नीच भंग राज योग

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नीच भंग राज योग
नीच भंग राज योग

कैसे कुछ लोग महा नीच होते हुए भी ऐशोआराम की जिंदगी गुजरते है ये सब होता नीच भंग राज योग के कारण आइये जाने .


के कारण देखने में आता हैं कि कुछ लोग महानीच होते हुए भी राजाधिराज होते हैं उदाहरण तो आपको बताने की जरूरत ही नहीं प्रति दिन के समाचार पत्रों मे बहुतेरे उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन ऐसा ही ग्रहों के मामले में भी होता है। यानि नीच भंग राज योग।

नीच भंग राजयोग

यह योग दो प्रकार का होता है।

प्रथम –

यदि कोई ग्रह जन्म समय नीच का हो तो उस स्थान का स्वामी, अथवा वह नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है, उस राशि का स्वामी, यदि लग्न से अथवा चंद्र से केंद्र में बैठा हो तो नीच भंग राजयोग होता है।

कुछ का विश्वास है कि चंद्र और लग्न से नीच ग्रह को कंेद्र में होना ही चाहिए तभी यह योग लागू होगा।

मंत्रेश्वर ने कहा है कि ऐसा जातक यदि साधारण मनुष्य भी हो तो अपने जीवन में अनेकानेक धन एवं कीर्ति संबंधी उन्नति करता है। वह धार्मिक भी होता है। लिखा है कि ऐसा जातक राजा एवं धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है।

मान लिया जाए कि सूर्य नीच का तुला में हैं, तो तुला का स्वामी शुक्र लग्न से अथवा चंद्रमा से केंद्र में होना चाहिए अथवा सूर्य के उच्च स्थान मेष का स्वामी मंगल लग्न अथवा चंद्र से केन्द्र में होना चाहिए।

यहाँ हम एक तालिका प्रस्तुत कर रहें हैं जिससे आपको हर ग्रह के बारे में पता चल जाएगा।

ग्रह नीच उच्च लग्न/चंद्रमा से
सूर्य तुला मेष शुक्र/मंगल
चंद्रमा वृश्चिक वृष मंगल/शुक्र
मंगल कर्क मकर चंद्रमा /शनि
गुरु मकर कर्क शनि/ चंद्रमा
शुक्र मीन कन्या गुरु/बुध
शनि मेष तुला मंगल/शुक्र

हैदर अली

नीच भंग राजयोग
नीच भंग राजयोग

के द्वितीय स्थान में चंद्रमा कर्म स्थान का स्वामी नीच होकर बैठा है। लेकिन वृश्चिक का स्वामी मंगल स्वगृही होकर चंद्र के साथ है अर्थात चंद्र से कंेद्र में है। फिर चंद्रमा का उच्च स्थान वृष होता है। उसका स्वामी शुक्र लग्न से केंद्र (सुख स्थान 4) में बैठा हैं।

इसी नीच भंग राजयोग के कारण और अन्य प्रकार के राज योग रहने के कारण हैदर अली बाल अवस्था में वैंकपैया नामक ब्राह्मण का चरवाहा था, परन्तु 18वीं शताब्दी के प्रतिभाशाली मनुष्यों में गिना जाने वाला और 30 करोड़ भूमिकर (टेक्स) का मालिक बन बैठा। उसका राज्य दक्षिण भारत में बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर तक और कृष्णा नदी से लेकर राजश्वर पर्यन्त फैला था।

उसने वैंेकया ब्राह्मण को अपना प्रधान बनाया था। नीच भंग राज योग में धार्मिक होना भी लिखा हैं। इतिहासकारों ने लिखा है कि उसके राज्य का प्रबंधन ब्राह्मण करते थे और वह उनका विश्वास करता था। वह सच्चा और ईमानदार पुरूष था।

दूसरी प्रकार का नीच भंग राज योग


शास्त्रकार बताते हैं कि नीच ग्रह का नवांशेष लग्न से कंेद्र अथवा त्रिकोण में हो और जन्मलग्न चर राशिगत (चर राशि-1,4,7,10) तो ऐसा जातक राजा होता है, अथवा बहुत ही प्रतिभाशाली मनुष्य होता है। ऐसा भी नियम है कि यदि लग्न चरराशि न होकर स्थिर या द्विस्वाभाव (3,6,9,12) परंतु लग्न का नवांशेश चर राशि गत हो और नीचस्थ ग्रह का नवांशेश कंेद्र या त्रिकोण में हो, तो भी नीच भंग राज योग होता है। अथवा जातक राजा अथवा बड़ा अधिकारी होता है।

देखो नीचे कुंडली

गुरू नीच है। गुरू स्पष्ट 9-12-25 है। इस कारण गुरू मेष के नवांश में है। उसका स्वामी मंगल दशम स्थान में है। लग्न चर राशि नहीं है लेकिन मीन राशि से अन्तिम नवांश में होने के कारण उसका स्वामी गुरू है। गुरू चर राशि मे है। इस कारण उपर्युक्त योग पूर्ण रूप से है।

ऊपर लिखा है कि इस जातक ने केवल राज पद ही प्राप्त नहीं किया परंतु इनकी जमींदारी बहुत विस्तृत हो गई थी और पूरे टिकारी राज पर अधिकार प्राप्त कर लिया था।

-यदि चंद्र से मंगल सप्तमस्थ हो तो यह योग भी बहुत उत्तम होता है। इस योग के प्रभाव के कारण जातक सुखमय और प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करते हुए धार्मिक यज्ञों को भी करने का सौभाग्य प्राप्त करता है।

तो देखा आपने नीच भंग राज योग का कमाल यदि आपकी कुंडली में भी कुछ ऐसा ही राज योग है तो हमें अपनी कुंडली दिखाए और हम से पूछे नीच भंग राज योग आपकी कुंडली में है या नहीं . धन्यवाद

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