राशि परिचय

राशी परिचय
राशी परिचय

नीचे जो राशि परिचय दिया जा रहा है उसमे जो गुण राशियों के बताए गए है वे गुण लगभग हर मनुष्य में मिल जाते है. 

जिस राशि में चंद्रमा होता है वहीं व्यक्ति की राशि होती है. इसीलिए राशि परिचय   को होना जरुरी है.चंद्र को ज्योतिष में मन का कारक माना गया है जिससे किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति का पता चलता है।

अतः इसीलिये राशियों से परिचित होना जरूरी होता है। बारह भावों की 12 ही राशियाँ होती है। जिस भाव में जिस राशि में आपका चंद्र होता है उस भाव राशि और चंद्र के मिलन से ही आपका व्यक्तित्व गढ़ा जाता है।

अतः इसीलिये भाव, राशि और ग्रहों का परिचय प्राप्त करना बेहद जरूरी है।

मेष राशि– यह चर यानि गतिशील राशि है। क्रूर, पुरूष, अग्नितत्व, पूर्व दिशा की स्वामी है।मस्तक के पिछले भाग का ज्ञान कराती है। पृष्ठोदय, उग्र प्रकृति, लाल रंग एवं पादजल राशि है। यह पित्त प्रकिृति कारक है तथा इसका स्वामी मंगल है। सूर्य इसमें उच्च और शनि नीच होता है। इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव साहसी, अभिमानी और मित्रों पर कृपा रखने वाला होता है। अपने पहले नवांश में अपने प्राकृतिक स्वभाव को विशेषरूप से प्रकट करती है।

वृष राशि– स्थिर, सौम्य, स्त्री, पृथ्वीतत्व, दक्षिण दिशा की स्वामी, पृष्ठोदय, श्वेतवर्ण, शरीर का मूल, वायु-प्रकृति-कारक और अर्धजल राशि, कहलाती है।इसका स्वामी शुक्र है। चुद्रमा इसमें उच्च होता है तथा 4 से 30 अंश तक चंद्रमा मूलत्रिकोण में कहा जाता है। राहु इसमें उच्च और केतू नीच होता है। इसका प्राकृतिक स्वभाव स्वार्थी, समझ बूझ कर काम करने वाला, परिश्रमी और साँसारिक कार्य में दक्ष होना है। पंचम नवमांश में अपने स्वभाव को दिखाती हैं।

मिथुन राशि– द्विस्वभाव,क्रूर,पुरूष,वायुतत्व, पश्चिमदिशा, शरीर का अंग, हाथ, शीर्षोदय, कफ-वायु-पित्त (त्रिदोष) विशिष्ट और दोरंग कारक है। इसको निर्जल राशि कहते है। बुध इसका स्वामी है। इसका प्राकृ-तिक स्वभाव विद्या अध्ययनी और शिल्पकारक का है। अपने नवम नवांश अपने प्राकृतिक स्वभाव को पूर्ण रूप से दिखाती है।

कर्क राशि-चर, सौम्य, स्त्री, जलतव, उत्तरीदिशा, अंग में वक्षस्थल, पृष्ठोदय, और लाली गोराई का कारक कहलाता है। यह पूर्णजल राशि कही जाती है। इसका स्वामी चंद्र है। मंगल इसमें नीच होता है। यह राहु का मूलत्रिकोण है। प्राकृतिक स्वभाव से सांसारिक उन्नति में प्रवृत्ति, लज्जवान, कार्य करने में स्थिरता और समयानुयायी का सूचक है। यह पहिले में अपने स्वभाव को पूर्ण रूप से प्रकट करती है।

सिंहराशि- स्थिर, क्रूर, पुरूष, अग्नितत्त्व, पूर्वदिशा शरीर में दिल व शीर्षोदय,पीतवर्ण,पित्त्प्रकृति, परिभ्रमणप्रिय कारक कहलाता है। यह निर्जल राशि है। तथा सूर्य इसका स्वामी है। 1से20 अंश तक सूर्य का मूलत्रिकोण और शेष स्वगृह कहलाता है। प्राकृतिक स्वभाव मेष  के जैसा है। परंतु स्वतंत्रता का प्रेमी और चित्त की उदारता का लक्ष़्ाण रखता है। यह पांचवे नवांश में अपने पूर्ण स्वभाव को दिखाती है।

कन्या राशि– द्विस्वभाव, सौम्य, स्त्री, पृथ्वीतत्त्व, दक्षिण दिशा, अंग में पेट, शीर्षोदय पाण्डुवर्ण और वायु   प्रकृति कारक है।यह निर्जल राशि है। बुध इसका स्वामी है। बुध इसमें 15 अंश तक उच्च, और 16 से 25 अंश तक मूलत्रिकोण और शेष में स्वगृही होता है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मिथुन के जैसा है। परन्तु अपनी उन्नति और सम्मान पर ध्यान रखने के इच्छा वाली होती है। यह अपने नवें नवांश में अपने पूर्ण स्वभाव को दिखाती है।

