भावस्वामियों के फल

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रामायण में ज्योतिष
ज्योतिष

भावस्वामियों के फल के रूप में हम देखेंगे की किस भाव का स्वामी किस भाव राशी नक्षत्र में बैठ कर किन फलो को उत्पन्न करता है.

भावो के फलो की बात करे तो जितना प्रभाव भाव स्वामी व् भाव का है उतना ही भाव के नवमांश का भी होता है. यदि भाव स्वामी कही निर्बल है तो नवमांश में शुभ स्थान में बैठ कर वह बलशाली हो जाता है. अत: भाव स्वामी के नवमांश में स्थिति को भी देखना चाहिए तभी भावस्वामियों के फल पूर्ण लाभ मिल पाएगा.

विभिन्न भावो में लग्नेश

कुंडली पर निर्णय करने के लिए अनेक तत्वों को देखना होता है. यहाँ हम मुख्यतः लग्नेश का वर्णन भावस्वामियों के फल के रूप में करेंगे.अतः किसी भाव का स्वामी , भाव, भाव में ग्रह की स्थिति फल के मुख्य करक है.

एक प्रसिद्ध विद्वान का कहना है के जातक का वर्ण , जाती , रूप.मानसिक विशेषता,प्रसिद्धि और निंदा , सफलता का निर्णय, जातक के लग्न के आधार पर करना चाहिए.

swami viveka nand ji

उपरोक्त कुंडली स्वामी विवेका नंदजी की है यहाँ नवमेश सूर्य लग्न में स्थित है लग्नेश ११वे भाव से पंचमेश मंगल को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है अतः फल निर्णय के रूप में हम कह सकते है की लगन स्थित सूर्य ने इनकी भव्यता में कभी कम न होने दी और लग्नेश गुरु की पंचमेश मंगल पर दृष्टि ने बुद्धि का अनुपम उपहार दिया.

भावस्वामियों के फल

यदि लग्नेश लग्न में अच्छी स्थिति में हो तो वह अपने समुदाए और देश विदेश में प्रसिद्द होता है. लेकिन यदि लग्न में भले ही हो पर दुष्ट और शत्रु ग्रहो (पंचधा मैत्रिनुसार) की दृष्टि उस पर है और नवमांश में 6-8-12 में है तो उसे हतभागी ही कहा जाएगा .भाग्य शाली नहीं.

लग्न स्थित लग्नेश स्वतंत्र विचारों वाला, प्रभाव शाली और कभी कभी दो पत्नियों वाला होता . मेरा तो माना है की यदि लग्नेश स्व्ग्रेही हो तो वेह कभी अतोत्साहित होने वाला नहीं होता है.

भावेशो के फल
भावेशो के फल

अब यहाँ एक अन्य कुंडली उदाहरण स्वरुप दी जा रही है इसमें लग्नेश बुध छठे भाव में है और लग्न में राहू विराज मान है. ये व्यक्ति जीवन भाव बीमारियों और दुर्भाग्य से ग्रस्त रहा है. भले ही सप्तमेश अच्छी स्थिति में हो कर सहारा दे रहा है.

लग्नेश दुसरे भाव में हो तो शत्रु से परेशान लेकिन पैसे वाला होता है. बड़े परिवार और उत्तम आचरण वाला होता है.

तीसरे भाव में होतो भाग्य शाली साहसी, पढ़ोसियो से सहयोग करने वाला होता है. लग्नेश यदि अच्छी स्थिति का हो तो भाइयो की मदद से उन्नति करता है और गायक भी हो सकता है.

चोथे भाव में लग्नेश हो तो माता पिता से सुखी, स्थिर संपत्ति , वाहन वाला होता है. अच्छे शारीर वाला, मामा से विशेष कर संपत्ति प्राप्त करता है.

भावस्वामियों के फल

लग्नेश पंचम में होतो बच्चों से सुखी नहीं होता है. तुनक मिजाज दूसरो के आधीन कार्य करने वाला होता है. विशेष कर मन्त्र सिद्धि के लिए प्रयास करने वाला , वैज्ञानिक मनोवृत्ति का होता है. गायक भी हो सकता है.

लग्नेश यदि छठे भाव में हो तो बीमार, कर्जदार लेकिन जब लग्नेश की दशा आती है तो कर्ज मुक्ति की अवस्था प्राप्त होती है. ऐसे लग्नेश की दशा यदि सही समाए पर आए तो वेह सेना या पुलिस में पद प्राप्त करता है. साथ ही ऐसा जातक सर्जन चिकित्सक भी बन सकता है. आप सूच रहे होंगे की एक ही स्थान के दो विपरीत फल क्यों , ऐसा ग्रह के स्व,उच्च व् मित्र छेत्री होने के कारन होता है.

