मंगल दोष विचार

मंगल दोष विचार

परम्परागत ज्योतिषियों द्वारा जनमानस में बैठाए मंगल दोषो के भय को दूर करना ही हमारे इस पोस्ट का उद्देश्य है. तो आइये मंगल दोष विचार करे..

उत्तर भारत में मंगल दोष का उतना भय नहीं है जितना दक्षिण भारत के ज्योतिषियों द्वारा वर – वधु के माता पिता में उनके द्वारा भर दिया जाता है. मंगल दोष विचार क्या है? यही की मंगल के जो स्थान कुंडली में परम्परा से निर्धारित कर किये गए है, क्या वाकई मंगल वहां स्थित होकर दोष उत्पन्न करता है. कुछ स्थितियों में हां और कुछ स्थितियों में नहीं।

मंगल के प्रभावों को केवल लग्न से ही नहीं बल्कि चंद्र और शुक्र से भी देखा जाना चाहिये।क्या हमने कभी सुना है की मंगल के अतिरिक्त किसी और ग्रह ने वर वधु को परेशान किया है. क्या चंद्र सूर्य आदि ग्रह इन्हे परेशान नहीं करते है. इसका उत्तर केवल परम्परागत विपरीत धारणाओं में छुपा है.ज्योतिषी मंगल के दोषो को बढ़ा चढ़ा कर बताते है.

मंगल की प्रकृति , मंगल का अधिपतित्व, उसका अनुकूल – प्रतिकूल होना, सभी राशियों में प्रभावों का अवलोकन, विभिन्न भावो में उसके प्रभावों का अवलोकन, क्या मंगल दोष का सम्बन्ध साथी की मृत्यु से उप्तपन्न वैधव्य या अलगाव ही है, उस समय मंगल कुन्डली में क्या प्रभाव देगा यदि उच्च, नीच, सम ,आदि अवस्थाओं में हो, क्या मंगल के साथ संयुक्त ग्रह उसके प्रभावों को कम या अधिक करते है. अन्य ग्रहो की दृष्टि के क्या प्रभाव मंगल पर पड़ते है. का अवलोकन हम आगे करेंगे।

मंगल की दो राशियों (मेष , वृश्चिक) वाले जातक के लिए मंगल शुभ ग्रहो होता है. लेकिंन यदि इन्ही राशियों का लग्न होतो मंगल 6ठे और 8 वै का स्वामी हो कर जातक के जीवन में कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है.

कर्क, सिंह, धनु, और मीन राशियों में उत्पन्न लोगो के के लिए मंगल राजयोगकारी होता है.लेकिन बुध की राशियों मिथुन,कन्या, विशेषकर कन्या के लिए ये एक पाप ग्रह होता है. शुक्र की स्वामित्व वाली राशियों के लिए भी शुभ नहीं होता है.शनि की राशियों मकर और कुम्भ लगन वालो के लिए विशेष शुभ और हितकारी।

मंगल की प्रकृति

ये जब अनुकूल राशियों में या शुभ भावो का स्वामी होता है. तो साहस, उद्यमिता प्रदान करता है. मंगल व्यक्ति को हृष्ट-पुष्ट स्वास्थ्य प्रदान करता है. मंगल दवारा प्रयासों में सफलता और शत्रु पर विजय प्राप्त होती है. यदि कुन्डली मे मंगल सुस्थित हो तो जातक को भू संपत्ति व् भवनों का लाभ प्राप्त होता है.

जब मंगल बुरे भावो 6, 8, व् 12 का स्वामी होता है. तो अशुभ बन जाता है. ये व्यक्ति को घमंडी,कठोर ,क्रूर बनता है. जातक खर्चीला, आवेगशील, और जल्दबाज होगा,बहस के कारण सम्मना और पद खो देगा।वह शांति हीं और झगड़ालू होगा। असामंजस्य पूर्ण विवाद और कठिनाइया मंगल के अवगुण है. दुर्घटना, चोट,आग से मृत्यु,घाव जलना हत्या भी मंगल के अवगुण है.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

शैशवावस्था में यह बच्चो में जिगर की वृद्धि का कारण उनका शारीरिक विकास नहीं होने देता है. इसके कारण बच्चे आसानी से संक्रमित हो जाते है. युवा वस्था में लड़किया मंगल के कारण रजोधर्म सम्बन्धी गड़बड़ियों के कारण परेशान रहती है.

