विवाह के नियम

Read Time:8 Minute
Page Visited: 111
मनुस्मृति-के-विवाह-नियम
मनुस्मृति-के-विवाह-नियम

विवाह के नियम भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है हिन्दू धर्मं में शादियाँ इन्ही नियमो के अंतर्गत ही संपन्न होती है.

हिन्दू धर्म में हमारे पूर्वजो ने स्त्री पुरुष के लिए कुछ विवाह सम्बन्धी नियम बनाये है जिनका उल्लेख हम यहाँ अपनी इस पोस्ट मनु स्मृति के विवाह नियम में कर रहे है.इसमें हिंदू धर्म से सम्बंधित नियमावली स्थित है इसमें ही हिंदू विवाह पद्धति का भी सार निधित है इस ही हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे है .

संस्कृति मनुस्मृति-के-विवाह-नियम

विवाह के नियम से जीवन में एक सीमांकन होता है यह प्यार और स्नेह पर आधारित एक संस्था है . विवाह सन्स्था का आरंभ भारतीय संस्कृति में पारिवारिक गठबंधन व् जीवन में वस्तुनिष्ठ मांगो को लेकर की गई एक जटिल संरचना भी है.

चूँकि हमारा सम्बन्ध मात्र मानो ज्योतिष,पहलुओ से है अत: हम अपने अध्ययन के में क़ानूनी और सामाजिक महत्व के वस्तुनिष्ठ तथ्यों को शामिल नहीं करेंगे.

विवाह विवाह सन्स्था का आरम्भ भारतीय संस्कृति में पाशविक वासना की तुष्टि के लिए नहीं किया गया था . यह एक एइसा सामाजिक नियम है जिसका आधार परिवार है इसकी स्थापना एक सामाजिक हित की बात होती है. 

1 कन्या का विवाह 16 वर्ष की उम्र के बाद ही होना चाहिए।

2 महिलाओं को घर चलाने की सभी जिम्मेदारियां दी जानी चाहिए। जिसमें धन, सम्पत्ति, खर्च योजना, धार्मिक कृत्य, रसोई आदि सभी शामिल हैं।

3 महिलाओं को श्री लक्ष्मी समझते हुए उनका सम्मान किया जाना चाहिए।

4 हर पुरूष को वही महिला मिलती है जो पत्नि के रूप में नियत है। इसके लिए उसे देवताओं का आभारी होना चाहिए।

5 पति व पत्नि को अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों का निर्वाहन करते हुए सामंजस्यपूर्ण तरीके से जीवन यापन करना चाहिए।

6 उन्हें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे उनके बीच में दरार या तनाव पैदा हो।

7 यदि आजीविका के लिए पुरूष को विदेश जाना है तो जाने से पहले उसे सभी आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था करके जाना चाहिए।

8 यदि कन्या के विवाह से पहले बिमारी, हिंसक प्रवृत्ति, जैसी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं छिपाई गई हों तो विवाह नहीं हो सकता।

9 यदि कोई महिला एक वर्ष के भीतर अपने पति के प्रति शत्रुता का भाव नहीं छोड़ती है तो उसके आभूषण आदि जब्त कर उसे त्याग दिया जाना चाहिए, लेकिन पुरूष में कमियों के कारण वह ऐसा व्यवहार करती है तो उसे इस तरह नहीं छोड़ा जा सकता।

10 कन्या का विवाह किसी भी कुपात्र से नहीं किया जाना चाहिए।

11 यदि विवाह योग्य उम्र हो जाने के तीन वर्ष बाद भी पिता कन्या का विवाह न कर पाये तो उसे स्वयं अपनी पसंद के व्यक्ति को छाँट लेना चाहिए।

प्राचीन समय में विवाह के प्रकार-

प्राचीन समय में आठ प्रकार के विवाहों का प्रचलन था और माना जाता है कि समाज में विकास की प्रक्रिया के निम्न से उच्च स्तर तक उनका क्रमिक विकास हुआ है।

