भावो की जानकारी (information of Houses)

कुंडली के 12 भावो से सैकड़ो विषयों को विषय ज्ञान होता है, लेकिन सभी भावो की जानकारी से ही पता चलेगा की किस भाव से क्या फल मिलेगा.

प्रथम भाव (lagn)

शारीरिक गठन , सर ,रूप, ज्ञान, रंग,वर्तमान काल का विचार, सामान्य स्वभाव, स्वास्थ्य प्राण शक्ति ,विचार करने की आदत, व्यक्तित्व, जीवन के लिए संघर्ष प्रयत्नों में सफलता या असफलता , यश,प्रतिष्ठा विदेश में जीवन दूसरो के धन के लिए दाँव लगाना छोटे भाई को लाभ, माता की पितृ संपत्ति,आदि बातो का विचार लग्न से करना चाहिए

इसके अलावा समृद्धि,चेहरे का ऊपरी भाग,सदाचार , आयु नाम यश प्रसिद्धि,,उच्च शिक्षा , लम्बी यात्रा, संतान का का औरो से संपर्क, संतान का छात्रा वास में रहना. मामा को खतरा, साधेदार की मृत्यु, पिता का सत्ता खेलना.बड़े भाई, पडोसी और छोटी यात्राए , ज्योतिष से प्रशन पूछने वाला व्यक्ति

अर्थात उपरोक्त बातो से स्पष्ट है की किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रथम भाव ही उसका सबसे महत्व पूर्ण भाव होता है. यदि किसी की कुंडली में प्रथम भाव सशक्त है तो अन्य भावो के कमजोर होने पर भी वह उन्नति कर लेगा .

यदि प्रथम भाव कमजोर है तो वह जीवन भर संघर्ष ही करता रहेगा.केवल उस भाव से सम्बन्धी ग्रहो की दशा में ही आशा की जा सकती है. जिस व्यक्ति की कुंडली का अध्ययन किया जाता है उसके लिए ज्योतिष में जातक शब्द का प्रयोग किया जाता है.

कुंडली पर विचार करते समय अन्य ग्रहो की भाव में स्थिति ,दृष्टि, नवमांश का भी विचार किया जाता है अत प्रथम भाव की स्थिति सम्पूर्ण जीवन की सफलता असफलता को एक सीमा तक प्रभावित करती है. ग्रहो का परिचय

द्वितीय भाव

व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के बारे में जाना हो तो इसे द्वितीय भाव से जाना जाता है . इसके अलावा अन्य विषय जैसे की -दृष्टि , वाणी , कुटुंब, पत्र लेखन, इन सब विषयों पर विचार करने के लिए द्वितीय भाव को देखा जाता है. मुख्यत द्वितीय भाव को धन अर्जन के लिए ही देखा जाता है यहाँ से उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पति ,शेयर, बैंक में जमा धन भी शामिल होता है.

भाव परिचय
भावो की जानकारी

इसके अलावा द्वितीय भावेश की स्थिति यदि कुंडली में अच्छी हो तो व्यक्ति को सुस्वादु भोजन भी द्वितीयेश उपलब्ध करवाता है. क्योंकि इसका सम्बन्ध भोजन से भी है. कुटुंब में बड़ा होने के कारण कुटुंब के भरण पोषण का जिम्मा भी जातक को उठाना पड़ता है. द्वितीयेश की कुंडली में प्रतिकूल स्थिति हो तो वह अंपने परिवार को साथ नहीं रख पाता है ग्रहो का परिचय

यहाँ से व्यक्ति की वाणी भाषण कला को भी देखा जाता है.यदि इस स्थान पर मूक राशि कर्क, वृशिचिक ,मीन में केतु भी होतो व्यक्ति हकलाने वाल या गूंगा होता है. यदि ये स्थान शुभ प्रभव में होतो व्यक्ति मधुर वाणी का वक्ता होता है. द्वितीय भाव से व्यक्ति की दाई आँख का भी विचार किया जाता है. यदि भाव या भावेश की स्थिति ख़राब होतो दाई आँख लो चोट या चश्मा लगवाना पड़ता है.

