पुराने ज्योतिष केंद्र

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भारत अपने पुरारतन ज्ञान विज्ञानं और ज्योतिष के लिए जाना जाता है, इनमे पुराने ज्योतिष केंद्र भी अपने गोरव के साथ आज भी स्थापित है.

मध्य कालीन भारत में ज्योतिष का प्रमुख केन्द्रीय स्थान कोन-सा था?

यहाँ हम खासकर उल्लेख करेंगे भारत के मध्यकालीन पुराने ज्योतिष केंद्र उज्जैन नगरी का. क्योंकि यही वह खास स्थान है जहाँ पर ज्योतिष सम्बन्धी पुराने पुरालेख और ग्रन्थ प्राप्त हुए है.

अभिप्राय ये है की उज्जैन में जितने लेख ग्रन्थ ज्योतिष से सम्बंधित पाए गए है उतने और कही नहीं. जितने लेख पाए गए है उन लेखो की शुद्धि, अरब देश का महान गणितग्य ज्योतिषि “अलबेरुनी” नामक विद्वान ने भी भारतीय गणित और सिद्धांत को ही शुद्ध बताया है. अलबेरुनी के 800 साल पश्चात Dr. हंटर ने भी वाही बात बताई अतेव डॉ. करू का लिखना है की हिन्दू गणितग्य जोकि भारत के विभिन्न ज्योतिषिय कंदराओ में रहते थे कि वैज्ञानिक रूप से ज्योतिषिय गणित करने के कला बहुत उच्च कोटि की थी.

पुराने ज्योतिष केंद्र

बढ़ी शोक की बात है कि जिस भारत वर्ष की सभ्यता का सूर्य उसके मूल हिन्दू आर्य जाती के लोगो के कारन सदा विश्व भर में उज्जवल रहा था, जो लोग सदेव अपने ज्ञान विज्ञान के कारन जाने जाते थे उस भारत के हम लोग अभाग्य और आलस्य में पड़ कर आज अपने स्वर्ण काल को भुलाए बैठे है.

कहने का  अभिप्राय ये है की यद्यपि हमारे पुरातन ज्योतिष केंद्र विदेशी मुस्लिम आतंकियों ने लूट कर नष्ट भ्रष्ट कर दिए और जो बच भी गए उन्हें भी दम्भियो के हाथो पड़ जाने के कारन व् उनकी योग्य संतानों कीड़ो से चटवा डाला.और आगे जो ग्रन्थ शेष बाख भी गए थे उन्हें समझने व् अर्थ लगाने वाला कोई न था क्योंकि वे अमूल्य ग्रन्थ पुराणी आर्य संस्कृति की पहचान संस्कृत में थे. इस प्रकार हमारी विद्याए नष्ट भ्रष्ट हो गई.

बेहद दुःख की बात है की अनेक त्रिकाल दर्शी महर्षियों द्वारा प्रणीत मूलभूत फलित ज्योतिष के रहस्यों से परिपूर्ण अनुपम चार लाख पद्म  वाले “ग्रन्थ चतुर्ल्क्षन्तु ज्योतिषम” जैसे अनेको ग्रन्थ कश्मीर में दुष्ट-यवनों के हाथो जला कर नष्ट कर दिए गए.

सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित वेधशालाए

जय सिंह का जन्म सन 1688 ई. को कछवाहा वंश में हुआ. इनके द्वारा जयपुर में विश्व के सबसे बड़ी और सर्वाधिक सूक्ष्म सूर्य घडी निर्मित करने का कीर्तिमान अंकित है.35 बड़े गोला कार व्यास में निर्मित ये घड़ी 2 सेकंड तक का सही समाई बताती है.

       ये वेधशाला समुद्र तक से ४३१ मीटर  की ऊंचाई पर स्थित है. इसका देशांतर75° 49’ 8.8” ग्रीनविच के पूर्व में तथा अक्षांश 26°55’27” उत्तर में है. यह वेधशाला 1728ई में बनकर तैयार हुई

जयपुर की ये वेधशाला हिन्दू, मुस्लिम,यूरोपियन खगोलविदों का विचारविमर्श करने का केंद्र बन गई. इस वेधशाला का प्रयोग ज्योतिष सम्बन्धी अध्ययन भविष्यवाणियो और जन्म पत्रिकाए बनाने तथा विभिन्न खगोल विज्ञानिय यंत्रो की सहायता से खगोल सम्बन्धी आंकड़े एकत्र करने में होता था.

2 दिल्ली के वेधशाला

ये वेधशाला जंतर मंतर के नाम से प्रसिद्द है.जंतर मंतर एक राष्ट्रीय समारक है. जिसकी रक्षा भारतीय पुरातत्व विभाग दवार की जाती है. इसका निर्माण मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में हुआ.

सन 1739 में फारस के नादिरशाह ने आक्रमण कर दिल्ली में भरी तबाही मचाई. वह अनेक अमूल्य रत्नों और आभूषण लूट ले गया. लूट में ताम्बे के यंत्र और खगोलीय प्रयोग सम्बन्धी अन्य यंत्रो का अमूल्य संग्रह भी लूट लिया.

