राजयोग

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राजयोग एक ऐसा शब्द जिसने ज्योतिष में विश्वास रखने वाले भारतीय जनमानस को अतिप्रभावित किया है।

राजयोग के पीछे कारण ही ऐसा है कि न चाहते हुए भी भारतीय जनमानस ज्योतिषी के पास इस आशा से जाता है कि देखू क्या मैं भी असीम संपत्ति शाली बनूंगा अथवा नहीं। क्या मुझे भी कोई सुंदरी मिलेगी अथवा नहीं। क्या मेरे पास भी चल अचल संपत्ति होगी अथवा नहीं।

ऐसा इसलिए क्योंकि हम देखते आए हैं कि भारत में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में प्राचीन काल से राजाओं महाराजाओं का ही राज्य होता आया है। यही नहीं वर्तमान में भी सरकार में मंत्रियों राज्याध्यक्षों के पास ही संपत्ति के अकूत भंडार पाए जाते है। यहीं नहीं भारत में भी जो लोग सड़कों पर भिक्षुक सदृश घूमा करते थे वे लोग मंत्री विधायक या मुख्य मंत्री बनते ही सम्पत्ति के मालिक बन जाते हैं। और तो और यदि राज्य की सेवा में रहे कलर्क अफसर भी किसी मंत्री के सदृश संपत्ति शाली हो जाते हैं।

सुख योग के नियम

तो यहीं से शुरू होता है राजयोग का आरम्भ, चाहे वह सही रास्ते से हो या गलत रास्ते से। राजयोग सिर्फ राजयोग ही न हो कर एक प्रकार से सही व्याख्या करें तो सुख सम्पन्न सम्पत्ति योग भी कह सकते हैं। संसार में सभी को इस संपत्ति योग या कहें राज योग की तलाश हैं। इस काम को पूरा करने में या खोजने में जितना हाथ भारतीय ज्योतिष का रहा है उतना संसार में किसी ओर विद्या का नहीं रहा। इसीलिये यहाँ का आदि कालीन ज्ञान दुनिया के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है।


ज्योतिष शास्त्र में अनेकानेक राजयोग लिखे गये हैं जिनमें से प्रसिद्ध योगों की व्याख्या यहाँ हम करेंगे। यदि केंद्र और त्रिकोण के स्वामी परस्पर संबंधित हों तो यह एक बहुत ही लागू राजयोग होता है। तो पहले यह जान लेते हैं कि इस संबंध से क्या अभिप्राय है। संबंध चार प्रकार के होते है।

संबंध जिसे क्षेत्र संबंध भी कहते हैं इसका अभिप्राय यह है कि एक राशि का स्वामी किसी दूसरी राशि में बैठा हो और उस राशि का स्वामी प्रथम राशि में बैठा हो, अथवा त्रिकोणेश केंद्र में और कंेद्रेश त्रिकोण में हो। जैसे वृष का स्वामी शुक्र कर्क राशि में और कर्क राशि का स्वामी वृष राशि में बैठा हो। ऐसे योगों को अन्योन्य राशि संबंध कहते हैं। चार संबंधो में यह सबसे बली संबंध कहलाता है।

अन्योन्य राशिस्थित संबंध

परस्पर दृष्टि संबंध अर्थात एक ग्रह दूसरे ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो दूसरा ग्रह भी प्रथम ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो यानि दोनो में 180 अंश का दृष्टि संबंध या दृष्टि संबंध की सीमा में हो प्रत्येक ग्रह लगभग साढ़े चार अंश के अंतर पर दूसरे ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसमें थोड़ी बहुत नियमों संबंधी न्यूनाधिकता होती है। शनि लग्न में और बृहस्पति सप्तम में है। शनि की बृहस्पति पर और बृहस्पति की शनि पर पूर्ण दृष्टि है। जैसे यहाँ इस कुंडली में इस संबंध को परस्पर दृष्टि संबंध कहते हैं और अन्योन्य संबंध से इसका फल कुछ कम होता है।
उदाहरण-

