रामायण में ज्योतिष

रामायण में ज्योतिष
रामायण में ज्योतिष

रामायण में ज्योतिष शास्त्र के शकुन अपशकु ,स्वप्न,मुहूर्त आदि बातो का कही सांकेतिक और कही पूर्ण रूप से फलो का उल्लेख मिलता है.

दोस्तों भारतीय ज्योतिष प्राचीन काल से ही अपने व्यापक परिदृश्य में विभिन्न समयावधियों में स्वीकार्य एवं मनिषियों द्वारा स्वीकार्य पाई जाती है। वहीं हमारे देश के प्राचीन ग्रंथ रामयण में ज्योतिष को पूर्ण रूप से स्वीकार्य पाया जाता है। रामायण में अनेक स्थानों पर ग्रहों का नक्षत्रों में भ्रमण का फल अनेक रूप से फलदायी पाया गया हैं।

इस पर हम यहाँ उदाहरणों के द्वारा विचार प्रस्तुत करेंग और जानेंगे की किस प्रकार ज्योेतिष, हर काल विशेष में एक स्वीकार्य विद्या के रूप में, भारत में और फिर बाद में, विश्व में स्थान प्राप्त कर सकी।

रामायण में ज्योतिष संदर्भ

रामायण में हमें सबसें पहले ज्योतिष का संदर्भ प्राप्त होता है आयोध्या कांड के चोथे सर्ग में 18 से 22 श्लोकों में जहां महाराज दशरथ अपने दर्द को राम के आगे व्यक्त करते हुए कहते है कि ‘‘ बेटा! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अतः मैं तुम्हें युवराजपद पर अभिषिक्त करूंगा ।।16।।

‘रघुकुलनंदन श्रीराम! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखाई देते हैं। दिन में वज्रपात के साथ साथ बड़ा भंयकर शब्द करनेवाली उल्काएँ भी गिर रही हैं।।17।।

‘‘श्रीराम ज्योतिषियों का कहना है कि मेरे जन्मनक्षत्र को सूर्य, मंगल, और राहू नामक भयंकर ग्रहों ने आक्रान्त कर लिया है।’’।।18।।

ऐसे अशुभ लक्षणों का प्राकट्य होने पर प्रायः राजा घोर विपत्ति में पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु हो जाती है।’’।।19।।

अतः रघुनन्दन जबतक मेरे चित्त में मोह नहीं छा जाता, तब तक ही तुम युवराज पदपर अपना अभिषेक करा लो, क्योंकि प्राणियों की बुद्धि चंचल होती है।।20।।

‘ आज चंद्रमा पुष्य नक्षत्र से एक नक्षत्र पहले पुनर्वसु पर विराजमान है, अतः निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्र पर रहेंगे – ऐसा ज्योतिष कहते हैं।।21।।

‘ इसलिये उस पुष्य नक्षत्र में ही तुम अपना अभिषेक करा लो! शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! मेरा मन इस कार्य में बहुत शीघ्रता करने को कहता है। इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराज पद पर अभिषेक कर दूंगा।।22।।

यहां हम यदि अठारवें श्लोक को देखें तो पता चलता है कि यदि हमारे जन्म नक्षत्र पर गोचर काल में क्रूर ग्रहों चलन हो रहा है तो मान्यता है कि निश्चय हमारे साथ कोई न कोई दुर्धटना होने वाली है।


विश्वपटल पर ग्रहों का प्रभाव


आजकल दुनियाँ मे कोरोना वायरस फैला हुआ है और साधू महात्माओं पर आधात हो रहे है। इसका एक प्रमुख कारण राहू केतू के मध्य सारे ग्रहों का आ जाना यानि काल सर्प योग का लागू हो जाना और दूसरे एक ही स्थान यानि मकर राशि में शनि का स्वग्रही होकर बलवान हो जाना, मंगल का मकर में ही उच्च हो जाना, और मकर में ही ब्रहस्पति का नीच हेा जाना। यहाँ ब्रहस्पति का नीच हो कर दो दो क्रूर ग्रहों के बीच में फॅस जाने का मतलब है कि साधू पुरूषों पर लगभग दो महीने तक नीच प्रवृत्ति के लोगों द्वारा आक्रमण होंगे और काल सर्प योग का फल यह होगा कि प्रशासन समर्थ होते हुए भी असमर्थ की हालत में होगा। यानि सूर्य जब राहूू अधिष्ठित राशि मिथुन को अंशात्मक (राहू के तात्कालिक अंश) रूप में पार नहीं कर लेगा तब तक विश्व पटल पर दुर्भिक्षों का सामना करना पडे़गा।

यहाँ श्लोक 21 में महाराजा दशरथ राम से आग्रह कर रहे है कि पुश्य जिसका स्वामी शानि है के रहते वे अपना राज्याभिषेक करा लें कल यदि अष्लेशा नक्षत्र लग गया तो राज्याभिषेक न हेा पाएगा। यहाँ इस आग्रह का कारण यह है कि पुष्य जोकि उनका (महाराज दशरथ) का नक्षत्र है के रहते जिस पर इस समय चंद्रमा है के शुभ प्रभाव के कारण राम का राज्याभिषेक निर्विध्न हो जाएगा लेकिन कल अगर चंद्र बुध के नक्षत्र पर चला गया तो उनका राज्याभिषेक ना हो पाएगा, जोकि उनका जन्म नक्षत्र स्वामी ग्रह नहीं है। इस प्रकार यहाँ हम देखते हैं कि ‘‘होई है सोई जो राम रचि राखा।’’