तृतीय भाव

जातक के भाई-बहन, दायाँ कान, साहस , वीरता, पड़ोस , छोटी यात्राएं आदि के लिए इस भाव का विश्लेषण किया जाता है. मुख्यतः जातक की वीरता और साहस के लिए तीसरे भाव को देखा जाता है यदि कुंडली के तीसरे भाव में लग्नेश उपस्थित हो तो जातक निश्चय ही सहसी और वीर पुरुष होता है. तीसरी भाव से जातक के छोटे भाई बहिन भी देखे जाते है.यदि यहाँ कोई ख़राब ग्रह यहाँ होतो भाई बहन हन्ही होते है या उनसे रिश्ते ख़राब रहते है. –भावो की जानकारी

क्योंकि तीसरे भाव से कान भी देखा जाता है. इसलिए अशुभ ग्रह का सम्बन्ध यदि तीसरे भाव से हो और उस ग्रह की दशा भी हो तो कान सम्बन्धी पीड़ा व्यक्ति को होती है. राजनितिक ज्योतिष में तीसरे भाव से पडोसी देशो से संबंधो को भी तीसरे भाव से देखा जाता है.

चतुर्थ भाव

अचल संपत्ति, माता , घर, वाहन, जल, के बारे में विचार करना हो तो चतुर्थ भाव को देखते है. मात्री सुख के साथ ही अचल संपत्ति के लिए भी चोथा भाव जाना जाता है. इसमें मकान घर, खेती योग्य भूमि भी शामिल है. कुंडली में चतुर्थेश की अनुकूल स्थिति होने पर बताया जा सकता है की जातक कितना संपत्ति वान होगा. यदि इस भाव पर आशुभ ग्रहो की दृष्टि भी पड रही हो तो सम्पति के क्लेशों को भी झेलना पड़ता है. राशि परिचय

पुराने ज्योतिष के ग्रंथो में रथ वहां के रूप में उल्लिखित है आज के समय में इसे मोटर वहां के रूप में लेना चाहिए. चतुर्थेश के शुभ प्रभाव में होने और यहाँ शुभ दृष्टि होने पर जातक सम्पत्ति शाली होता है. यहाँ शुक्र की उपस्थिति वहान होने का निश्चित प्रमाण है. इसके अलावा इस भाव से जातक की प्रारंभिक शिक्षा का अनुमान लगाया जाता है.

इसके अलावा राजनीतिक ज्योतिष में देश की संपत्ति खनिज संपदा और सीमा विस्तार/संकुचन का प्रभाव भी चोथे भाव से देखा जाता है. शुभ ग्रहो के प्रभाव से शुभ फल और अशुभ ग्रहो के प्रभाव से अशुभ फलो के प्राप्ति होती है. भावो की जानकारी

पंचम भाव

शासन से सम्मानित मंत्री पद धर्ता ,शिक्षा , बुद्धि स्थान, मंत्रोच्चारण, पहली संतान, पेट, प्राथमिक स्तर की शिक्षा.

प्राचीन ग्रंथो में इस भाव से शिक्षा और बुद्धि के ही बारे में अधिक विचार किया जाता है. पर कुछ लोग शिक्ष के बारे में चौथे स्थान को अधिक महत्व देते है. पंचमस्थ राहू या शनि जातक की प्राथमिक शिक्षा में बाधा उपस्थित करते है. लेकिन बुद्धि मान होने के बारे में कोई संशय नहीं होता है. पर पंचम में अशुभ ग्रह हो तो बाधा होती ही है.

इसके प्रमुख कारणों में जातक का बीमार पड़ना. माता पिता का स्थानान्तरण होना, स्कूल का बदल जाना शामिल है. प्राचीन ग्रन्थो में पंचम से शास्त्र ज्ञान का होना कहा गया है. लेकिन आज की परिस्थितियों के अनुसार हम शास्त्र ज्ञान को प्रथम, पंचम, चतुर्थ, व् नवम भाव से रेखांकित कर सकते है.

स्त्री जातक के संदर्भ में पंचमस्थ अशुभ या क्रूर ग्रह फल – प्रथम प्रसव कष्ट पूर्ण होता है. पंचमेश कुंडली में यदि अनुकूल स्थिति में हो तो व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में मंत्री पद दिलवा देता है. यहाँ से राजदूत के पद का भी विचार किया जाता है. भावो की जानकारी

षष्ठ भाव

कर्ज , रोग , शत्रु, भय, पाप कर्म, चोर,, मामा के बारे में इस भाव से विचार किया जाता है. इन विषयों से अनुमान लगा सकते है की इस भाव में स्थित अशुभ ग्रह अशुभ दृष्टि डालने वाले ग्रह,या क्रूर ग्रह, तथाकथित फलो का सृजन करते है. इन्ही ग्रहो की दशा अन्तर्दशा में फलो के उत्पन्न होने की सम्भावना अधिक रहती है.

