मुहूर्त

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मुहूर्त
मुहूर्त

फलित ज्योतिष के गणना खंड में मुहूर्त भी अपना एक विशेष स्थान रखता है. यानि कार्य को आरम्भ करने का कोई विशेष समय क्या हो?

फलित ज्योतिष की गणना अनुसार निकला गया वह समय जब किसी कार्य को आरंभ करना हो को मुहूर्त के अंतर्गत रखा गया है. फलित ज्योतिष के अनुसार निकला गया कोई समय जिसपर यात्रा आदि आरंभ की जा सके .

पश्चिमी देशो के प्रभाव में आकार आज कल के लोग विशेष कर युवा वर्ग इन चीजो को नहीं मानते है. बल्कि इस और ध्यान भी नहीं देते है. इनका तर्क होता है की अन्य जाती धर्म के लोग तो इन बातो का विचार नहीं करते है जहा चाहते है चले जाते है जो जब चाहते है करते है. अतः जब उन लोगो को कुछ नहीं होता तो हम ही क्यों इन ढकोसलो को ढोते फिरे.

प्रशन बड़ा गंभीर है? लेकिन हमारी राय मान कर एक उदहारण ले की जैसे कोई रोग जब फेलता है तो जैसे (कोरोना) मास्क लगाने वालो तक को भी हो रहा है लेकिन बिना मास्क वालो को नहीं हो रहा है. इसी प्रकार प्लग रोग ग्रस्त महिला अपने बच्चे को दूध पिलाती है तो बच्चे को रोग नहीं होता जबकि माता को होता है.

बहुतेरे लोग रोगियों की मदद करते है उनकी बीच में रहते है उनका बल भी बांका नहीं होता जबकि कुछ लोगो को रोग हो जाता है. इसके पीछे क्या कारण है ?

प्राचीनता

ऋषियों ने अत्यंत प्राचीन काल में अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा ये पता लगा लिया था कि किस- किस वार , तिथि नक्षत्र लग्न के रहने पर कोनसा समय किसी काम को शुरू करने के लिए शुभ रहता है. अर्तगत किसी विशेष समयावधि में किसी कार्य को करने का एक विशेष शुभकाल होता है. लेकिन यदि आपका भाग्य और पूर्व जन्म के कर्म यदि नीच है तो कार्यमे सफलता मिलना कठिन होता है.

अतः बावजूद इसके यदि आपने किसी कार्य को करने के लिए कोई विशेष समय मुहूर्त निर्धारित करके काम किया है तो सफलता अवश्य मिलती है. आप इस कथन को बिलकुल भी हंसी में न उड़ा दे मुहूर्त का विचार बहुत व्यावहारिक है. इसके लिए हमें पंचांग की जरुरत होती है.

यात्रा सम्बन्धी मुहूर्त

आपको यह बता दे की पक्ष दो होते है एक क्रिशन पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष.अतः यदि यात्रा सम्बन्धी मुहूर्त ज्ञात करना हो तो दोनों पक्षों की 2,3,5,7,10,11,13,और केवल क्रिशन पक्ष के प्रथम तिथि को पंचांग में देखना चाहिए.

दिवस – सोम , बुध, गुरु शुक्र, वार अच्छे होते है और रवि व् मंगल माध्यम, और शनि अधम वर होते है.

दिशा शूल विचार – सोमवार , गुरु वर को पूर्व में , सोम , गुरु को ही अग्नी कोण दिशा में, गुरु को दक्षिण में, रवि तथा शनि को नैरित्य कोण दिशा में, रवि , शुक्र को पश्चिम में , मंगल को वायव्य कोण में मंगल तथा बुध को उत्तर दिशा में बुध शनि को ईशान दिशा में दिशा शूल रहता है. दिशा शूल का पीठ पीछे और left side में रहना शुभ होता है.

विवाह सम्बन्धी मुहूर्त

इन्हें चालू वर्ष के पंचांग में देखना चाहिए .

