मासादि पक्ष विचार

भारतीय ज्योतिष में चार प्रकार के महीनो का वर्णन मिलता है, इसी को मासादि पक्ष विचार के अंतर्गत आपको बताएँगे .

मासादि पक्ष विचार
मासादि पक्ष विचार

आप में से कईयों ने सुना होगा, पढ़ा हेगा कि फलां तारीख से अधिक मास लग है, फला से क्षय मास लग रहा है, वगैरा-वगैरा। तो आखिर ये सब होता क्या है? तो आइये इसे “मासादि पक्ष विचार” के अंतर गत भला क्यों न जाने !

चार प्रकार के मासादि पक्ष विचार

1 चान्द्रमास-शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक 1 चंद्रमास होता है।
2 सौर मास-सूर्य की 1 संक्रांति से दूसरी संक्राति तक। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रांति होती है। जैसे मेष राशि के बाद सूर्य वृष राशि में जिस दिन आया उसी दिन वृष की संक्रति होती है।
3 सावन मास– 30 सावन दिन त्र सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को 1 सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार 30 दिन का 1 सावन मास होता है। सावन दिन यह नक्षत्र मास से 4 दिन बड़ा होता है। सावन दिन सदैव समान नहीं होता है।इस कारण मध्यम सावन दिन का मान लिया जाता है और उसी का समय घड़ियों से जाना जाता है।
4 नक्षत्र मास अश्विन आदि 27 नक्षत्रों में चन्द्र एक बार पूरा घूम लेता है तब चन्द्र का मास होता है।
चन्द्र के बारह मास के नाम
1 चैत्र 2 वैशाख 3 ज्येष्ठ (जेठ) 4 आषाढ़
5 श्रावण 6 भाद्रपद 7 आश्विन कुवांर 8 कार्तिक कातक
9 र्मागशीर्ष 10 पौष पूस 11 माघ 12 फाल्गुन
इन महीनों के उपरोक्त नाम पड़ने का कारण यह है कि इन्हीं महीनों की पूर्णिमा के लगभग ये नक्षत्र पड़ते है।
1 अमान्त मास- शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक 1 मास होता है। यह दक्षिण में महाराष्ट्र राज्य में लागू होता है।

दो प्रकार चंद्र मास

2 पूर्णिमांत मास- कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक 1 मास यह उत्तर भारत में चालू रहता है।
दोनों प्रकार के मास में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि एक जगह पूर्णिमा या अमावस्या हुई तो सर्वत्र ही उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या अवश्य होगी। केवल मास गणना में कृष्ण पक्ष में अपने यहाँ 1 मास का अंतर पड़ जाता है। जैसे अपने यहाँ चैत्र कृष्ण पक्ष हुआ तो महाराष्ट्र में उसे फाल्गुन कृष्ण पक्ष कहेंगे अर्थात कृष्ण पक्ष में अपने मास मास से 1 मास कम महाराष्ट्र लोगों का मास होता है। मराठी मिले कृष्ण पक्ष में 1 मास बढ़ा कर लेना चाहिए। परन्तु शुक्ल पक्ष में दोनों प्रकार के पंचांग में कोई अंतर नहीं पड़ता।

बंगाली मास

-सूर्य की निरयन संक्रांति से आरम्भ होता है और मेषार्क (मेष की संक्रांति से नया बंगला सन आरम्भ होता है। मीनार्क से चैत्र मास आरम्भ होता है और मेषार्क में वैशाख मास होता है। जब वर्ष आरम्भ होता है तब संक्रांति जिस दिन होती है उसके दूसरे दिन से बंगला की पहली तारीख मिनी जाती है। किसी महीने में 29-30-31 या कभी 32 दिन पड़ जाते हैं।

पलुत वर्ष

– स्मंच लमंते. लीप इयर में फारवरी 29 दिन की होती है। जिस सन में 4 का भाग पूरा लग जाये या सदी में 400 का भाग पूरा लग जावे तो उसे पलुत वर्ष कहते है। शेष वर्षों में फरवरी 28 दिनों की होती हैं।

सौर मास और संक्रांति

सूर्य जब 1 राशि के अंत में जाकर दूसरी राशि में संक्रमण करता है। तब उसे संक्रांति कहते है। अर्थात जब 2 राशियों की संधि पर सूर्य आता है तब आगे की राशि में संक्रांति होती है। इस प्रकार सौर मास में एक संक्रांति होती है। जिस राशि पर सूर्य जाता है उस राशि की संक्रांति कहलाती है।

अधिक मास-

जिस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हें। अर्थात जब दो पक्ष में संक्रांति नहीं होती है तो उसे अधिक मास कहते हैं। जेसे सम्वत 1999 में वैशाख कृष्ण 13(ता.13 अप्रेल) को मेष संक्रांति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण 14 को तारीख 14 मई वृष की संक्रांति हुई। इसके उपरान्त फिर तारीख 14 जून शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन राशि पर सूर्य गया अर्थात मिथुन की संक्रांति हुई वृषार्क शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष को था। उसके बाद अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और फिर अधिक जयेष्ठ कृष्ण पक्ष बीत गया, परन्तु इन दोनों के बीच संक्रांति नहीं हुई। इस कारण ये दोनों पक्ष अधिक मास माने गये।

32मास 16 दिन 4 घड़ी बीतने पर अधिक मास होता है। अर्थात तीसरे वर्ष अधिक मास होता है। और उस वर्ष में 13 मास होते हैं।

क्षय मास-

जिस चान्द्र मास के 2 पक्ष में 2 संक्रांति होती है उसे क्षयमास कहते हैं। क्षय मास केवल कार्तिक आदि 3 महिनों में पड़ता है और महीनों में नहीं पड़ता। जिसे वर्ष मास क्षय होता है उस वर्ष एक वर्ष के भीतर 2 अधिक मास होते है।

पक्ष- चान्द्र मास में 2 पक्षत्रहोते हैं जब सूर्य अस्त के बाद कुछ समय तक अंधेरी रात हो जाती है या सम्पूर्ण रात भर या रात के कुछ भाग तक ही सूर्यास् के बाद अंधेरा रहे उसे कृष्ण पक्ष कहते है।जब सूर्यास्त के उपरान्त कुछ समय या सम्पूर्ण रात भर चन्द्र का प्रकाश रात्रि को रहे तब उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।

यहां हमने आपकी जानकारी के लिए भारत में प्रचलित विभिन्न प्रकार के मास यानि महीनो को विषद वर्णन किया है आशा है आपको मेरी यह जानकारी जरुर पसंद आई होगी . धन्यवाद

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