शनि शुभ या अशुभ

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शनि   शुभ  या  अशुभ
शनि शुभ या अशुभ

कुंडली हाथ में आते ही पहला डर ये ही लगा रहता कि पता नहीं शनि शुभ या अशुभ कैसा होगा कुंडली में इसका प्रभाव.आइये जाने.

शनि शुभ या अशुभ

शनि ग्रह के बारे में प्रायः आम धारणा ये है कि शनि तो अशुभ ही होता है। लेकिन क्या वाकई में एइसा ही है.इसीलिये जब किसी बुरी स्थिति या व्यक्ति का उल्लेख होता है तो लोक भाषा में कहते हैं – मेरे तो शनि पीछे पड़ गया। या आ गया शनिचर।इसी लिए हम यहाँ वर्णन कर रहे है शनि शुभ या अशुभ का प्रायः स्थिति ऐसी नहीं हैं ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार शनि कई स्थितियों में अच्छा और कल्याणकारी भी माना गया है।

कंुडली के अलग-अलग स्थानों में बैठ कर मंगल जातक को मंगली बना देता है, यदि शनि भी उन्हीं स्थानों में बैठ जाता है तो मंगली दोष नहीं रहता है।

शनि की स्थितियों के बारे में कहा गया है यदि यह छठे भाव में बैठ जाए तो शत्रुओं से सुरक्षा दिलाता है। यदि आठवें (मृत्यु) भाव में बैठ जाए तो जातक की आयु में वृद्धि करता हुआ वृद्धावस्था तक मृत्यु का भय नहीं रहने देता है।

मंद गति ग्रह

शनि का नाम वस्तुतः उसकी कांति हीनता एवं अत्यंत धीरे चलने के कारण ही शनि या शनैश्चर रखा गया। फारसी में झाहल और अंग्रेजी में सैटर्न नाम से जाना जाता है। इसका व्यास 75000मील है तथा पृथ्वी से इसकी दूरी लगभग नवासी करोड़ मील है। 295 वर्षों मेें यह सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है।

यह ग्रह अपने से तीसरे, सातवें, और दसवें भाव को संपूर्ण दृष्टि से देखता है। इसकी विंशोत्तरी दशा 19 वर्षों तक रहती है। नीलम अथवा लोहे का छल्ला धारण करने से इसकी अनिष्टता में कमी आती है। शनि से वायु-विकार, मृत्यु, चोरी-डाका, हानि, त्यागपत्र तस्करी, जासूसी एवं राजनीति का अध्ययन किया जाता है।

शनि शुभ या अशुभ

यह सूर्य तथा मंगल से अधिक अशुभ फल दायी तथा राहू की अपेक्षा, कम अशुभ है। इसके (शनि के ) बुध, शुक्र तथा राहू मित्र हैं। बृहस्पति समभाव वाला तथा रवि, चंद्र और मंगल शत्रु है।

यह तुला राशि में 20 अंश तक उच्च होता है। लेकिन मेंष राशि में 20 अंश तक नीच होता है।यह कुंभ और मकर राशि में स्वगृही और कुंभ में मूल त्रिकोण में होता है।यह स्वगृही एवं मित्र क्षेत्री होने पर बली और नीच क्षेत्री होने पर निर्बल होता है।

शनिवार के दिन जन्मा व्यक्ति स्थिर वचन वाला, क्रूर, दुष्ट स्वभाव, पराक्रमी, नीच दृष्टि, विकृत नख अधिक केश वाला होता है।

द्वितीय भावस्थ शनि यदि स्वगृही न हो तो जातक धनहीन, परेशान, एवं दुखी रहता है। द्वितीय भाव में यदि मकर या कंुभ राशि में हो तो जातक की बाल्यावस्था अभावों एवं दुखों में व्यतीत होती है। किंतु युवावस्था एवं वृद्धावस्था में धन का अभाव नहीं रहता है।