सप्तम भाव में हो तो पत्नी की आयु कम होती है. दो या ज्यादा विवाह के बाद भी सन्यासी प्रवृत्ति होती है. आमिर या गरीब होने के साथ ही यात्राए करता होगा.

अष्टम में लग्नेश हो तो जातक दूसरो की सहायता करने वाला, मित्रो वाला, अंत शांति पूर्ण होता है. लेकिन यदि लानेश कमजोर हो तो जुआरी शराबी, व् ख़राब प्रवृत्ति वाला होता है.

नवंम में लग्नेश प्रबल हो तो जातक भाग्य शाली, औरो की रक्षा करने वाला , पत्नी बच्चे सुखी , सहिष्णु उपासक होता है. साथ ही धनी भी होता है.

दशम भाव में लग्नेश हो तो व्यावसायिक सफलता वाला , समाज अड़ोस पड़ोस में देश में सम्मान प्राप्त करता है.

भावस्वामियों के फल

द्वितीयेश द्वितीय में हो और लग्नेश एकादश में होतो जातक असीमित लाभ पाने वाला होता है. जातक को कभी जीवन में आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता है.

दवादश में यदि लग्नेश होतो जीवन में काफी हानि उठाने वाला आर्थिक रूप से तंग होता है जैसे मै स्वयं कारोबार में कभी सफलता प्राप्त नहीं होती है. लेकिन यदि लग्नेश शनि हो तो उसकी तृतीय दृष्टि क्योकि दवितीय भाव पर होती है इसलिए परिवारी जनो से आर्थिक सहायता मिलती रहती है.

लग्नेश के उदाहरण

bhav swamiyo ke fal
bhav swamiyo ke fal

दी गई कुंडली में लग्नेश शुक्र अपने शत्रु गुरु की राशी धनु में स्थित है लेकिन एक लग्नेश का शुभ ग्रह के घर में होना यहाँ स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. और जातक को विद्वान बनाया.और विश्व में महान बनाया क्योकि नवांश लग्न माश में गुरु और सामने तुला का सप्तमेश शुक्र पुन: एक दुसरे को पूर्ण द्रिष्टि से देख रहे है.

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हम यहाँ एक दूसरी कुंडली का अध्ययन करेंगे जिसमे लग्नेश शनि मित्र राशी वृष में है. षष्ठेश चंद्रमा के साथ है सामने से शुभ ग्रह गुरु की दृष्टि है. नवमांश में नीच शनि पर मंगल की दृष्टि है. लेकिन यहाँ शनि खुद दशम दृष्टि से लग्न को देख रहा है अतः जातक लम्बा और काले रंग का था, और दुबला पतला था,.लग्नेश का षष्ठेश चन्द्र के साथ होना अस्वस्थता की निशानी है. जीवन भर अस्वस्थता के कारन ज्यादा उन्नति न करपाया जबकि गुरु दशम उच्च है. अतः लग्नेश का सर्वरूपेण बल शाली होना भाग्य के लिए जरुरी है.

मानसिक स्थिति का विश्लेषण हमेशा चंद्रमा से करना चाहिए. यदि सूर्य , चंद्रमा और लग्न एक से अधिक क्रूर ग्रहो से पीड़ित हो तो दुर्घटना होती . है. झगड़ा होता है और अचानक मृत्यु हो जाती है. यदि रहू केतु सूर्य चंद्रमा 9 या 5 भाव में हो और इन भावो मेष,वृषभ,वृश्चिक , मकर, हो तो जातक का शारीर दुर्घटना का कारन विकृत हो जाता है.

लग्न स्थित राशियों के फल

1-मेष लग्न वाले जातक चिंतन शील, उद्यमी ,महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक होते है. ये योजना बनाकर काम करने वाले दूसरो का नियंत्रण न पसंद करने वाले होते है. एक हद तक क्रोधी भी होते है. चन्द्र शनि यदि लग्न में हों तो क्रोध के पागल पन में कुछ भी कर जाते है.

2-वृष लग्न वाले जातक आत्मविश्वासी और बैल की तरह कठोर परिश्रमी होते है.व् सहनशील होते है. इनका व्यक्तित्व आकर्षक और शौकीन मिजाज होते है. वृद्धावस्था में परिवार से बच्चो से दूरी का कष्ट झेलना होता है.