तुला राशि– चर, क्रूर, पुरूष, वायुतत्व, पश्चिम दिशा, शरीर मं नाभी के नीचे का स्थान, शीर्षोदय, त्रिदोष और काले रंग का कारक है। यह पद जल राशि है। और इसका स्वामी शुक्र है। सूर्य इसमें नीच तथा शनि उच्च होता है। इसमें 20 अंश तक शुक्र का मूलत्रिकोण और शेष स्वगृह होता है। केतु की मित्रराशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, ज्ञानप्रिय, कार्य सम्पन्न और राजनीतिज्ञ का है। यह अपने पहले नवांश में अपने प्राकृतिक स्वभाव को दिखाती है।

वृश्चिक राशि– स्थिर,सौम्य स्त्री, जलतव, उत्तरदिशा, शरीर का जननेंन्द्रिय(लिंगदि) शीर्षोदय, श्वेतवर्ण, कांचन और कफ प्रकृति कारक कहलाता है। इसे अर्धजल राशि कहते है। मंगल इसका स्वामी और चंद्रमा का यह नीच स्थान है। केतु का इस राशि में उच्च होना भी कहा जाता है। और राहू नीच होता है। प्राकृ-तिक स्वभाव से यह घमंडी, हठी, दृढ़ प्रतिज्ञ, स्पष्ठवादी, और निर्मल चित्त का होना है। पंचम नवांश में अपने प्राकृतिक स्वाभाव को दिखाती है।

धनुराशि– द्विस्वभाव, क्रूर, पुरूष, अग्नितत्व, पूर्वदिशा, शरीर के पैरो की संधि तथा जंघा, पृष्ठोदय, कांचनवर्ण और पित्त प्रकृति कारक कहलाती है। यह अर्धजल राशि कही जाती है। बृहस्पिति इसका स्वामी है। 20 अंश तक इसमें गुरू का मूल त्रिकोण और शेष स्वक्षेत्र होता है। प्राकृतिक स्वभाव से अधिकारप्रिय, करूणामय, और मर्यादा का इच्छुक होता है। नवें नवांश में अपने प्राकृतिक स्वभाव को दिखाता है।

मकर राशि– चर, सौम्य, स्त्री, पुृथ्वीतत्व, दक्षिणदिशा, शरीर के पैरों की गाँठ तथा घुटना, पृष्ठोदय वायु प्रकृ-ति और पिंगलवर्ण कारक है। यह पूर्णजल राशि है। शनि इसका स्वामी है। गुरू इसमें नीच और केतु का ये मूल त्रिकोण स्थान है। इसका स्वभाव उच्चाभिलाषी है।यह पहिले नवांश में अपने स्वभाव को दिखाती है।

कुंभ राशि– स्थिर, क्रूर, पुरूष, वायुतत्व, पश्चिम दिशा, शरीर की पिंडली, शर्षोदय, विचित्र वर्ण, जलराशि तथा त्रिदोष कारक है। यह अर्धजल राशि है। शनि इसका स्वामी है। इसमें 20 अंश तक शनि का मूल त्रिकोण है। और शेष स्वग्रही स्थान है। प्राकृतिक स्वभाव से विचारशील, शान्तचित्त से नई बातें पैदा करने वाला और धर्मारूढ़ होता है। पांचवे नवांश में अपने मूल स्वभाव को दिखाती है।

मीन राशि– द्विस्वभाव, सौम्य, स्त्री, जलतव, उत्तरदिशा, शरीर के अंग का पैर, उभयोदय कफ प्रकृति और पीले रंग कारक है। यह पूर्णजल राशि है। गुरू इसका स्वामी है तथा बुध इसमें नीच होता है। प्राकृतिक स्वभाव से उत्तम स्वभाव वाला, दानी और कोमलचित्त का होता है। नवम नवांश में अपने पूर्ण स्वभाव को दिखाता है। कोशल देश का स्वामी। वर्तमान में आयोध्या नगरी का स्वामी होता है।

नोट– जहां – राशि परिचय में किसी ग्रह के किसी राशि में नीच होना लिखा है वहां आप यह न समझे कि ग्रह यहां आकर इस राशि में स्वभाव की नीचता ग्रहण कर लेता है।

राशि परिचय के  अंतर्गत वस्तुतः जैसे हम किसी 12 मंजिल की इमारत पर सबसे ऊपर वाली मंजिल पर हों तो हम स्वयं को उच्च कहेंगे और नीचे खड़े व्यक्ति को नीचे खड़े होने के कारण नीचे या नीच कहेंगे। ठीक यही स्थिति ग्रहों के संदर्भ में  भी समझ लेनी चाहिए।

लेकिन परम्परा से चले आ रहे शब्द भ्रम के कारण ग्रह का नीच होना या उच्च होना कहा गया है। वो स्पष्टी करण भी मैं साथ ही साथ करता चलूं।

ऐसा इसलिये होता है रहा क्योंकि ज्योतिशियों ने जनमानस ही नहीं बड़े बड़े राजा महाराजाओं को ठगने के लिये इन शब्दो की कुटिलता को बनाए रखा जो कि बाद में रूढ़ परिपाटी बन गए। यदि ग्रह किसी राशि के किसी  अंश पर उच्च होता है तो उसकी स्वाभाविक शक्ति बढ़ जाती है, और यदि किसी राशि के किसी अंश पर नीच या निम्न स्थिति पर होता है तो इससे उसकी फलदायिनीशक्ति घट जाती है।

तो दोस्तों अपने जाना की राशियों की गुण धर्म व्यक्ति को जीवन में किस किस प्रकार के लाभ हानियों से प्रभावित कर सकते है 

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