वर्गों का महत्व

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षड्वर्ग
वर्गों का महत्व


ज्योतिष में वर्गों का महत्व से यह पता चलता है कि कौन सा ग्रह कितने वर्गों में कितना प्रभावशाली व कार्यकुशल है।

वर्गों का उदाहरण

जैसे किसी आम के पेड़ पर अनेक आम लगते हैं लेकिन कोई आम मीठा व कोई खट्टा होता है उसी प्रकार से ज्योतिष में कंुडली के वर्गों का है।

यदि कोई ग्रह जिस भाव के निकट होगा वह उस भाव के लिए उतना ही शुभ और फलदायक होगा। जितना ग्रह भाव से दूर होगा वह उतना ही उस भाव का कम फल देगा। जो ग्रह दो भावों की संधि पर होगा वह प्रायः निष्फल ही होता है। वह किसी भी भाव का फल करने में सक्षम नहीं होता है।

अब हम बात करते है उस विषय की जिसके लिए हम यहाँ आए हैं। ज्योतिष में वर्गों की बात करें तो छह या सात वर्ग ऐसे जिनका ज्योतिष में विशेष महत्त्व है। वे हैं

1 लग्न भाव- इसमें शरीर से संबंधित बातों का विचार किया जाता हैं ।

2 होरा – इसमें व्यक्ति की धन सम्पत्ति का विचार किया जाता है।

3 द्रेष्काण- इसमें भाव बहनों के सुख का विचार किया जाता है।

4नवांश- इसमें स्त्रि से संबंधित सुख का विचार किया जाता है।

5 द्वादशांश- इसमें माता – पिता से संबंधित सुख का विचार किया जाता है।

6त्रिशांश- इसमें विशेष कष्ट संबंधि बातों का विचार किया जाता है।

आज कल जन्म पत्री में ये सभी वर्गों की कंुडलियाँ बनी तो रहती हैं लेकिन इन पर विचार करने की परीपाटी का लोप हो गया है। हाँ एकमात्र बात जो शेष रह गई है वह यह है कि इन वर्गों में जो ग्रह स्वक्षेत्री, उच्चक्षेत्री, मित्र क्षेत्री, व अधिमित्र क्षेत्री होते हैं वह शुभ फल देने में विशंेष समर्थ होते हैं और जो ग्रह निर्बल निर्बल, नीच क्षेत्री, शत्रुक्षेत्री,अधिशत्रु क्षेत्री होता है वह कष्ट ज्यादा और शुभ फल कम देता है।

अब इन वर्गों की महिमा का विचार किया जाए तो जितना महत्त्व हम जन्म लग्न को देते हैं उससे आधा नवमांश को देना चहिए और अन्य वर्गाें का चैथाई महत्त्व देना चाहिए।

लेकिन कतिपय विद्वानों का मानना हैै कि नवांश को भी वही महत्त्व मिलना चाहिए जो लग्न को मिलता है।(क्षेत्र का अर्थ राशि होता है – स्वक्षेत्री, स्वराशि, स्वगृही का अर्थ एक ही होता है।)

प्राचीन पुस्तकों में तो वर्गों के अनुसार उनको अंको के अनुसार महत्वपूर्ण माना गया हैं यदि

लग्न 6 5
होरा 2 2
द्रेष्काण 4 3
नवांश 5 4.5
द्वादशांश 2 2
त्रिशांश 1 1

षडवर्ग का / सप्तवर्ग का विचार

लग्न 6 5
होरा 2 2
द्रेष्काण 4 3
न्वांश 5 4.5
द्वादशांश 2 2
त्रिशांश 1 1
सप्तमांश 1
जोड़ 20 20

होरा

अब यह बताते हैं कि होरा किसे कहते हैं यदि जैसे एक राशि 30 अंश की होती है तो उसके दो भाग15-15 अंश के किए जाते हैं। एक राशि की दो हेारा होती हैं।