भावस्वामियों के फल

3-मिथुन लग्न के जातक उद्यमी तकनिकी कौशल के धनी और चंचल किस्म के होते है. स्त्रियों के प्रति सावधान रहना चाहिय क्योकि चरित्र हीनता का खतरा बना रहता है. यदि लग्न में अशुभ ग्रहो हो तो हर प्रकार के पतन का दोष lag सकता है. वाद-विवाद और सहित्य में विशेष रूचि होती है. अधिक क्रिया शील होने के कारन व्यवसियिक सफल होते है.

4-कर्क लग्न के जातक संवेधान शील , परेशान, जिज्ञासु और उत्तेजित मनोवृत्ति वाले होते है. इनकी प्रवृत्ति मनोवैज्ञानिक होती है. नए विचारो की खोज ,विश्वासी, और इमानदार होते है. दूसरो की भावनाओ का सम्मन करने वाले भी होते है.

5-सिंह लग्न के जातक विशेषकर धनाकांक्षी, चोडे कंधे वाले हंसमुख और आकर्षक होते है. ये जीवन के किसी भी स्थिति में आपने को शामिल कर लेते है. दकिया नुसी संगीत प्रेमी होते है. इनकी आकांक्षाए काफी हद तक पूरी नहीं होती . या क्षमा शील होते है.

6-कन्या लगन वाले विचारशील , भावुक, और अपनी बुद्धिमानी का प्रदर्शन करने वाले होते है.भोतिक और रसायन विज्ञानं के लेखक विज्ञानी होते है. दूसरो पर रॉब ज़माने वाले होते है. ये उत्तेजना में पक्षपात से पीड़ित रहते है.

भावस्वामियों के फल

7-तुला लगन वाले जातक सामान्यत: कामुक प्रवृत्ति के होते है. ये पूर्वानुमान से दूसरो के विचारो को पढ़ने वाले होते है. राजनेतिक नेताओ और सामाजिक सुधारको के रूपमे काफी सम्मान पाते है. ये संगीत प्रेमी, ईमानदारी से दूसरो को अपनी बात मनवाने को मजबूर करते है.

8-वृश्चिक लग्न वाले व्यंग्यप्रिय ज्योतिष में विश्वासी होते है.ये उदार ,चंचल, कामुकता विहीन होते है.ये उत्तम पत्रकार साहित्य कार होते है. ये प्रतियोगी में भाग लेने वाले, कम खर्चीले.होते है.बवासीर की बीमारी होने का खतरा रहता है.

9-धनु लगनवाले जातक ज्योतिषी,दर्शन शास्त्री, शरीर से मोटे होते है. ये कफ प्रकृति के व्यवसायी होते है. दूरदर्शी, चिंतन शील, भगवन से डरने वाले होते है . इन्हें उम्र के साथ फेफड़ो में इन्फेक्शन का खतरा होता है.

10-मकर लग्न वाले स्वयं को परिस्थिति के अनुसार ढल लेते है.जीवन में अभिलाशाए होती है लेकिन पूरी नहीं कर पाते, ये धन नहीं बचा पाते, ये अध्ययानी होते है. शनि के पीड़ित होने से प्रतिशोधी हो जाते है. घरेलु जीवन शांत, लेकिन पति पत्नी में अनबन रहती है. परिश्रमी और कठिनाइयों में नियंत्रित रहते है. मंगल स्वराशी से नयन्त्र हो तो विश्वास में कमी होती है.उत्तेजित और कमजोर दिमाग के होते है.

11-कुम्भ लग्न के जातक दर्शानिंक होते है.ये पतले लम्बे आकर्षक होते है. ये शीघ्र मित्र बना लेते है. रुचिपूर्ण बातचीत , डरपोक किस्म के होते है. ये ज्योतिष शास्त्र के विशेषग्य होते है. महान साहित्यकार भी होते है. पति /पत्नी आपस में एक दुसरे के भक्त होते है. इन्हें चाहिए की आपस में खुश रखे.

12-मीन लग्न के जातक दकियानूस धार्मिक नियमो का सख्ती के साथ पालन करते है. जिद्दी दूसरो पर अधिकार जमाना चाहते है. अधिक मेहेत्वाकांशी बैचैन रहते है. पुराणी बातो और धर्म ग्रंथो के शोकिन होते है. जीवन भर दूसरो के आश्रित रहते है. फिर भी अपने को मुक्त दिखाते है. ऐसे लोगो में आत्म विश्वास नहीं होता है.

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