मैत्री चक्रों का परिचय

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(Friendship between planets)

भारतीय ज्योतिष में 3 प्रकार के मैत्री चक्र

होते है, इन मैत्री चक्रों का एक बहद दिलचस्प परिचय आपको यहाँ मिलने वाला है .

दोस्तों मैत्री चक्रों का परिचय के अंतर्गत नैसर्गिक मैत्री चक्र , तात्कालिक मैत्री चक्र, और पंचधा मैत्री चक्रों का वर्णन भारतीय ज्योतिष शास्त्र में हमें मिलता है. क्या है इनके प्रभाव और उपयोग चलिए देखते है.

नैसर्गिक मैत्री चक्र

ज्योतिष के पूर्व ऋषियों ने कहा है की ग्रहो में भी मित्रता , शत्रुता, समता के गुण पाए जाते है. किन्तु एइसा भी नहीं है की इनमे आकाश में विचरण करते हुए आपस में कोई झगड़ा फसाद हो जाता है. महर्षियों ने अपनी दिव्य दृष्टि दवारा मालूम किया की एक ग्रह की किरने दुसरे ग्रह की किरणों को विशेष कोण पर आका कभी सहायता करती है तो कभी विरोध करती है, और कभी न विरोध करती है न सहायता करती है.ऐसी अवस्था को संभव कहा गया है.

सत्याचार्य ने इस सम्बन्ध में एक श्लोक की रचना भी की है. कि”ग्रह गण अपने मूल त्रिकोण से 2,5,4,8,9,और 12 घरो के और अपने उच्च स्थान के स्वामी को मित्र बनाते है. किसी और को नहीं.

सत्याचार्ये के इस कथन को इस रूप में भी देख सकते है की ग्रह अपने मूल त्रिकोण स्थान से द्वितीये और दवादश , पंचम एवं नवं, तशा चतुर्थ एवं अष्टम स्थान के स्वामियों को निमंत्रित करते है दोस्ती करने के लिए. यदि ये निमंत्रण किसी ग्रह को दो बार मिल जाता है तो उस मूल त्रिकोण वाले ग्रह को वह स्वाभाविक मित्र हो जाता है. और यदि निमंत्रण केवल एक बार मिले तो सैम होता है.

इसके ठीक विपरीत जिस ग्रह को निमंत्रण नहीं मिला होता है वेह ग्रह शत्रु मन जाता है. नीचे दी गई कुंडली की ग्रहो को अपने अपने मूल त्रिकोण में स्थित दिखाया गया है.

मैत्री चक्रों का परिचय

मैत्री चक्रों का परिचय
मैत्री चक्रों का परिचय

यहाँ सूर्य का सिंह राशी मूल त्रिकोण है उससे दुसरे का बुध,चतुर्थ का मंगल पंचम का गुरु,अष्टम का गुरु, नवं का मंगल है. और १२वे स्थान का स्वामी चन्द्र है. सूर्य मेष में उच्च का होता है.यहाँ देखा गया की मंगल और गुरु दो बार निमंत्रित किये गय अत ये दोनों कर चन्द्र (एक ही बार निमंत्रि होने से ) सूर्य के मित्र हुए. गुरु को सिर्फ एक बार निमंत्रण मिला इस कारण ये सुम हुआ,शुक्र शनि को बुलावा नहीं मिला इस लिए ये शत्रु हुए. के बात

चन्द्र मूल त्रिकोण में है.इससे दुसरे स्थान का स्वामी बुध, चोथे स्थान का स्वामी सूर्य, पांचवे का बुध , आठवे का गुरु , नवं का शनि 12 वे का मंगल,और उच्चस्थान का शुक्र है.इसलिए बुध का सूर्य मित्र,गुरु, शनि, और मंगल व् शुक्र समऔर शत्रु कोई नहीं. इसी प्रकार सुब ग्रहो का जानना चाहिए.

ऊपर लिखी ग्रहो की शत्रु मित्र पद्धति को वराहमिहिर आदि आच्र्यो ने भी स्वीकार किया है.

राहू केतु के मित्र गुरु, शुक्र और शनि है.

ग्रह सु चं बुगु शु
मित्र च म गुसु बुसु च गुसु शुच म सुबु शशु बु
समबुमगु शु शशु शम गु शम बुगु
शत्रु श शुबुशु बुसु चसु च म

तात्कालिक मैत्री चक्र

प्रकृति में भी ऐसा देखा जाता है की एक आदमी दूसरी का दोस्त होते हुए भी स्वार्थवश शत्रु हो जाता है या उससे समता दिखने लगता है. इसी तरह एइसा भी देद्खा गया है की आपस में शत्रुता रखने वाले किसी कारन वश (तात्कालिक ) कार्यवश एक दुसरे से मित्रता भाव दिखने लग जाते है. इस प्रकार के संबंधो को हम ग्रह के ऊपर भी लागू कर सकते है.

