रोग का योग

रोग का योग
रोग का योग

दुनिया में आए है तो रोग का योग तो साथ साथ आता है लेकिन किसी को ज्यादा किसी को कम कितना होता जीवन में इसका प्रभाव, आइये जाने.


हम पहले ही अन्य पोस्ट में बता चुके है कि शरीर का लग्न से और रोग का छठे भाव से अनुंमान लगाया जाता है। इस प्रकार मोटे तौर पर रोग का योग का अनुमान लगाया जा सकता है कि जब जब लग्नेश और षष्ठेश गोचर में मिलेंगे तब तब रोगों की पुनरावृत्ति होगी।

रोग का योग -लक्षण

यदि लग्नेश और षष्ठेश साथ हों और उनके साथ सूर्य भी हो तो जातक को बुखार से भय होता है।
यदि लग्नेश और षष्ठेश साथ हों और उनके साथ चंद्रमा भी हो तो जातक को जल से ही भय नहीं होता बल्कि हैजा और जलंधर सर्दी आदि से भी भय होता है।
-यदि लग्नेश और षष्ठेश एकत्रित हों और उनके साथ मंगल भी हो तो रोग का योग विस्फोटक रूप धारण कर लेता है. स्फोटक अर्थात चेचक, घाव, फोड़ा इत्यादि रोग से क्लेश होता है, अथवा जातक किसी युद्ध में घायल होता है।

-यदि लग्नेश षष्ठेश के साथ बुध हो तो पित्त जनित रोग, अरूचि, वमन (उल्टी) डकार पेट में गैंस और दुर्बलता से भय हो जाता है।

-यदि लग्नेश और षष्ठेश के साथ गुरू हो तो मनुष्य प्रायः रोग रहित रहता है।
-’ यदि लग्नेश और षष्ठेश के साथ शुक्र हो तो जातक की स्त्री रोगिनी रहती है।
-यदि लग्नेश और षष्ठश के साथ शनि हो तो जातक को वायु रोग होता है पेट में अपच, दस्त लगने से पीड़ा होती है।

-यदि लग्नेश और षष्ठेश राहू अथवा केतू के साथ हों तो मनुष्य को सिर दर्द और वायु प्रकोप से पीड़ा होती है। चोर तथा अग्नि से भी भय होता है। तथा यदि कंेद्रिय भावों में हो तो जेल भी जाना पड़ता है।

यदि षष्ठेश बुध के साथ होकर लग्न में बैठा हेा तो जननेंद्रीय रोग होता है।

यदि षष्ठेश शनि के साथ होकर लग्न में बैठा हो तो जननेंद्रीय का आपरेशन करना पड़ता है।
रोग का योगहोता है -यदि षष्ठेश मंगल के साथ लग्न में हो तो फोड़ा फुंसी और चेचक का भय हेाता है।यदि षष्ठ स्थान का मंगल से संबंध हो तो व्यक्ति किसी आकस्मिक चीर फाड़ या चोट आदि से भय होता है।

यदि षष्ठ स्थान का गुरू से संबंध हो तो रोगादि जल्द ठीक हो जाते है।
-यदि षष्ठ स्थान का शुक्र से कोई संबंध हो तो आहार विहार की अनियमितता के कारण रोग उत्पन्न होता है।
-यदि षष्ठ स्थान का शनि से कांेई संबंध हो तो जातक पेट दर्द ओैर अपच से पीड़ित होता है।

यदि षष्ठेश किसी पाप ग्रह के साथ लग्नस्थ हेा तो जातक व्रण से पीड़ा होती है और यदि पंचम स्थान में बैेठा हो तो पुत्र को अथवा जातक को स्वयं व्रण होता है।

इसी प्रकार रोग का योग होता है यदि षष्ठेश चतुर्थ में रहने से माता को, सप्तम में रहनें से स़़्त्री को, नवम में रहने से मामा को,तृतीय में रहने से भाई को, एकादश में रहने से बड़े भाई को और अष्टम में रहने से जातक को स्वयं गुदा स्थान में घाव होता है।

उदाहरण

उदाहरण स्वरूप रामकृष्ण परमहंस जी की कुंडली में षष्ठ स्थान का स्वामी, पापग्रह रवि एवं बुध के साथ होकर लग्नस्थ है। इनका जीवन चरित्र पढ़ने से ज्ञात होता है कि मृत्यु के समय इनकी जिव्हा में व्रण हो गया था जिस कारण इनको सदा के लिए समाधि लेनी पड़ी थी।
कुंडली-


देखों षष्ठेश गुरू लग्न में शनि से दृष्ट है (युक्त नहीं) इनकी मृत्यु भगंदर रोग से हुई थी।
कुंडली


यदि शनि और मंगल एक दूसरे से त्रिकोण गत हों तो जातक वायु पीड़ित रहता है। कंुडली में देखों शनि से नवम मंगल और मंगल से पंचम शनि है। इस कारण जातक की वायु प्रकोप अधिक है।
उदाहरण


-यदि शनि चतुर्थ में होकर पापदृष्ट हो तो अग्नि भय और आघात इत्यादि से अशुभ फल होता है। देखो कुंडली सिंह जी की शनि चतुर्थस्थ होकर पापदृष्ट होकर मंगल से जन्म के कई दिन बाद ही इनके एक पैर की चार अंगुलियाँ आग में जलकर समाप्त हो गई।

-यदि शुक्र और सप्तमेश षष्ठस्थ हों तो जातक की स्त्री नपुंसक होती है।

यदि रवि लग्नेश के साथ होकर 6-8-12 में हो तो तापगंड रोग होता है।

यदि लग्नेश चंद्रमा के साथ होकर दुखस्थान में हो तो जल विकार से गंड रोग होता है।

यदि लग्नेश मंगल के साथ हेाकर दुस्थान में हो तो जातक केा गठिया रोग का योग होता है। इसी प्रकार बुध के साथ होकर पित्त, गुरू के साथ रहने पर आँव,,शुक्र के साथ रहने पर क्षय रोग, और शनि, राहू, वा केतू से युक्त हो तो चोर उचक्कों से जातक पीड़ित होता है।

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