नाम कारण मुहूर्त

नए जन्मे बच्चे का नाम कारण संस्कार जन्म के दिन से 3,5,7,9,11,वे दिन करना चाहिए.और यदि लड़की पैदा हुई हो तो 10,16,18,20,वे दिन करना चाहिए और रवि , सोम, बुध, शुक्र वार शुभ दिन होते है.

मुंडन संस्कार –

शुक्ल पक्ष की 2,3,5,7,10,11,13 तिथि को व् क्रिशन पक्ष की 13 तिथि को छोड़ कर सामान तिथियों में मुंडन संस्कार करवाना चाहिए. दिन सोम भूध गुरु शुक्र अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु पुष्य ,हस्त , चितरा , स्वाति , अनुराधा, ज्येष्ठ , श्रवण , धनिष्ठा , शतभिषा और रेवती नक्षत्रो का समावेश होना चाहिए.

उपनयन यज्ञोपवित मुहूर्त

शुक्ल क्रिशन पक्ष की 2,3,5,सामान तिथि है और शुक्ल 10,11,12 तिथियों तथा में उन्प्नयन संस्कार करवाना चाहिए अह्विनी, मृग्शिरा , पुष्य, हस्त, चित्रा , स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा और रेवति ये श्रेष्ठ नक्षत्र है. व् रोहिणी आर्द्रा ,पुनर्वसु, श्लेषा, पूर्व भाद्रपद, पूर्व शाध,पूर्व फाल्गुनी,उत्तराभाद्रपद, उत्तर षाद ,उत्तर फाल्गुनी , अनुराधा,मूल तथा शतभिषा ये नक्षत्र माध्यम है,

वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनू मीन, इनमे भी कर्क, वृष विशेष शुभ राशी मानी जाती है.

विद्या आरंभ-

शुक्ल पक्ष की 2,5,6,10,11 12 तिथिया ,सोम, बुध, गुरु , शुक्र, श्रेष्ठ वार होते है.अश्विनी , रहिणी , आर्द्रा , पुनर्वसु, पुष्य हस्त चित्र,स्वाति, अनुराधा ज्येष्ठा , श्रवण,रावती, नाक्षतरो में व् वृष, मिथुन,कन्या, धनु, मीन, में राशियों के होने पर विद्या आरंभ करवाना चाहिए.

धार्मिक कामो के मुहूर्त

किसी भी धार्मिक काम के लिए निम्नलिखित मुहूर्त शुभ माँने जाते है.

दोनों पक्षों की 2,3,5,6,7,8,10,11,12,13 क्रिशन पक्ष के प्रथम और शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भी मान्यता प्राप्त है. कुछ कामो में अमावस्या भी गृह्ये है. अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य , उत्तर भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त चित्र स्वाति , अनुराधा,श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा.रेवति, दिवसों में रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक्र, का महत्व होता है.

घर का निर्माण मुहूर्त

शुक्ल व् क्रिशन पक्ष के 2,3,5,6,7,8,10,11,12,13 क्रिशन पक्ष की प्रतिपदा (1) शुक्ल पकदा की पूर्णिमा तिथि मान्य है. रवि मंगल को छोड़ कर सभी दिवस मान्य है. रोहिणी , मृगशिरा , पुनर्वसु, पुष्य, तीनो उत्तरा, हस्त चित्र स्वाति अनुराधा.धनिष्ठा, शतभिषा और रेवति नक्षत्र ,लग्न- वृष, मिथुन , सिंह, कन्या , मीन, धनु, में व्यक्ति का घर का निर्माण आरंभ होना चाहिए.