नियम

पहले हम आपको मंगल सम्बन्धी नियमो से परिचित कराएंगे। फिर अपनी सम्मति देगे।

मंगल

माना की यहाँ लग्न मिथुन 20 अंश पर है, चंद्र सिंह में 10अंश पर है, और शुक्र वृश्चिक में २० अंश पर है और मंगल धनु में 1 अंश पर है, हमें मंगल की स्थिति की गणना केवल राशि से राशि तक ही करनी है.

मंगल यहाँ लग्न से सप्तम है.अत: मंगल दोष है. लेकिन चंद्र से पंचम है तो दोष नहीं है. शुक्र से द्वितीय है अत: दोष सिद्ध है.यदि मंगल लग्न से , चंद्र से, एवं शुक्र से 1 -2 -4 -7 -8 -12 भाव में हो तो मंगल दोष मन जाता है. इन भाव स्थितियों को केवल विवाह के समय में ही देखना उचित अन्य अवसरों पर नहीं। यहाँ हमें विवाहित जीवन में मंगल के फलो पर विचार करना होता है. जैसे विवाह निर्धारण का समय,विवाह आयोजन का समय,और विवाहित जीवन की अवधि में मंगल के फलो पर ही विचार करना होता है.

A लग्न स्वास्थ्य , दीर्घायु और व्यक्ति की विशेषताओं को सूचित करता है. क्योंकी सातवाँ भाव साथी को सूचित करता है, और साथ ही मारक भाव भी होता है.

b -दूसरा भाव घरेलु जीवन में पारिवारिक सुख शांति का, विवाहोपरांत बच्चो के जन्म दवार पारिवारिक वृध्दि को सूचित करता है. इसके अलावा दूसरा भाव सातवे से अथवा है जो साथी के जीवन को खतरा और कठिनाइया दिखता है.

c चौथा भाव पारिवारिक वातावरण को सूचित करता है. ऋषियों का कथन है की चौथे और आठवे यदि पाप ग्रहो के अधिकार में हो तो वे इन भावो को ख़राब करते है. यदि चौथे भाव मंगल होता है तो यह जातक के स्वास्थ्य,संपत्ति को हानि पहुंचता है.

d सातवे भाव से क़ानून ,पति – पत्नी, दोनों का स्वास्थ्य, दोनों की दीर्घायु, आपसी विशेषताएं, आपसी मेल मिलाप की सुचना मिलती है. अत:सप्तमस्थ मंगल का यहाँ होना शुभ नहीं है.

e आठवाँ भाव जातक की कठिनाइयों, साथी के धन और भाग्ये के साथ उसकी दीर्घायु को बताता है. इस तरह मंगल का यहाँ रहना शुभ सूचक नहीं है.

f बारहवे भाव से वास्तविक सुख,जिसे पति पत्नी प्राप्त करते है , धोखा हानि आदि को सूचित करता है.

इसके अलावा 3सरा भाव भाई, 5 वा भाव संगीत चिंतन एवं संतान , 6 छठा भाव कर्म , रोग, 9 वा भाव पिता,10 व भाव व्यवसाय , और 11 वा भाव लाभ को सूचित करता है.

