फलित सम्बन्धी नियम

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(Rule of Prediction)

सद गुरु(फलित सम्बन्धी नियम
सद गुरु(फलित सम्बन्धी नियम

यहाँ हम ज्योतिष में फलित सम्बन्धी नियम सरल व सामान्य भाषा में आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है. नियमो को कुंडली पर अप्लाई कीजिये

व्याख्या

हमने पहली पोस्टों में ज्योतिष से संबंधित नियमों का उल्लेख करने के बाद समझा है कि आप यहाँ तक आते आते ज्योतिष संबंधि गणितीय व उसके जरूरी नियमों को समझ चुके होंगे। अब इसके बाद हमने निश्चय किया है कि ज्योतिष से संबंधित कुछ स्थूल सामान्य नियमों का भी छोटा सा प्रारूप आप लोगों के सामने प्रस्तुत करें।

ज्योतिष संबंधि नियमों को समझने के पश्चात पंचांग का ज्ञान, कुण्डली का निर्माण इत्यादि विषय समझाया जा चुका है। कंुडली निर्माण के उपरांत प्रत्येक व्यक्ति को यह जानने की जिज्ञासा होती है कि अब इसका फल भी जाना जाए। गणित विषय जितना कठिन व सूक्ष्म है उतना ही कठिन व सूक्ष्म फलित विषय है।

जिज्ञासा

लेागों के मन में प्रश्न पैदा हेाता है कि जब सूर्य ताप एक स्थान पर रहने वालों पर एक सा पड़ता है तो ज्योतिष का फलादेश संबंधि प्रभाव भिन्न प्रकार से क्यों होता है। जैसे एक स्थान पर भिन्न प्रकार की धातुओं के बर्तन में सामान सूर्य ताप के बावजूद भी हर एक बर्तन के पानी का ताप भिन्न होता है उसी प्रकार एक स्थान तो क्या एक परिवार में एक ही माँ बाप की संतानो का भाग्य भी अलग अलग होता है।

इस प्रकार जो जिस लग्न और ग्रह स्थिति में और जिस स्थान में उत्पन्न हुआ है उसी के अनुसार उसकी प्रकृति बन जाती हैं और उसी प्रकृति के अनुसार फलित के प्रभाव भी भिन्न प्रकार के हुआ करते हैं।

फलादेश कहते समय आगे बताई हुई बातों का विचार करना चाहिए और अपनी कल्पाना शक्ति का उपयोग कर फलो को विचार शक्ति की तुला पर तौल कर फल कहना चाहिए। और उसका अभ्यास करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। वैसे भी ज्योतिष का फलित विभाग अनुमान शास्त्र ही है। फलतः अनुभव से ही ज्ञान बढ़ता है।

फलित सम्बन्धी नियम

1 गोचर से– केवल जन्म राशि पर से पंचांग में दिये हुए ग्रहों की स्थिति पर से प्रत्येक मास पक्ष आदि का फल जाना जाता है।

2 जन्म कुण्डली से – जन्म कंुडली देख कर फलित सम्बन्धी नियम ग्रहों की स्थिति के अनुसार ग्रह फल, भाव फल, दृष्टि फल, योग फल आदि का पूर्ण विचार कर फल कहा जाता हैं।

3- वर्षफल– जन्म कुंडली पर से प्रत्येक वर्ष, वर्ष कुंडली बनाकर और उस के भीतर प्रत्येक मास की या यदि आवश्यक हुई तो प्रत्येक दिन की भी कुंडली बनाकर वर्ष, मास या दिन का फल जाना जा सकता है।

4 प्रश्न कुंडली– किसी भी समय जब कोई प्रश्नकर्ता किसी विषय पर प्रश्न करता है ओर उसका उत्तर चाहता है तो उस समय जो लग्न होगा, उस पर से प्रश्न कुण्डली बनाकर उस कुण्डली पर से उस विषय का फल जाना जाता है।