इसका नियम ये है की यदि एक ग्रह से दूसरा ग्रह 2-3-4-10-11-या 12 स्थान में होता है तो जितने ग्रह इन स्थानों में होते है वे सब के सब ग्रह के तात्काली मित्र हो जाते है.

यदि की ग्रह के साथ ही कोई दूसरा ग्रह हो या उससे 5-6-7-8-9 स्थान में हो तो ये सब उस ग्रह के तात्कालिक शत्रु हो जाएँगे, इस को एक उधाहरण से समझेंगे.नीचे एक कुंडली दी जा रही है इस कुंडली में ये विचार करना है की सूर्य का कोनसा ग्रह तात्कालिक मित्र है और कोनसा ग्रह तात्कालिक शत्रु है.

तात्कालिक चक्र
तात्कालिक चक्र

उपरोक्त नियमनुसार सूर्य जिस स्थान पर है वहा से दुसरे स्थान में कोई ग्रह नहीं तीसरे में शनि इस कारन सूर्य शनि मित्र हुए, सूर्य से चतुर्थ में कोई ग्रह नहीं और तुला जहाँ सूर्य है से दशम स्थान कर्क में भी कोई ग्रह नहीं है लेकिन 11 सिंह में मंगल है. इसलिए मंगल सूर्ये भी मित्र हुए.फिर 12 वे में कोई नहीं है.

मतलब ये निकला की शनि सूर्य मंगल आपस में तात्कालिक मित्र है.अब यदि शत्रुता देखनी हो तो ऊपर लिखे नियम से जो ग्रह सूर्य के साथ है वे शत्रु हुए, यहाँ सूर्ये के साथ शुक्र बुध साथ में है और अस्त भी है इसलिए ये दोनों सूर्ये के शत्रु हुए.

कुंडली में देखने पर पता चलता है की सूर्य से छटे चन्द्र है और नवं में गुरु है जो की नियमनुसार सूर्य के शत्रु है.अभिप्राय ये निकला की सूर्य के बुध, शनि , चन्द्र, और गुरु शत्रु है. और शनि एवं मंगल मित्र है. उपरोक्त नियम को सुगमता पूर्वक यो समझा जा सकता है की किसी ग्रह से 3 राशी आगे और 3 राशी पीछे जो ग्रह होगा वो तात्कालिक मित्र होगा बाकी सब शत्रु होंगे.

ग्रहमित्रशत्रु
सूर्यशनि,मंगलबु शु,च गुरु
श गुसु,बु,शु,म
मंगलसु, बु,शु,गुश, च
बुधश मनसु,शु,चन्द्र,गुरु
गुरुम चसु बु,शु,श
शुक्रश मंगलसु बु च गुर
शनिसु बु शु चगु मंगल

पंचधा मैत्री चक्र

ऊपर के उधाहरण में आप देख चुके है की ग्रहो की अपस में नैसर्गिक तथा तात्कालिक मित्रता शत्रुता और समता होती है. अब प्रशन ये उठता है की वास्तव में कोन ग्रह,किस ग्रह का नैसर्गिक भाव में मित्र है परन्तु तात्कालिक शत्रु है. या नैसर्गिक शत्रु है पर तात्कालिक मित्र है. तथा इसका परिणाम क्या होता है.ज्ञानियों ने इस मित्रमित्र के अंतिम सम्बन्ध को पंचधा मैत्री चक्र कहा है.क्योकि इसका सम्बन्ध पञ्च प्रकार का होता है. जैसे-

1- एक तरह से मित्र दुसरे से शत्रु,2 दोनों तरह से मित्र 3 एक तरह से मित्र दुसरे से शत्रु 4 एक तरह से सैम दूसरी से शत्रु 5 दोनों तरह से शत्रु यदि दोनों तरह से मित्र हो तो अति घनिष्ट मित्र यदि एक से सम दूसरी से शत्रु हो तो मित्रता शत्रुता का परिणाम समता होता है. एक रीती से सम और दूसरी से और दूसरी से शत्रु हो तो परिणाम शत्रुता होगा, इस्सी तरह से दोनों तरह से शत्रु हो तो परिणाम अतिशात्रुता होगा.

मैत्री चक्रों का परिचय

नीचे यहाँ पंचधा मैत्री चक्र दिया जा रहा है.

ग्रहअतिमित्रमित्रसमशत्रुअतिशत्र
सूर्यमंगलगु श चबुशु
चन्द्रश गुसु बुसु म
बुधमनसु शुगु
गुरुमन चसुबु शु
शुक्रमनबुधगुरुसु च
शनिबु शुसु चगुसु च
मंगलसु बूसु चगुमन
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