मनुस्मृति-के-विवाह-नियम

यह आठ प्रकार के विवाह हैं-

ब्रह्म, देव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गंधर्व, राक्षस, पैशाच्य। इनमें से पैशाच्य सबसे निम्न किस्म का माना जाता है तो ब्रह्म को सर्वोपरि रखा जाता हैं।

महार्षि मनु ने इन विवाहों को पूर्ण विवरण देते हुए विभिन्न वर्णो के लिए उपयोगी प्रकारों को बताया है, तो सभी कमियों और विशेषताओं को भी सामने रखा है।उनके अनुसार ब्राह्मण के लिए छइ प्रकार के विवाह उचित हैं।

क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गंधर्व विवाह उचित हैं।

राक्षस व पैशाच किस्म के विवाह किसी के लिए उचित नही और सभी को उनसे बचना चाहिए।

विवाहों का वर्णन

1 ब्रह्म- इसमें कन्या का पिता सब प्रकार के योग्य वर व उसके परिजनों अपने घर बुलाकर धार्मिक रीति रिवाज से अपनी पुत्री का विवाह करके कन्या दान करता है।

2-दैव- इस प्रकार के विवाह में कन्या का पिता यज्ञ करने वाले वर को छांट कर उसे कन्या का दान देता है।

3-आर्ष- यह दूर दराज के पर्वतीय हिस्सों में ही प्रचलित हैं जिसमें कन्या का पिता अपनी पुत्री से विवाह करने के इच्छुक वर से गायें लेकर अपनी पुत्री का विवाह संपन्न करता है।

4 प्रजापत्य- इसमें प्रजापति ब्रह्मा का कर्जा उतारने के लिए कन्या का पिता योग्य वर को यह कहते हुए अपनी कन्या दान करता है कि कि वे सुख पूर्वक रहते हुए संतान उत्पन्न करें और उसका पालन पोषण करें।

5असुर- विवाह के लिए कन्या के परिजनों को धन व कन्या को आभूषण आदि देना असुर विवाह कहलाता है।

6गंधर्व- आपस में आकार्षित होकर जब बिना किसी रीति रिवाज व विधियों का पालन न करते हुए एक स्त्री व एक पुरूष विवाह कर लेते हैं तो उसे गंधर्व विवाह कहते है।

7राक्षस- किसी कन्या व उसके परिवार की सहमति के बिना उसका अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह की श्रेणी में आता हैं। इसमें प्रेम व आकर्षण के लिए कोई स्थान नहीं होता र्है।

8 पैशाच- सबसे निकृष्ठ माने जाने वाले इस विवाह में उसे रखा जाता है जहां निद्रामग्न, नशे से अर्ध मुर्छित, शील की रक्षा में अक्षम किसी कन्या से जबरन मैथुन करके उसे विवाह के लिए मजबूर किया गया हो।

“मनुस्मृति-के-विवाह-नियम” में से आजकल ब्रह्म व गंधर्व विवाहों का ही प्रचलन अधिक हो गया हैं। पहले में परिवार के द्वारा विवाह की व्यवस्था की जाती है और सारे धार्मिक कृत्यों के बाद वह विवाह सम्पन्न होता है। दूसरे को बहुधा प्रेम विवाह कहा जाता है।जिसमें दोनो परिवारों की सहमति भले हो न हो  लेकिल युवक व युवति आपस में स्वेच्छा से आपस में विवाह कर लेते हैं।

0 0
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Leave a Reply

अपनी कुंडली स्वयं बनाओ

बनी हुई कुंडली को देखन या कंप्यूटर से कुंडली बनाना एक ही बात है लेकिन अपनी कुंडली बनाओ इसको यहाँ बताना हमारा उद्देश्य है.

मंगल दोष विचार

मंगल दोष विचार परम्परागत ज्योतिषियों द्वारा जनमानस में बैठाए मंगल दोषो के भय को दूर करना ही हमारे इस पोस्ट का उद्देश्य है. तो आइये...