शनि शुभ या अशुभ

तृतीय भाव शनि वालों के या तो छोटे भाई होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं तो उनसे जातक को कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है। ऐसा व्यक्ति भयंकर से भयंकर कार्य करने में नहीं हिचकता। यद्यपि जीवन पर्यंत संघर्षों से घिरा रहता है लेकिन कठिन परिश्रम द्वारा भाग्य को अपने अनुकूल बना लेता है।

चतुर्थ भावस्थ शनि व्यक्ति को बंधु स्त्री तथा नौकरों से हीन एवं रोगी बनाता है। यदि शनि वक्री हो तो दूसरे गांव या जगह में रहकर दुख पाता है।

पंचम भाव में स्थित शनि जातक को दुखी बनाता हैं

षष्ठम भाव में यह व्यक्ति को साहसी एवं लड़ाकू स्वभाव का बनाता है। मित्रों की ओर से धोखा खाना पड़ता हैै। यदि मंगल भी साथ में हो तो पेट का आपरेशन भी होना हेाता है। छठे भाव में तुला राशिस्थ शनि जातक के सम्मान में भी वृद्धि करवाता है तथा कुंटुम्ब के विस्तार में भी सहायक होता है।

शुभ फलदायक:‘शनि’

सप्तम भाव में स्थित शनि अति शुभ फलदायक होता हैं।

आठवें भाव में यह दीर्घ आयु प्रदान करता है। किंतु जातक को अपने घर से दूर रहकर आजीविका प्राप्त करने में कष्ट उठाना पड़ता हैं यदि शनि क्षीण होता हैं तो चोरी का अपराध लगता हैं।

नवें भाव का शनि श्रम के बल पर उन्नति दिलाता है।

दशम भावस्थ शनि व्यक्ति को धनी नौकरी में प्रगति तथा रहन-सहन में प्रदर्शन करने वाला बनाता हैं यात्राएं अधिक तथा प्रौढावस्था में सुख होता है।

ग्यारहवें भाव में शनि जातक को धनी विवेकी बहु भोगी शांतिप्रिय प्रसन्न तथा सुशील बनाता है।ऐसा व्यक्ति वैसे बाल अवस्था में रोगी रहता है लेकिन परिवार में सम्मान और छत्तीसवें वर्ष के उपरांत भाग्योदय होता है।

बारहवे भाव में शनि जातक को रोगी, दुर्बल देह, धनी, विख्यात, समाज में लोकप्रिय यात्रा में लाभ एवं स्वतंत्र व्यवसाय में सफल बनाता है।

शनि ग्रह की शांति एवं उपाय

जब यह ग्रह प्रतिकूल फल दे रहा हो यथा विंशोत्तरी दशा क्रम में शनि की महादशा, साथ ही शनि की अंतर्दशाएं, अथवा शनि की साढ़े साती या ढैया का समय इत्यादि अवधियों में व्यक्ति को इस की ग्रह शांति हेतू मंत्र जप करना अथवा कराना चाहिए।

साधारण स्थिति में मृत्यृंजय महामंत्र का जाप अथवा ‘ऊं प्रां प्रिं प्रौं सः शनैश्चराय नमः’ इस मंत्र का नित्य दोपहर में जप करना चाहिए। असाधारण (मारकेश जैसी) स्थिति में ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का अधिकाधिक संख्या में जाप करना चाहिए। इसके अतिरिक्त पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा, हनुमान चालीसा का पाठ, संुदर कांड का पाठ एवं श्री राम नाम का जप भी लाभकारी होता है।

नीलम रत्न या नाव की कील का अथवा काले घोड़े की नाल से बना हुआ लोहे का छल्ला शनि अंगुली अर्थात मध्यमा में धारण करें। सात्विक एवं सादा भोजन करना चाहिए। तिल एवं तेल का उपयोग करना चाहिए।

शनिवार को काले तिल, लोहा, काले कपड़े मंे बांध कर सिर में सात बार घुमाकर सद्क्षिणा दान करें। इसी दिन सांयकाल पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जला दें।

शनि पूजा अथवा दानादि के बाद हाथ पैर धोकर ही घर में प्रतिष्ठ होना चाहिए।

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