वैसे इस भाव में अशुभ ग्रहो का का जातक के शत्रुओ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.लेकिन शुभ ग्रहो का इस भाव में शुभ प्रभाव नहीं होता है लेकिन कर्ज अदाएगी संतोष पूर्ण रहती है. शुभ ग्रह यहाँ होकर कर्ज और रोगों से बचते है. लेकिन अन्य मामलो में शुभ नहीं होते है. इस प्रकार इस भाव का अध्ययन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए.

सप्तम भाव

पति या पत्नी , वैवाहिक जीवन, काम-वासना, साझीदार, व्यापार, चोर, यात्रा, प्रतिस्पर्धी. सप्तम भाव सहयोगी, भाव अब इसमें चाहे पत्नी और पति हो या व्यापारिक साझीदार सभी शामिल है. इस भाव की सीमा भोतिक संबंधो पर आधारित है. सप्तम भाव से लम्बी यात्राओ का अंत भी लक्षित होता है. नवम भाव जहाँ लम्बी यात्राओ को बताता है वही सप्तम भाव विदेश यात्राओ को बताता है

विवाह का समय, वैवाहिक जीवन की संगतिया /विसंगतिया सप्तमेश के शुभ अशुभ प्रभावों के कारण लक्षित होती है. हर भाव से भाव से १२वाँ यानी पिछला भाव उस भाव के फलो के व्यय को बताता है. यानि आठवा भाव जहाँ आयु का भाव है वहां सातवा भाव आयु के व्यय का भाव भी है अत सातवे भाव से आयु के समाप्त होने का भी अनुमान लगाया जाता है.

इस प्रकार देखा जाय तो युवावस्था में सप्तमेश जहाँ वैवाहिक संबंधो का द्योतक है व्ही वृद्ध अवस्था में अंत काल को बताता है. इस प्रकार सप्मेश को मारकेश भी कहा गया है. राजनीतिक स्तर पर इससे विदेश निति , विदेश व्यापार सम्बन्ध का पता लगता है.

प्रश्न लग्न में इससे खोई संपत्ति व् सप्तमेश से चोर का पता लगाया जाता है. भावो की जानकारी

अष्टम भाव

आयु, कार्यो में विध्न, चिंता, अपमान, गुप्त ज्ञान, गुप्त स्थान आदि के बारे में इस भाव से पता लगाया जाता है.अष्टम भाव से व्यक्ति की आयु का निर्धारण किया जाता है. पर प्रथम, तृतीय के साथ अष्टम को भी आयु के बड़ा- छोटा होने का पता लगाया जा समता है.

अश्मेश की अन्य भाव में स्थिति ,अष्टम भाव पर अन्य ग्रहो की दृष्टि, व् अष्टम भाव अन्य भावेशो की स्थिति को जान कर है अष्टम सम्बन्धी फल का फलन किया जाता है. शनि का धीमी गति का होना इसकी यहाँ उपस्तिथि आयु को लम्बा करती है. यदि शनि स्व ग्रही या मित्र ग्रही हो तो यदि ये स्थान शत्रु दरही हुआ तो आयु कम होना दर्शाता है.

असामयिक दुर्घटना ,मानसिक अपमान का पता अष्टम भाव के गंभीर अध्ययन से लगता है. अष्टम भाव में मंगल की उपस्तिथि बवासीर रोग को दर्शाती है. इसके अलावा गुदा सम्बन्धी रोगों का अध्ययन भी इस भाव से किया जाता है.

नवम भाव

आचार्य (teacher) धर्म गुरु,पिता,धर्म , आराधना, लम्बी यात्राए ,आध्यात्मिकता , उच्चशिक्षा इन सबके विषय में नवम भाव से ज्ञान प्राप्त होता है.

नवंम भाव् से मुख्यतः जातक के पिता के प्रति सम्मान, धर्म कर्म सम्बन्धी लगाव, उच्च शिक्षा को प्रदर्षित करता है. लोग अधिकतर जातक के भाग्य का फैसला नवम भाव से ही करते है, वैसे इसके लिए ग्यारहवे भाव को देखा जाना चाहिए. यहाँ बलशाली शनि उच्च आध्यात्मिकता को प्रदर्शित करता है.

राजनितिक ज्योतिष में इस भाव के द्वारा दूर देशो की यात्राए,विदेश सम्बन्ध, रेलवे यातायात, जलयानन. विमानन से सम्बंधित विषयों को भी लिया जाता है. भावो की जानकारी

दशम भाव –

ये बहव कुंडली का बेहद खास अहम् भाव है इस भाव पर ही जातक जीवन निर्भाव करता है. यदि यह भाव बिगड़ गया तो समझो जीवन ही बिगड़ गया.

