राहू केतु के प्रभाव

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राहू केतु के प्रभाव
राहू केतु के प्रभाव
सूर्य, चन्द्रमा , बुध, शनि.
 जब किन्ही दो   लोगो का  उपहास उड़ाना होता है तो उन्हें राहू केतु की संज्ञा से विभूषित कर देते है पर 'राहू केतु के प्रभाव' है क्या ये हम आगे जानेगे.  

‘राहू केतू के प्रभाव’

राहू केतू के प्रभाव से जुडी कुछ तथ्यात्मक बातो का हम पहले अध्ययन कर लें। विद्वान पाराशर जी ने ज्योतिष में इन्हें किसी स्थान विशेष का स्वामित्व नहीं दिया है इनके प्रभावों का ज्ञान करने के लिए हमें कुछ सामान्य सिद्धांतों को समझना होगा।

1 यानि देखना हेागा कि ये किस स्थान अर्थात केंद्र या कोण में है। तद्नुसार केंद्रधिपति व त्रिकोणाधिपति के अनुसार फलदाई होते हैं।

2 जो जो ग्रह राहू केतू को देखते हैं वे अपना प्रभाव इन्हें दे देते हैं साथ ही साथ जो ग्रह इनके साथ होते है वे भी इन्हें अपना प्रभाव दे देते हैं। यानि “ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर” वाली स्थिति में रहते हैं। ज्योतिष की वैज्ञानिकता

‘राहू केतू के प्रभाव’ से जुड़े कुछ मिथक-

1 इनके ऊपर पड़ रही गुरू की शुभ दृष्टि इन्हें शुभ सुरक्षा कवच प्रदान करती है। ( एक प्रभावी सिद्धांत है)

प्रथम भाव में

राहू प्रथम भाव में- सामान्यत स्वास्थ्य ख़राब रहता है, विभिन्न डॉक्टर्स के पास उपचार के लिए जाना पढ़ेगा, व्यक्ति को जादू टोना पसंद आता है, तथा इसकी और गंभीर रहता है, दूसरो के प्रति झूठा व्येव्हार करता है.यह योग वैवाहिक जीवन के अनुकूल नहीं होता है. राहु में मुख्यतः शनि की झलक आ जाती है. राहू केतु के प्रभाव

केतु प्रथम भाव में– आध्यात्मिक रूप से शक्ति संपन्न होता है. कमजोर शरीर दुबला पतला होता है. अस्थिर कपट पूर्ण व्येवहार करता है. बेकार के विचार, अजीब अभिरुचि, उत्तेजना पूर्ण प्रवृत्ति और विचार पूर्ण मनोभाव का संकेत मिलता है. यदि अन्य ग्रहो का अनुकूल दृष्टि या प्रभाव न हो तो वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता है.

राहू केतू के विषय में भी –

विशेष कर स्थान परविर्तन के लिए वही सिद्धांत  प्रयुक्त होते हैं- जो अन्य ग्रहो के लिए होते है. जैसे राहू केतु के प्रभाव’को यदि मेष में है तो ये देखना है तो हेागा कि मंगल किस स्थान में हैं। यानि चोथे भाव स्थित मेष में यदि राहू है और मंगल अष्टम में है तो जमीन से संबंधित अनिष्ट या दुर्धटना का खतरा जातक पर होता है ऐसा ही केतू विषय में भी जाने।

   ये हमेशा हर कुंडली मे आपस में सप्तम भाव की दूरी पर होते हैं। इनके इस योग का महत्व भी हैं। 

कथातात्मक विवेचन (राहू केतू का जन्म)

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दनु से विप्रचित्ति नामक पुत्र का जन्म हुआ

जिसका विवाह हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से हुआ। राहु का जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ इसीलिए राहु का एक नाम सिंहिकेय भी है।

 जब भगवान विष्णु की प्रेरणा से देव दानवों ने क्षीर सागर का मंथन किया तो उसमें से अन्य रत्नों के अतिरिक्त अमृत की भी प्राप्ति हुई।

भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवों व दैत्यों को मोह लिया और अमृत बांटने का कार्य स्वयं ले लिया तथा पहले देवताओं को अमृत पान कराना आरम्भ कर दिया।

राहू बन गया अमरसिंह

विष्णु के द्वारा ऐसा हेाता देखा राहु को संदेह हो गया और वह देवताओं का वेश धारण करके सूर्यदेव तथा चन्द्रदेव के निकट बैठ गया। विष्णु जैसे ही राहु को अमृतपान कराने लगे सूर्य व चन्द्र ने  विष्णु को उनके बारे में सूचित कर दिया। क्योंकि वे राहु को वे पहचान चुके थे।

भगवान विष्णु ने उसी समय सुदर्शन चक्र द्वारा राहु के मस्तक को धड से अलग कर दिया। पर इस से पहले अमृत की कुछ बूंदें राहु के गले में चली गयी थी जिस से वह सर तथा धड दोनों रूपों में जीवित रहा। सर को राहु तथा धड को केतु कहा जाता है।

ग्रहण से संबंधित राहू केतु का प्रभाव

धार्मिक मन्याताओं के अनुसार सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगने के पीछे राहु-केतु जिम्मेदार हैं। ऐसा करने के पीछे इन दो ग्रहों की सूर्य और चंद्र से दुश्मनी बताई जाती है।

 ग्रहण के दौरान राहु-केतु का प्रभाव होने के कारण ही किसी भी कार्य को करने से मना किया जाता है। इन दो ग्रहों के बुरे प्रकोप से बचने के लिए ही सूतक लगते हैं और ग्रहण के दौरान मंदिरों तक में प्रवेश निषेध होता है।

सूतक- राहू केतु के प्रभाव

यहाँ शब्द आया है सूतक इसका अर्थ है की ग्रहन से पहले ही लोगो को सजग कर दिया जाता है की वे ग्रहन समय से १२ घंटे पहले व् बाद के १२ घंटो के दोरान कोई काम न करे. यानि २४ सूतक की समय अवधि होती है. सूतक से जुडे विशवास या अंध विश्वास हमारे समाज में मोजूद है. क्या इनके पीछे कोई वैज्ञानिक कारन है. है! वेह है स्वछता पूर्वक रहने का. क्योकि ग्रहन के बाद सभी लोग देखा गया है की स्नान और सफाई करते है.

मान्यता है कि ग्रहण में इन ग्रहों की छाया मनुष्य के बनते कार्य भी बिगाड़ देती है इसलिए कभी भी ग्रहण काल में कोई शुभ कार्य तो दूर सामान्य क्रिया के लिए भी मना किया जाता है। इस ग्रहण के लगने के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है।

पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच सूर्य जब आता है तब चंद्रग्रहण लगता है और जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आता है तो सूर्यग्रहण। सूर्य ग्रहण अमावस्या को और चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन लगता है।

इसलिए जब ग्रहण का समय तय है तो पौराणिक कथा पर विश्वास भी अधिक बढ़ता है। तो आइए जानें ग्रहण क्यों लगता है और राहु-केतु से इसका क्या संबंध है।

जब भी राहू केतु के मध्य में किसी कुंडली में सरे ग्रह घिर जाते है तो ऐसे में एक प्रसिद्ध योग जो की अपशकुन के रूप में याद किया जाता है वह है कल सर्प योग-ये राहू केतु के प्रभाव में ज्योतिष में सबसे प्रसिद्द अपशकुन योग है. इस का सम्बन्ध में कहा गया है की इस योग के कारन व्यक्ति को सारी उम्र दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है जो की सुच भी है

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