जब जब पृथ्वी पर पशु-पक्षियों (वर्तमान में पक्षियों द्वारा प्राप्त बीमारी) के व्यवहार में उद्विग्नता दिखाई देती है समझा जाता है कि कोई ना कोई विपत्ति आने वाली है। इसी बात को व्यवहार में हम आज देख भी रहे हैं जोकि विश्वव्यापी बीमारी के रूप में सामने आ रहा है और इसी बात को रामायण में रावण विभीषण संवाद के द्वारा लंका कांड में दसवे सर्ग में निम्न शब्दों के द्वारा प्रकट किया गया है।

‘‘शत्रुओं को संताप देने वालेे महाराज! जब से विदेह कुमारी सीता यहाँ आयी है, तभी से हमलोगों को अनेक प्रकार के अमंगल सूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं।’’।14।।

‘मंत्रोंद्वारा विधिपूर्वक धधकाने पर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है। उससे चिंगारियाँ निकलने लगती हैं उसकी लपट के साथ धुँआ उठने लगता है और मंथन काल में जब अग्नि प्रकट होेती है, उस समय भी वह धूएँ से मलिन ही रहती हैं।‘

रसोई घरों में अग्निशाला में तथा वेदाध्ययन के स्थानों में साँप देखे जाते हैं। और हवन सामग्रियों में चीटियाँ देखी जाती हैं।
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गायों का दूध सूख गया है, बड़े बड़े गजराज मद रहित हो गये है। घोड़े नया भोजन पाकर भी दीनता प्रकट कर रहे हैं।

‘‘राजन! गधों, ऊँटों और खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं उनकी आँखों से आँसू गिरने लगते हैं। विधि पूर्वक चिकिस्सा करने पर भी वे ठीक नहीं हो पाते हैं।’

क्रूर कौए झुंड के झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वर में काँव काँव करने लगते हैं तथा वे समतल मकानों पर समूह के समूह इकट्ठे हुए देखे जाते है। लंकापुरी के ऊपर झंुड के झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए से मंडराते रहते हैं। दोनों संध्याओं के समय सियारिनें नगर के समीप आकर अमंगलसूचक शब्द करती हैं।

नगर के सभी फाटकों पर समूह के समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओं के जोर जोर से किये जाने वाले चित्कार बिजली की गड़गड़हट के समान सुनाई पड़ती है।

वीरवर! ऐसी परिस्थिति में मुझे यही प्रायश्चित अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचंद्रजी केा लौटा दी जाए।

ग्रहों से प्राप्त प्रभावों पर ही आयोध्या काण्ड के इकतालीसवे सर्ग के ग्यारहवें श्लोक में जब रामचंद्र जी वन गमन को तैयार हो रहे है ‘‘त्रिशंकु मंगल, गुरू बुध, तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रात में वक्रगति से चंद्रमा के पास पहुँचकर दारूण (क्रूरकांतियुक्त) होकर स्थित हो गये।।11।।

नक्षत्रों की कांति फीकी पड़ गई और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब के सब आकाश में विपरीत मार्ग पर स्थित होकर धूमाच्छान्न प्रतीत हो रहे थे।।12।।

आकाश में छाई हुई मेघ माला वायु के वेग से उमड़े हुए समुद्र के समान प्रतीत होती थी। श्रीराम के वन को जाते समय वह सारा नगर जोर जोर से हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया)13।।

वर्तमान में भी भूकम्प के झटके महसूस किए गए थे।
समस्त दिशाएं व्याकुल हो उठी! उनमे अंधकार सा छा गया! न कोई ग्रह प्रकाशित होता था न नक्षत्र 14

इस प्रकार राम के वन गमन पर ग्रहों के एकत्र हो जाने का प्रभाव यह होता है कि इससे लंका युद्ध हो जाता है।

युद्ध के समय रावण का राम पर अपने युद्ध कौशल के द्वारा बढ़त पा लेने पर रामायण कार ने उस समय की ग्रहों की वस्तंुस्थिति का मार्मिक वर्णन इस प्रकार किया है।

लंका कांड के एकसौ दोवें सर्ग के 32 से 34 वें सर्ग में ग्रह स्थिति का वर्णन इस प्रकार से है।

श्री राम रूपी चंद्रमा को रावण रूपी राहु से ग्रस्त हुआ देख बुध नामक ग्रह जिसके देवता प्रजापति हैं, उस चंद्र प्रिया रोहिणी नामक नक्षत्र पर आक्रमण करके प्रजावर्ग के लिये अहितकर हो गया।।32।।

स्मुद्र प्रज्वलित होने लगा उसकी लहरों से धुआ सा उठने लगा और वह कुपित सा होकर ऊपर की ओर इस प्रकार बढ़ने लगा, मानों सूर्य देव को छू लेना चाहता है।33

आकाश में इक्ष्वाकुवंशियों के नक्षत्र विशाखा पर, जिसके देवता इंद्र और अग्नि हैं, आक्रमण करके मंगल पर जा बैठा।

इस तरह हमें महर्षि की दृष्टि में ज्यौतिष की प्राचीन समीचीनता का ज्ञान होता है।साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि भारत में ज्योतिष सभी कालों में सर्वस्वीकार्य विद्या के रूप में स्थापित रही है।

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