द्रेशकान

यदि एक राशि के तीन बराबर भाग किये जाए तो दस- दस अंश के 3 विभाग होंगे

सप्तांश

यदि एक राशि के सात भाग किये जाए तो प्रत्येक भाग 30/7 यानि 4अंश, 17कला, 8 कला, 34 प्रतिविकला का होगा। इसे सप्तांश कहेंगे।
नवांश

नवांश

यदि एक राशि को 9 हिस्सों में विभाजित किया जाए तो प्रत्येक भा 3अंश 20 कला का हुआ। इसे नवांश कहेंगे।

दवाद्शंश

यदि एक राशि को 12 बराबर भागों में विभाजित किया जाए तो प्रत्येक भाग 2अंश 30 कला का होगा। इसे द्वादशंाश कहते हैं।

त्रिशांश

में कुछ अलग फंडा है नाम तो त्रिशांश है लेकिन राशि के पाँच हिस्से किए जाते हेैं जो विषम राशियाँ है उनमें 5 अंश तक के हिस्स्ेा का स्वामी मंगल 6 से 10 अंश तक के हिस्से का स्वामी शनि, 11से 18 अंश तक के हिस्से का स्वामी गुरू, 19 से 25 अंश तक के हिस्से का स्वामी बुध, 26 से 30 अंश तक के हिस्से का अधिपति शुक्र होता है। किंतु जो सम राशियाँ होती हैं उनमें 5 अंश तक के हिस्से का स्वामी शुक्र, 6 से 12 तक का बुध, 13 से 20 तक का गुरू, 21 से 25 तक का शनि, 26 से 30 तक का अधिपति मंगल होता है।

इस कंुडली का लग्न स्पष्ट तुला 5अंश 52कला का है। अर्थात सिंह होरा हुआ। सूर्य मीन में 4अंश35कला39विकला अतः अतः सूर्य, चंद्र होरा में हुआ।

चंद्रमा कुम्भ के 23-42-12 में अतः सूर्य होरा में हुआ।

मंगल मीन में 00-55-58 है अत चंद्र होरा मंे हुआ।

बुध कुम्भ में 2-34-42 है अतः चंद्र होरा में हुआ

गुरू (व) 19ः4ः9 है अतः सिंह होरा में हुआ। शुक्र 0ः8ः35ः2 है अत चंद्र होरा में हुआ।

शनि वृश्चिक 7-10-49 है अत चंद्र होरा में हुआ।

राहू कन्या में 16ः45ः25 है अतः सूर्य होरा में हुआ।

केतु भी सूर्य होरा में ही हेागा। क्योंकि उसके अंश भी 16ः45ः25 होंगे। इस प्रकार होरा कुंडली स्पष्ट हुई।

आगे हम केवल नवांश कुंडली का विवरण ही प्रस्तुत करेंगे आगे का विवरण पाठक अपने बुद्धि कौशल को बढातें हुए लगाए।
षडवर्ग कुंडली का विचार करते समय राहू केतू को प्रायः विचारणी नहीं माना जाता है लेकिन दक्षिण भारत में इन्हें भी फल विवरण में सम्मिलित किया जाता है।

जो ग्रह या जो लग्न वर्गोत्तम होता है। उसकी बहुत महिमा की गई है। उदाहरण के लिए यहां केवल लग्न ही वर्गाेत्तम है इसलिये लग्न बहुत ही बलवान बन गया है।

इस बलवान लग्न में शनि की स्थिति बहुत ही उत्तम हो गई है वह कुंडली में तो धन भाव में है ही नवांश में भी चैथे पाँचवे भाव का स्वामी हो कर जातक को सम्पत्तिवान धनवान बनायेगा। इतना ही नहीं यहा यह उच्च भी हो गया है।

पूरी कंुडली में अकेला शनि ही चक्रधारी है। जोकि नवमेंश बुध के साथ बैठ कर जातक को महामहिमा शाली बना रहा है।

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