नोट- यहाँ मैं स्वयं इस बात का पक्षधर हूँ कि तत्काल प्रश्न लग्न बना कर फलित करना लगभग 95 प्रतिशत तक फल सहि होते है। इसको मैं बहुत बार आजमा चुका हूँ।

फल का समय-

फलित सम्बन्धी नियम किसी विशेष फल का समय जानने को भिन्न प्रकार की दशाओं का साधन किया जाता है और उस ग्रह की दशा अंतर्दशा या विदशा किस समय तक रहेगी गणित से निकाला जाता है। जिससे फल की ठीक तिथि जानी जा सकती है। इसके लिए कड़े अभ्यास की भी जरूरत है।

किसी ग्रह की दशा का जो समय है उसके विभाग करने से अंतर्दशा का समय निकलता है और अंतर्दशा के समय का विभाग करने से विदशा का समय निकलता है। इस प्रकार फल का सूक्ष्म समय निकाला जा सकता है।

फलित: आवश्यक बातें।

1 शुद्ध समय पर से बनाई हुई कुण्डली।

2- यह देखना कि कुण्डली में कौन सा ग्रह किस स्थान पर है।

3-भाव में जो राशि है उसका स्वामी कौन सा ग्रह है। अर्थात ग्रहों का स्वस्थान सबसे पहले जानना चाहिए।

4- ग्रहों के उच्च नीच स्थान, मूल त्रिकोण स्थानों का विचार कर देखना चाहिए कि कोई ग्रह मैत्री सम्बन्ध में है क्या?
5- ग्रहों की नैसर्गिक तात्कालिक पंचधा मैत्री का विचार कर ग्रहों का परस्पर मैत्री संबंध देखना चाहिए।
6- ग्रह की दृष्टि प्रत्येक ग्रह और भाव पर विचार कर उसका दृष्टि द्वारा संबंध का विचार करना ।
7- ग्रह गुण धर्म, राशि गुण धर्म, और नक्षत्र गुण धर्म पर विचार करना।

8- ग्रहों के अस्त वक्री मार्गी का विचार

9- प्रत्येक भाव से क्या क्या विचार किया जा सकता है इसको जानकर विचारणीय विषय का भाव खोजना।

10- विचारणीय भाव का स्वामी कौन सा ग्रह है और किस स्थान में है जहाँ भाव स्वामी है उसके भाव से मैत्री संबंध का विचार करना।

11- विचारणीय भाव पर भावेश या और किन ग्रहांे की दृष्टि है। फलित सम्बन्धी नियमों से इन बातों के विचारने का प्रारम्भिक ज्ञान हो गया है परन्तु इसके अतिरिक्त जानने पर विचारने के लिए और अनेक बातों को जानने की आवश्यकता है जिनकों जानने पर फल कह सकते हैं।

फलित सम्बन्धी नियमों का

1- ग्रहों की भिन्न भिन्न प्रकार की अवस्थाएं और उनका फल
2- ग्रहों के भिन्न राशियों में रहने का फल।
3-भाव में भिन्न राशियों के रहने का फल।
4-भाव के अनुसार प्रत्येक ग्रह का फल।
5- ग्रहों की मैत्री के अनुसार फल।
6- ग्रहों की ग्रहों पर दृष्टि के अनुसार फल।
7-हर भाव पर अलग-अलग ग्रहों की दृष्टि का फल।
8- भाव में एक से अधिक ग्रह रहने का पृथक फल।
9- कारक ग्रह, मारक ग्रह, अरिष्ट योग, अरिष्ट भंग योग, आदि का ज्ञान।

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जैसे अल्प आयु योग, दीर्घायु योग, मृत्यु योग, राज योग, राजभंग योग, राज दंड योग, धन योग, दारिद्रय योग, अंधा योग, काना योग, लंगड़ा आदि होने के विशेष योग और नाभस आदि अनेक योग का विचार कर देखना कि कुण्डली में कौन कैान योग पड़े हैं और उनका क्या फल होता है।

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