अष्टकवर्ग शोधन विधि
अष्टकवर्ग शोधन विधि

तृतीय संबंध अन्यतर दृष्टि संबंध- को कहते हैं। एक ग्रह दूसरे की राशि में हो और दूसरे को देखता हो। जैसे दी गई कंुडली में गुरू मिथुन में है और उसके स्वामी बुध पर गुरू की दृष्टि है। अन्य मत के अनुसार एक ग्रह दूसरे ग्रह पर पूर्ण दृष्टि डालता हो परंतु उस दूसरे की दृष्टि पहले ग्रह पर न हो। जैसे दी गई कुंडली में गुरू की पूर्ण दृष्टि सू.बु. और शुक्र पर है जो गुरू से पंचमस्थ हैं, पर पड़ती है। लेकिन सू.बुध.शुक्र की दृष्टि गुरू पर नहीं पड़ती है।। इस कारण गुरू का सू बु और शु से अनंतर दृष्टि संबंध हुआ और ऐसे संबंध का फल परस्पर दृष्टि संबंध से भी कम होता है। अर्थात संबंधो में इसका तीसरा स्थान है।

सहावस्थान संबंध

इसका अभिप्राय यह है कि किसी एक स्थान में दो भावों के स्वामी मिल कर बैठे हो या दोनों एक वर्ग के हों जैसे यहां नवमेश सूर्य और दशमेश बुध दोनों एक साथ तुला राशि में बैठे हैं। अतः सूर्य और बुध में सहावस्थान संबंध हुआ और इसको अन्य तीन संबंधों से कम बल होता है।
यदि त्रिकोणेश और कंेद्रेश को आपस में उपरोक्त चार संबंधेा में से कोई हो तो राजयोग होता हैं स्मरण रहे कि राज योग का बल संबंध के बलाबल पर निर्भर करता है। दूसरा नियम यह है कि लग्न का स्वामी साधारण राज योग का दाता होता है। चतुर्थंेश उससे बली, उसके बाद सप्तमेश बली होता है। और दशमेंश सबसे बली होता है। इसी प्रकार नवमेंश पंचमेश से अधिक बलवान होता है। परिणाम यह निकलता है कि यदि नवमेश और दशमेश में संबंध हो तो सबसे बली राजयोग होगा।
यदि नवमेश दशमेश और पंचमेश साथ मिल जाए तो सोने में सुगंध हो जाती है। परंतु केंद्रेश और त्रिकोणेश का संबंध होते हुए यदि 6-8-11-12(स्वामियो का) संबंध भी कंुडली में किसी प्रकार हो तो राज योग में न्यूनता हो जाती है।
वृष लग्न के होने पर अकेला शनि ही राजयोग देने वाला हो जाता है। ऐसे में यही नवमेश और दशमेश हो जाता है। देखो कुंडली

bhav swamiyo ke fal
bhav swamiyo ke fal

यदि किसी का तुला लग्न हेा तो ऐसे मे भी चैथे और पांचवे स्थान का स्वामी शनि हो कर राजयोग प्रदाता होता है। इसी प्रकार मकर लग्न में पंचमेश और दशमेश अकेला शुक्र होता है। इन सब योगों में एक बात और देखने वाली है कि यदि इस प्रकार के योग देने वाले ग्रह किस भाव में पड़े हैं और नीच, मूल त्रिकोणादि में पड़े हैं या कैसे हैं। देखो कुंडली

Ashutosh mukharji-min
Ashutosh mukharji-min


यहां पंचमेंश गुरू केंद्रेश मगलं के साथ भाग्य स्थान में है।
केंद्रेश शनि, त्रिकोणेश गुरू को देखता हैं
त्रिकोणेश चंद्र, कंेद्रेश मंगल से शनि से दृष्ट है और शुक्र के साथ है। चंद्र मंगल का केद्रेश त्रिकोणेश होकर स्थान परिवर्तन हुआ है। केंद्र में राहू बैठा है और उसके साथ चंद्र भी बैठा हैं ये एक बड़े शास्त्रकार हुए यानि धार्मिक विभाग के राजाधिराज–श्री वल्लभाचार्यजी।

यदि व्यक्ति चतुर्थ और पंचम स्थान के स्वामियों को लेकर कंुडली में बैठा है तो जातक विद्वान और बुद्धि का राजाधिराज होता है। यहां कुडली दे रहे हैं 25 बी सूर्य नारायण राव की। ये स्वयं मंे एक महा विद्वान व्यक्तित्व थे।

तो इस प्रकार से आपने दिखा की लोग भाग्य के बल पर किस प्रकार से एक साधारण से घर में जन्म लेकर भी राजाधिराज और महाभाग्येशाली हो जाते है. देखे जाइये इस पारकर के विश्लेषण हम आगे भी करते जाएँगे .

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