नक्षत्र में ग्रहो की उच्चता

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नक्षत्र में   ग्रहो की  उच्चता
नक्षत्र में ग्रहो की उच्चता

गोचर में चलते हुए नक्षत्र में ग्रहो की उच्चता हर ग्रह के लिए एक विशेष अंश के आने पर प्रदर्शित होती है. साधारणत: ग्रहो का राशि विशेष में आने पर उच्च कहा जाता है.

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ग्रंहों की उच्चता और नक्षत्र

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्र में ग्रहो की उच्चता का सम्बन्ध गोचर काल में चलते चलते एक विशेष नक्षत्र और राशि में एक विशेष अंश के आने पर प्रदर्शित होती है जब ऐसा विशेष क्षण आजाता है तब ग्रहो की उच्चता प्रदर्शित हो पाती है. अस्तित्व स्वीकारा गया हैं। इसी संदर्भ में यहाँ बताया जा रहा है।

ये सात ग्रह कुछ विशेष राशियों में रहने पर उच्च और नीच होते रहते हैं। हम यहाँ देखेंगे कि ग्रहों की उच्चता और नीचता में नक्षत्रों का क्या हाथ है।

इसी संदर्भ में हम यहाँ वराहमिहिर का एक श्लोक प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें ये सारा वर्णन छिपा है। फिर इस श्लोक को एक टेबल द्वारा विश्लेषित करंेंगे।

-अज वृषभ मृगांगना कुलरा झषवणिजौचदिवाकरादितुंगा दश
शिखि मनुयुक तिथीन्द्रियस्त्रिनवक विंशति भिश्चिेतष्स्तनीचाः

सूर्य

यहाँ दिख रहा है कि सूर्य केतू के नक्षत्र अश्विनी में उच्चता को प्राप्त हो रहा है। हम ये भी जानते हें कि विंशोत्तरी दशा पद्धति के अनुसार केतू अश्विनी का स्वामी है।

अब ज्योतिष शास्त्र, विज्ञान शास्त्र, और धर्म शास्त्र के अनुसार ये मान्यता सिद्ध हैं कि इस संसार के लिए सूर्य अनिवार्य है। सूर्य के बिना संसार और जीवात्मा के बिना शरीर नहीं रह सकता है। वेद में भगवान ने उपदेश में कहा है कि सूर्यः आत्मा जगतस्ततस्थुपश्च. अर्थात जड़ चेेतन सभी का आत्मा सूर्य है।

उत्तर कालामृत ग्रंथ में केतू को मोक्ष का कारक माना गया है। साथ ही मेष राशि में सूर्य को उच्च माना गया है,

मंेष मंगल की राशि है जो कि पृथ्वी पुत्र कहा गया हैं इसका भौतिकता से गहरा संबंध है। इस विवेचन का भावार्थ यह है कि .सूर्य पापी ग्रह मंगल की मेष राशि में रह कर भौतिकता को छोड़े और मोक्ष कारक केतू के नक्षत्र में रहते हुए मोक्ष को प्राप्त करें। अर्थात इस त्रिगुणात्मक संसार मेंष में रहते हुए भी मनुष्य को कमल की तरह से संसार से अलिप्त रहना चाहिए।
तो इस प्रकार से हमने देखा कि मेष राशि में और कंेतू नक्षत्र आत्मा की उच्चतम अवस्था को दर्शाने के उत्तम प्रतीक है। इसलिये सूर्य का मेष राशि के दसवें अंश पर उच्च होना अध्यात्म शास्त्र के सिद्धांतो के सर्वथा अनुकूल है और इसीलिए युक्ति सम्मत सिद्धांत है।

नक्षत्र में ग्रहो की उच्चता

चंद्रमा

अब हम चंद्र की स्थिति का अवलोकन करें। टेबल में देखेते हैं कि चंद्र वृष राशि के तीसरे अंश पर उच्च होता है ओर इस अंश में चंद्रमा कृतिका नाम का नक्षत्र पड़ता है। जिसका स्वामी सूर्य है। दूसरे शब्दों में चंद्रमा वृष राशि में सूर्य के नक्ष़्ात्र में उच्च अवस्था को प्राप्त होता है।

लिखा है चंद्रमा मनसो जातः। यानि चंद्रमा विराट पुरूष का मन है। और मन में विभिन्न प्रकार की इच्छाएं और संवंेदनाएं होती हैं। साथ ही वृष राशि विलास प्रिय शुक्र की राशि है। अतः भावार्थ यह हुआ कि यदि चंद्रमा विलासिता और भोग के वातावरण में रहता हुआ भी कृतिका आर्थता आत्मा( सूर्य स्वामी) को प्राप्त कर पाए तो मन के लिए इससे बढ़कर और कोई उत्कृष्ठ सिद्धी न हेागी।

तो देखें कि क्या मन(चंद्रमा) आत्मा (सूर्य) को प्राप्त कर सकता है। उत्तर में सभी एक मत हैं कि मनुष्य के बंधन का कारण जहां मन है उसके मोक्ष का कारण भी उसका मन ही है।

मुण्डक उपनिषद में कहा गया हैं कि मन की शुद्ध अवस्था द्वारा ही आत्मा का साक्षात्कार होता है। मुण्डक उपनिषद की श्रुति में इसका प्रमाण है। ‘‘वह परमात्मा यद्यपि आंखों से देखा नहीं जा सकता, न उसका आख्यान वाणी द्वारा किया जा सकता है और न ही कोइ और शरीर की इंद्रिय अथवा तप अथवा कर्म उसका साक्षात करवा सकते हैं।

