शादी के बाधक योग

शादी के बाधक योग
शादी के बाधक योग

बड़ी मेहनत से तलाशे गए वर – वधु के लिए “शादी के बाधक योग” कैसे-कैसे व्यवधान प्रस्तुत करते है यह तो कुंडली देखने पर ही पता चलता है.

शादी के बाधक योग के बारे में संपूर्ण रूप से यहाँ लिखना सम्भव नहीं। फिर भी विवाह किस समय किस मुहूर्त में करना चाहिए यह लिखा जा रहा है।

मांगलिक विचार का निदान (Mash solution)

विवाह के समय जन्म पत्रिका में अन्य विचार विमर्श के साथ ही जातक के मंगली होने की दशा में जातक के माता-पिता विशेष चिंतित हो जाते है. अत मंगल दोष के विविध पहलुओ पर विचार करना चाहिए. मंगल दोष को कुज दोष भी कहते है.

दोष

ज्योतिषियों की अज्ञानता के कारण कभी – कभी अमंगलिक जन्मपत्रिका को भी मांगलिक बताकर विवाह में रोक लगा दी जाती है. अत इस पर विचार करना आवश्यक है .

जन्म पत्रिका के लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव, एवं दवादश भाव, में से किसी भाव में मंगल का होना जनम पत्रिका को मांगलिक बना देता है. इस दोष से प्रभावित जातक को मौली या मंगला तथा लड़की को मांगली या चुनरी स्थान भेद से माना जाता है.

आजकल कल के सभी अच्छे पंचांगों में विवाह तिथि आदि का पूरा विवरण दिया रहता है। आशा है की उससे काम चल जाएगा। साधारण बात यह है कि रोहिणी, मृग्शिरा, मघा, स्वाती, अनुराधा, मूल, तीनों उत्तरा और रेवती विवाह के विहित नक्षत्र है पर जन्म नक्षत्र को त्यागना होता है। 4,9,15 और पूर्णिमा के अरिक्ति अन्य तिथियाँ शुभ हैं पर जन्म तिथि न हो। सोमवार, बुधवार , गुरूवार, और शुक्रवार उत्तम हैं। विवाह लग्न से शुक्र, बृहस्पति और बुध, केन्द्र व त्रिकोण में हों पर सप्तम, ग्रह रहित हो। ज्येष्ठ पुत्र ज्येष्ठ कन्या और ज्येष्ठ मास इन तीनो का रहना बिल्कुल मना है। यदि दो हों तो मध्यम कहा गया है।ृ

विवाह योग-

1-अगर सप्तमेंश शुभ ना हेा और छठे आठवे और बारहवें भाव में नीच राशि में बैठा हेा तो पत्नी सुख से वंचित रहती है।

2-यदि छठे, आठवे और बारहवे भाव के स्वामी सातवे भाव में हों और सप्तम भाव पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी ना हेा, या सप्तमाधिपति छठे, आठवे , बारहवे भाव का भी स्वामी हो तो स्त्री सुख में बाधा होती है।

3-यदि सप्तमेश बारहवें भाव में हो लग्नेश या चंद्र लग्नेश (चंद्र राशि का स्वामी) सातवें भाव में हो तो पत्नी सुख में बाधा होती है।

4- शुक्र, चंद्र कुंडली में कही भी हो और शनि वं मंगल उनसे सातवें हों तो जातक का विवाह नहीं होता है।

5- यदि 1-7-12 में पाप ग्रह बैठे हों और पंचम में चंद्र निर्बल हो तो जातक का विवाह नहीं होता।

6-शनि चंद्र से सप्तमस्थ होने से जातक का विवाह नहीं होता है।

7- सातवे पाप ग्रह के रहने से मनुष्य को स्त्री सुख में बाधा होती है।

8- शुक्र, बुध सातवे हों तो व्यक्ति पत्नी हीन होता है।

9- अगर लग्न से या चंद्र से सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों तो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो विवाह सुख

होता है।

10- सूर्य स्पष्ट में रा 4/अं 13/क 20 जोड़ कर जो राशि आए वह धूम होता है। अगर यही सातवें स्थान का स्पष्ट हो तो व्यक्ति का विवाह नहीं होता है।

11-यदि शुक्र, मंगल सातवें हों तो व्यक्ति पत्नि रहित होता हैं। शुक्र मंगल के नवम पंचम रहने पर भी यही फल कहा गया है।

12- शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ होकर पंचम सप्तम, अथवा नवम भाव में बैठा हो तो जातक का विवाह नहीं होता है।या वह स्त्री वियोग से पीड़ित रहता है।

यदि शुक्र, बुध, और शनि सब नीच या शत्रु नवांश में हों तो जातक स्त्री एवं संतान रहित होता है।

अत किसी विद्वान् ज्योतिषी से जन्मपत्रिका के दोष – गुणों का निराकरण करवाकर संशय निदान करवा कर विवाह कार्य संपन्न करना चईये.

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