोक्लिम (3-6-9-12) में शुभ नहीं होते है. ऐसे बलहीन ग्रह अपनी दशा में अवनति देते है.

हमारे सहयोगी कैसे होंगे और लोग हमारा सहयोग कैसे करेंगे,इसका विचार भी द्रेश्कन लग्न में तीसरे भाव और जन्म लग्न से तीसरे भाव के स्वामी की द्रेष्कान में स्थिति से ज्ञात किया जा सकता है .

द्रेष्कान से ही भाई बहनों का भी विचार किया जा सकता है. जन्म लग्न से तृतीयेश द्रेष्कान में तीसरी राशी, द्रेइश्कन लग्न का स्वामी जिस राशी में हो – इनकी संख्या और बला बल के विचार से भाई बहनों की संख्या भी बताई जा सकती है. और उनका सुख दुःख भी . इसके prediction की सफलता हमारे निरंतर अभ्यास पर निर्भर है.

जिनका द्रेष्कान लग्न क्रूर( सूर्य, मंगल,शनि) की राशियों वे लोग दुष्ट प्रकृति के होते है. द्रेष्कान के आधार पर ही रोग, घाव, टिल, आदि चिन्ह जेल आदि बंधन का योग, तथा मौत का कारण बताया जा सकता है.

सप्तांश

कुछ पुराने आचार्य भाई – बहनों का विचार सप्तांश लग्न से करने को कहते है. इसके अतिरिक्त कामधंधे में लाभ का विचार भी सप्तांश से होता है. आचार्य बुद्धि और रंग का विचार भी सप्तांश से करने को कह गए है. और अन्य बंधुओ,बहनों,का विचार भी सप्तांश से ही होता है.

सप्तवर्ग के फल

जन्कुंदाली के तृतीयेश के की सप्तांश कुंडली में स्थिति और सप्तांश कुंडली के तृतीयेश की स्थिति और उनकी स्थित राशियों से भाई बहनों की संख्या उनका सुख दुःख तथा बंधू आदि सुखो की काल्पना करनी चाहिए. और सप्तांश कुंडली के अन्य बलि ग्रहो से जो तीसरे भाव को देखे भाइयो के बारे में कहना चाहिए.

सप्तांश कुंडली में ग्रह स्वग्रही , उच्च, मित्रक्षेत्री होकर शुभ जगह बैठे हो तो धन स्थिति को मजबूत करते है.सप्तांश से संतान का भी विचार होता है. जितने ग्रह सप्तांश लग्न को देखे उतनी संतान कहना चाहिए.सप्तांश लग्न विषम बलि (odd sign) तो पुत्र तथा सम हो कर बलि हो तो कन्याओ की अधिकता अथवा पहली संतान तदनुसार पुत्र या पुत्री कहना चाहिए.

किन्ही अन्य आचार्यो का मत है की जातक के शारीर का आकार और बुद्धि का विचार भी सप्तांश लग्न से या सप्तांश लग्न के स्वामी से करना चाहिए.

नवमांश

नवमांश एक तरह से सप्तवर्ग की जान है. लग्न कुंडली यदि शारीर है तो नवमाश कुंडली शरीर का प्राण है. नवांश कुंडली देखने पर ज्ञात होगा की कोनसा ग्रह किस नवांश में है. फल का अनुमान लगाने में इसकी हर जगह जरूरत पड़ती है. अतः नवमांश से कोई भी विषय अछूता नहीं है. इसके हर जगह जरुरत है.

जैसे संतान,आजीविका, दाम्पत्य,शारीर का रूप रंग गुण बुद्धि का विचार मुख्य रूप से होता है.

जन्म लग्न का पंचमेश,नवांश लग्न का पंचमेश,इन दोनों के स्थित भाव और राशी से लग्न से नवांश लग्न की पंचम राशी से और पंचम पर बलि ग्रहो की दृष्टि से संतान उनकी संख्या , उनके सुखदुख की कल्पना की जाती है. इसको अभ्यास द्वारा साधा जाता है. बलबल से विचार जाता है.

पीछे वर्णित सप्तमांश की तरह है नवमांश लग्न व उसके स्वामी से शारीर का रंग , रूप,तथा गुणों, को कहा जाता है. जन्म लग्न से पंचमेश का नवांश,नवांश लग्न से पंचम भाव व् पंचमेश की स्थिति के अनुसार बुद्धि तथा विद्या का विचार किया जाता है.

जन्म लग्न से दशमेश जिस नवांश में हो उसके अनुसार रोजगार बताया जाता है. इसका सटीक वर्णन जातक पारिजात और वृहज्जातक जैसे फलित ग्रंथो में वर्णन मिलता है.

नवांश लग्न के सप्तम भाव की राशी ,उसके स्वामी,और जन्म लग्न से सप्तमेश की स्थिति से स्त्री को पति , और पति को स्त्री कैसी मिलेगी का सहज अनुमान लगाया जा सकता है. विवाह का समय उसका सुख दुःख कहा जाता है.

दवाद्शांश

इसके द्वारा स्वास्थ्य व् आयु का विचार होता है. कुछ लोग इससे पत्नी का विचार भी करते है. दवाद्शांश लग्न से सप्तमेश और सप्तम भाव के शुभ या पाप, बलि या दुर्बल जैसा भी हो के सुख दुःख की कल्पना करनी चाहिए.

इसी तरह दवाद्शांश का लग्न और लग्नेश शुभ और बलि हो तो शारीर सुख उत्तम लम्बी आयु और इसके उलट निर्बल व् क्रूर होने से रोगी तथा अल्पायु करते है.

त्रिशांश

त्रिशांश का विचार मुख्या रूप से स्त्रियों के लिए किया जाता है. फलित के ग्रंथो में औरतो के व्यव्हार स्वाभाव विचार स्त्रिजटका अध्याय में लग्न और चंद्रमा के त्रिशांश से ही किया जाता है.

मृत्यु का विचार ऊपर जैसे द्रेष्कान से बता आये है. इसी तरह त्रिशांश से भी मृत्यु का विचार होता है. त्रिशांश लग्न के अष्टम भाव में स्थित राशी से मृत्यु का पता लगाया जाता है की मृत्यु सुख पूर्वक स्वाभाविक होगी या फिर दुर्घटना वश. अष्टम राशी अष्टम ग्रह अष्टमेश में जो भी बलवान हो उसके तुल्य धातु, रोग,से मृत्यु होगी.जो फलित ग्रंथो में वर्णित है.

त्रिशांश लग्न से भी विचार मरना चाहिए. आठवे मंगल,सूर्य, राहू,आदि पाप ग्रह दुर्घटना से मृत्यु करवाते है. गुरु के साथ शुक्र अष्टम में होतो विष के सवार मृत्यु होती है.

यहाँ मैंने सप्तवर्ग के फल का संशिप्त वर्णन किया है यदि आप जिज्ञासु हो तो विशेष अनुभव के लिए फलित ग्रंथो के द्वारा शोडश वर्ग तक के वर्गों का अध्ययन कर सकते हो.

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