इस प्रकार भारत प्राचीन खगोविज्ञान के सर्वाधिक मुल्येवान खजाने से वंचित हो गया

उज्जैन वेधशाला

प्राचीन भारत में उज्जैन का वाही स्थान था, जो आज दुनिया में ग्रीन विच का है. प्राचीन हिन्दू खगोल विद उज्जैन की स्थिति मुख्य मध्यान्ह रेखा पर मानते थे और खगोलीय गणित खगोल विज्ञानं की इस प्राचीन पीठ के मध्यान्ह बिंदु के सन्दर्भ में करते थे.

सवाई मानसिंह ने उज्जैन की स्थिति को गहराई से समझा था और उन्होंने अपनी 5 खगोल वेधशालाओ में से तीसरी वेधशाला यहाँ स्थापित करने का निर्णय लिया था.

वाराणसी वेधशाला

प्राचीन काल से ही वाराणसी भारतीय धार्मिक आस्था.कला. संस्कृति और विद्या का एक महान परम्परागत केंद्र रहा है. कशी और वाराणसी के नाम से भी जानी जाने वाली ये नगरी सभी शास्त्रों का अध्ययन केंद्र रही है. अन्य भारतीय वीडयो के साथ साथ खगोल विज्ञानं और ज्योतिष के अध्ययन की भी यहाँ परम्परा थी. इसलिए जयसिंह ने (2) ने इस ज्ञानपीठ में गंगा के तट पर एक वेधशाला का निर्माण कराया था .

इसका निर्माण सन 1737ई में करवाया गया था. इस काम में महाराजा के दरबारी खगोलविदों में पंडित जगन्नाथ सम्राट और पंडित केवल राम मुख्य सहयोगी थे. वेधशाला में सुसज्जित खगोलीय यंत्र इस प्रकार है.

विषुवतीय सूर्य घड़ी, सम्राट यंत्र, लघु विषुवतीय सूर्य घड़ी , ध्रुव दर्शक यंत्र,दक्शिनोवृत्ति भित्ति यंत्र,गोलाकार धुप घड़ी,

मथुरा वेधशाला

महाराजा जयसिंह ने सन 1738 के आसपास यहाँ कई खगोल यंत्रो का निर्माण करवाया. इस वेधशाला के निर्माण के लिए महाराजा ने शाही किले की छत को चुना.जिसे कंस का महल कहा जाता है.\

16 वि सदी के अंत में महाराजा जयसिंह के पूर्वज आमेर के राजा मानसिंह ने  इस किले का निर्माण कराया. और इसे मजबूत किया. मथुरा की वेध शाळा के बारे में बहुत जाकारी उपलब्ध नहीं है.

अग्रयंत्र, लघु सम्राट यंत्र, विषुवतीय धुप घड़ी ,दक्षिण वर्ती भित्ति यंत्र,ये यंत्र ईंट और चूना पलास्टर से बने थे,और ये जयपुर वेधशाला के यंत्रो के समरूप लाघुयंत्र थे.

`भारतीय काल गणना

भारतीय ऋषियों द्वारा किया गया काल गणना क्रम सौरमान एवं चान्द्रमान ऐसा काल गणना क्रम है जिसे अंग्रेज और अरबी विद्वान् भी समझने में असफल है.भारतीय विद्वानों ने जो काल गणना का क्रम अपनाया न केवल सूर्य चद्र बल्कि अन्य सात ग्रहो को भी मेहेत्व दिया गया है.

सूर्य एवं चन्द्र ग्रहन की सैंकड़ो वर्ष पूर्व सटीक भविष्यवाणी करना भारतीय काल गणना का प्रत्यक्ष प्रबल, अदिव्तीय वैज्ञानिक प्रयोग है.14 जनवरी को मकर संक्राति का होना भी प्रत्यक्ष प्रमाण है. यही कारन है की भारतीय त्यौहार एक निश्चित ऋतू में ही आते है जबकि ईद कभी सर्दी, कभी गर्मी, कभी बरसात में आती है. यही हाल अन्य मुस्लिम त्योहारों का है.

ज्योतिष गुरु भारतभारतीय हिन्दू त्यौहार   के एक निश्चित ऋतू विशेष में आने पर वर्तमान पीढ़ी को ऋषियों का कृतग्य होना चाहिए .भारतीय काल गणना में विक्रम संवत एवं शालिवाहन शक संवत का ही अधिक मेहत्व रहा है.

शालिवाहन शक संवत चेत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है. इनके अलावा श्री कृषण संवत,बोद्ध संवत,क्लिसम्वत, जैन या हहविर संवत एवं मोर्य संवत, बंगला संवत, राष्ट्रीय संवत,फसली संवत,आदि भी भारत में प्रचलित है.

यहाँ अन्य संवतो की अपेक्षा विक्रम संवत ही मान्यता प्राप्त संवत है.

महाराज विक्रमादित्य बड़े प्रतापी सम्राट हुए है जिन्होंने ये संवत शुरूकिया था.भारत के सभी पंचांग विक्रम संवत के आधार पर ही बनते है.एवं भारतीय पर्व त्यौहार यह निर्णायक आधार है.

शुरू की शताब्दियों में विक्रम संवत को मालव संवत भी कहा जाता था.विक्रम संवत सायन और निरयन दोनों प्रकार से व्यवहार सुगम है. इसके सोर मास और दिनों की गणना तो इसवी सन से भी अधिक शुद्ध है तथा सुगम है.

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