ग्रह प्रवेश मुहूर्त.-शुक्ल पक्ष की 2,3,5,6,7,8,10,11,12,13 तथा पूर्णिमा तिथि.व् क्रिशन पक्ष के 1,2,3,4,5,6,7,8,10 तिथियो में रवि तथा मंगला को छोड़ सभी दिवसों में, रहिणी, मृगशिरा , तीनो उत्तरा , चित्र अनुराधा धनिष्ठा ,शतभिषा रेवति. लग्न- वृष, मिथुन, सिंह, कन्या ,वृश्चिक, धनु, कुम्भा, मीन,श्रेष्ठ माह, – वैशाख ज्येष्ठा ,माघ, फाल्गुन,नए घर में प्रवेश के लिए, और पुराने घे में प्रवेश करना होतो कार्तिक श्रवंण मार्गशीर्ष

व्यापार आरम्भ करने के लिए-मुहूर्त

दोनों पक्षों की 2,3,5,6,7,8,10,11,13 तिथिया लेनी चाहिए,क्रिशन पक्ष की प्रथम शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि भी लेने चाहिए

अश्विनी , रहिणी, मृगशिरा, पुष्य, तीनो उत्तरा, हस्त चित्र, स्वाति अनुराधा मूल शरवन, धनिष्ठा पूर्व भद्र पड़ रेवति. को व्यापार आरम्भ करने के मुहूर्त में मान्यता प्राप्त है.

मुहूर्त साधन के कुछ आवश्यक नियम

ज्योतिष शास्त्र में शुक्र सोंदर्य और सांसारिक सुखो को देने वाला ग्रह मन गया है. इसलिए सभी कार्यो में शुक्र दोष को महत्व देना अनिवार्य मन गया है. सभी पंचांगों में शुक्र उदय और शुक्र अस्त का समाए दिया रहता है. और वह किस दिश में उदय या अस्त होगा भी दिया रहता है.शास्त्रों में लिखा है की बाल, वृद्ध, और अस्त शुक्र के समाए में कोई काम नहीं करना चाहिए.

कई प्रकार की यात्राओ में शुक्र के आगे पीछे दाए बाय रहना शुभ अशुभ माना गया है. जैसे यदि शुक्र पूर्व उदय होते है तो शुक्र पूर्व में सम्मुख और उत्तर दिशा के यात्रा करने के समय दाहिने होगा इसी तरह पश्चिम और दक्षिण दिशा में जाने वाले के लिए बाए और पीछे होगा. इसी तरह शुक्र के पश्चिम दिशा में उदय होने पर भी विचार किया जाता है.

किसी आवश्यक कार्य के होने पर उसकी दिशा न बहती हो तो ऐसे में शुक्रंध कहा जाता है लेकिंग शुक्रंध में आवश्यक यता की जा सकती है. रेवती अश्विनी भरनी कृतिका के प्रथम चरण में जब तक शुक्र रहता है शुक्रांध होता है. अर्थात इन नक्षत्रो के न बनने पर भी आवागमन की यात्रा की जा सकती है.

क्षय मॉस

जब चन्द्रमा की दो अमावस्या के बीचमे सूर्य की दो सक्रन्तिया पड़ती हो तो क्षय मॉस कहलाता है.

अधिक मॉस –

जब दो अमावस्या पड़ रही हो लेकिन उनके बीच में सूर्य की संक्रांति न पड़ती हो तो अधिक मॉस कहलाता है.

क्षयतिथि

जब किसी वार दिवस में तीन तिथिया कुछ कुछ पड़ती हो तो क्षय तिथि कहलाती है.

जब एक तिथि 3 वार दिवसों में कुछ कुछ पड़ती हो तो वृद्धि तिथि कहलाती है.

भद्रा- ये सभी पंचांगों में दिया रहता है. जब भद्र का वास कर्क, सिंह , कुम्भ, मीन में होतो उसका वास मृत्यु लोक में होता है अर्थ इस समय में शादिय नहीं होती है. यात्राए नहीं करने चाहिए.

तिथियों के नाम – 1-6-11 को नंदा कहते है.,3,8,13 को जया तिथि कहते है, 2,7,12 को भद्र तिथि कहते है.4,9,14 को रिक्त तिथि कहते है. 5,10,15 को पूर्ण तिथि कहते है.

शुक्रवार को नंदा, बुधवार को भदरा, मंगल वार को जया, शनि वर को रिक्ता गुरूवार को पुर्णा हो सभी दोषों का निवारण हो जाता है.

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