दशम स्थान जीविको पार्जन का स्थान, कर्म स्थान, शासन में यश पद कार्यो में रूचि को बताता है. भारतीय ज्योतिष में दशम भाव का अध्ययन विशेष महत्वपूर्ण है. भारतीय समाज में पुरुष के लिए ये स्थान महत्व पूर्ण है क्योंकि वही जीविका उपार्जित कर घर के खर्च चलाता है, बेशक स्त्री कुंडली में दशम भाव सबल हो लेकिन वह घरेलु कामो के लिए ही मानी जाती है.

सूर्य राजकीय सत्ता का प्रतीक है अत सूर्य की इस भाव में उपस्तिथि कोई प्रशासनिक पद ग्रहण करने का प्रतीक है. यह राजकीय सेवा किस स्टार की होगी इसे कुंडली का पूर्ण अध्ययन करके हे जाना जा सकता है. मंगल जोकि सहस और प्रक्रम का प्रतीक है के यहाँ होने से पुलिस या सेना विभाग से सम्बंधित सेवा का अनुमान लगाया जा सकता है.

इस भाव से व्यक्ति के आर्थिक स्तर का , समाज में उसकी साख का अनुमान लगाया जा सकता है. यद्यपि स्त्री की कुंडली में यदि दशम भाव बलशाली है तो उसका लाभ उसके पति को ही तब मिलता है जबकि वह स्वयं कायरत न हो उसकी जगह उसके शक्ति शाली ग्रहो का फल उसके पति को मिलता है.

ग्यारहवा भाव

भाग्य, लाभ, बड़ा भाई या बहन, मित्र वैभव, सिद्धि , ज्ञान सरलता, से सम्बंधित विषयों का ज्ञान हमें ग्यारहवे भाव से प्राप्त होता है. व्यक्ति के जीवन के चार लक्ष्य धर्म , अर्थ, काम, मोक्ष का सम्बन्ध नवंम ,दशम, एकादश,दवादश, भावो से ही है. इस क्रम में ग्यारहवा भाव काम को लक्षित करता है.

काम को हमें सीमित अर्थो में न लेकर इसको यदि धन ऐश्वर्य ,शक्ति सफलता से जोड़े तो ज्यादा व्यापक अर्थ में ग्रहण कर पाएँगे भाग्य शाली जातक को जीवन में सभी भोतिक सुख प्राप्त होते है. के अतिरिक्त बड़े भाई -बहन, सामाजिक संबंधो से भी व्यक्ति लाभान्वित होता है. ग्यारहवे भाव से जातक के बाए कान का भी अध्ययन किया जाता है.

दवादश भाव

दुखी जीवन, अधिक खर्चे, बायां नेत्र, बुरे कर्म,गरीबी, शयन स्थान, हानि , मोक्ष, जेल यात्रा, बंधन, पैरो का विचार इस भाव से किया जाता है.

हर भाव से पहला भाव उसके व्यय का सूचक है.जैसे लग्न व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसी स्वतंत्रता का द्योतक है तो 12 भाव व्यक्ति के दुःख, बंधन का द्योतक है. अब बंधन भी दो प्रकार से होता है एक होता है कारागार का बंधन और दूसरा अस्पताल का बंधन दोनो में ही व्यक्ति निष्क्रिय कर दिया जाता है. चाहे वेह बंधन आपराध करके हो या बीमारी के कारण से,

इस तरह एक बात स्पष्ट है की १२वे भाव में मंगल के कारण व्यक्ति को जीवन बंधन अवश्य प्राप्त होता है. और अगर यहाँ चन्द्रमा होता है तो व्यक्ति खर्चीला होता है और शनि हो तो व्यक्ति मितव्ययी होता है. बढ़ावे भाव के धैर्य पूर्वक अध्ययन से पता चलता है की जातक खर्च शुभ कामो के लिए करेगा विलासिता के लिए,

बारहवे भाव से शयन सुख भी लक्षित होता है यदि यहाँ शुक्र हो तो व्यक्ति शयन सुख पर विलासिता पूर्णरूप से खर्च करेगा १२वे भाव में अशुभ ग्रेह हो तो निश्चित है की व्यक्ति को कम उम्र में ही चश्मे की जरुरत पड़ेगी.

इस भाव से द्योतित मोक्ष की अवधारणा जीवन में किसी के द्वारा किये गया शुभ कर्मो को प्रदर्शित करती है जिससे की बार इस सांसारिक कुचक्र में जन्म लेना ही न पड़े यदि इस भाव पर शुभ प्रभाव यानि शुभ ग्रहो की दृष्टि हो तो व्यक्ति आध्यात्मिक साधना द्वारा इस सांसारिक बंधन को तोड़ भी सकता है.

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