माना कि लग्न हमारा घर हर है, 2 और 12 हमारा पड़ोस है. भला मंगल के रहते भला कोई कैसे शांत रह सकता है. यदि दुष्ट लोग पड़ोसी हो जाए तो हम भला कैसे शांत रह सकते है.इसी तरह यदि 7 वे भाव में से कोई दुष्ट व्यक्ति हमें देखे तो जान को खतरा है.अत यहाँ भी मंगल का होना ठीक नहीं। और 4 – 8 के लिए हम पहले ही बता चुके है, की दुष्ट ग्रहो का यहाँ होना ठीक नहीं होता है. यदि अच्छे स्वास्थ्य, अच्छी पारिवारिक स्थिति चाहिए तो यहाँ मंगल का होना ठीक नहीं।

मंगल दोष विचार

यहाँ मंगल लग्न से चौथा है, चंद्र से दूसरा है,और शुक्र से 12 वा है.

मंगल
मंगल दोष विचार

यहाँ जातक चंद्र से मांगलिक है.

मंगल
मंगल दोष विचार

यहाँ जातक चंद्र और शुक्र से मांगलिक है. क्योंकि चंद्र से मंगल दुसरे और शुक्र से बारहवे भाव में है.

मंगल
मंगल दोष विचार

ऊपर जातक लग्न और शुक्र से मांगलिक है लेकिन चंद्र से नहीं शुक्र से दूसरा और लग्न से चौथे मंगल है.

मंगल दोष विचार
मंगल दोष विचार

ऊपर कुंडली में जातक लग्न से मंगली है न की शुक्र और चंद्र से.

शास्त्रानुसार कुन्डली में बजाए शुक्र और लग्न के मंगल चन्द्रमा से उल्लिखित भावो में अधिक ख़राब परिणाम उत्पन्न करता है. यह भी उल्लेख है की 8 वे भाव में मंगल उतना बुरा नहीं होता जितना की ये दुसरे भाव में होता है. आठवे भाव का मंगल केवल विवाह में विलम्ब उत्पन्न करता है. यानि रिश्ते के लिए बातो का होना फिर टूटना ये निरंतर होता रहता है.

मंगल दोष परिहार

1 यदि मंगल स्व राशि मेष, वृश्चिक , 2 अपनी उच्च राशि मकर 3 अपनी नीच कर्क में हो और यदि ये राशियाँ लग्न से 4 थे या 7वै भाव में या चंद्र शुक्र दवारा अधिकृत राशि होती है तो मंगल के अशुभ फलो का निवारण हो जाता है. इसे उदाहरण से समझे

मंगल दोष विचार
मंगल दोष विचार

यहाँ लग्न में मेष , सप्तम में तुला और दशम में मकर राशि स्थित है तो आप देखेंगे की इस स्थिति में मंगल जातक पर विपरीत प्रभाव उत्पन्न नहीं करता है.

  • यदि मंगल चर राशियों (मेष, कर्क,तुला,मकर) में हो या मंगल लग्न से , चंद्र से, शुक्र से गिनने पर 1 -2 -4 -8 -12 में हो तो मंगल के अशुभ फल कार्य नहीं करेंगे। यहाँ देखेंगे की 7 वे भाव को छोड़ दिया गया है.
  • उपरोक्त भावो में मंगल तब अपने प्रभाव को छोड़ देता है जबकि ये उक्त स्थानों में गुरु या बुध के साथ स्थित होता है, या उनकी दृष्टि में होता है.
  • यदि मंगल चतुर्थ भाव में शुक्र की राशियों वृष,तुला, स्वः राशि मेष, वृश्चिक में हो तो मंगल दोष नहीं लगता है.
  • 7 वे मंगल को हानिकारक माना जाता है. लेकिंन फिर भी मेष वृश्चिक, मकर में होता है तो वहां किसी तरह का दोष नहीं होता है.

मेल मिलान

1 ऐसे वर वधु का चुनाव कीजिये जिनके मंगल दोष सामान हो.

2 वर या वधु की कुण्डलिया इस प्रकार से मिलाइये की दोनों के दोष और परिहार सामान हो.

3 दोष रहित वधु की कुण्डली का दोष रहित वर कुन्डली से मिलान करना चाहिए

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