हां यदि मनुष्य को गुरू कृपा से ज्ञान का प्रसाद मिल जाए और उसका अंतः करण अर्थात मन शुद्ध हो तो वह अपने ध्यान में उस निष्कलंक परमात्मा का अनुभव कर सकता है। भाव यह कि मन ही की सूक्ष्म संयमित और शुद्ध स्थिति के कारण आत्मा का अनुभव होता है और मनुष्य विशंेष आनंद का अनुभव करता है।
जब मनुष्य का शुद्ध मन कृतिका को प्राप्त हो जाएगा तो फिर वृषभ राशि का विलासात्मक वातावरण उसको कोई हानि नहीं पहुंचा सकता। सच तो यह है कि इसी वातावरण से ही उसकी उच्चतम स्थिति की परीक्षा भी हो जाती है। बस, तो मन की उच्चतम स्थिति उसके भोगमय (वृषभ राशि) वातावरण में रहकर भी आत्माकार वृत्ति या ब्रह्माकार वृत्ति (कृतिका, सूर्य का नक्षत्र) को न छोड़ने में है।
इस प्रकार हमने देखा कि चन्द्रमा को जो शास्त्रों ने वृषभ राशि के तीसरे अंश में उच्चता दी वह युक्तियुक्त और धर्म सम्मत है। और इसीलिये मान्य है।
चलो अब मंगल की उच्चता के आधार पर विचार करें। टेबल में आप देखेंगे कि

मंगल

मकर राशि के 28 अंश पर उच्च माना गया है। अर्थात यह अपने ही धनिष्ठा नक्षत्र में उत्कृष्टता को प्राप्त होता हैं
मंगल एक हिंसात्मक ग्रह है। इसका युद्ध और सेना से संबंध होता है। यह ग्रह शूरवीर बलशाली शस्त्र धारण करने वाला शासन की योग्यता वाला, नाशक, चोर, युद्ध प्रिय विरोध तथा शत्रुत्व पूर्ण उदार लाल रंग की वस्तुओं को प्यार करने वाला माना गया है। ये सब गुण एक सिपाही में घटते होते हैं।
अब प्रश्न यह है कि सिपाही की वह कौन सी स्थिति है जिसमें उसे सर्वश्रंेष्ठ माना जाये। इस प्रश्न का उत्तर शास्त्र से लेने की आवश्यकता नहीं एक बच्चा भी कहेगा कि जब कोई सिपाही किसी शत्रु पर आक्रमण करे और दुर्भाग्यवश वह अपने शत्रुओं से धिर जाए माहौल भी उसके विरूद्ध हो जाए तो उसे अपने पराक्रम का परिचय देना चााहिए। ऐसे में उसकी ऊंची स्थिति की बस कल्पना ही की जा सकती है। ज्योतिष शास्त्र ठीक इसी प्रकार मंगल की स्थिति की कल्पना करता है। मंगल अपने परम शत्रु शनि की मकर राशि में स्थित होकर अपनी वीरता का परिचय दे तो उसकी उच्चता की कल्पना की जा सकती र्है।
तो इस प्रकार हमने देखा कि मकर को चुनकर और मंगल ही के नक्षत्र धनिष्ठा को चुनकर ज्योतिष के पूर्व आचार्यों ने मंगल की उच्चता का जो नक्शा ज्योतिष शास्त्र में खींचा है वह मनोवैज्ञानिक वस्तु स्थिति और धर्मशास्त्र दोनों ही के अनुरूप है और इसलिए पक्के आधार पर अवलंबित है।

बुध-

अब बुध की उच्चता के आधारभूत सिद्धान्तों पर विचार करेंगे। बुध जैसा कि कोष्ठक से आप देखेंगे कन्या राशि के 15 वें अंश पर हस्त नक्षत्र पर जिसका स्वामी चन्द्रमा है, उच्च होता है। बुध के नाम से ही ध्यान होता है कि बुद्धि का ग्रह है। बुद्धि मनुष्य का एक विशिष्ठ गुण है जो इनको अन्य जीवों से श्रेष्ठता देती है।
मनुष्य में और पशु में निद्रा, आहार, भय और मैथुन तो समान हैं, परंतु मनुष्य धर्म एक ऐसी वस्तु है जो पशु में नहीं है और यदि मनुष्य में धर्म न हेा तो वह पशु के समान है। यहां धर्म से तात्पर्य कार्य को करने या न करने की सूझ बूझ से है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य में बुद्धि की विशेषता है। परन्तु आध्यात्मिक जगत में जिन लोगों का प्रवेश है उन्होने बुद्धि के गुण गाते हुए भी उसकी सीमा का उल्लेख किया है
बुध अपनी ही राशि कन्या में रहे ठीक है परंतु हस्त नक्षत्र के स्वामी चन्द्रमा के दया तथा अनुकम्पा आदि शुभ गुणों का अपने में समावेश कर ले, बस वह उच्च माना जाएगा। इस प्रकार बुध की कन्या राशि के 15वें अंश में उच्चता, व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक दोनों ढंग से युक्तियुक्त है।

गुरू

अब टेबल में आते हैं गुरू पर यानि ब्रहस्पति पर यह कर्क राशि के पांचवे अंश पर पुष्य नक्षत्र में उच्च हेाता है और पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि है। इस उच्चता के रहस्य को समझने के लिए कर्क राशि का स्वामी चन्द्र एक भावनात्मक ग्रह है। उसमें प्रेम, घृणा, दया, सहानुभूति, लोभ, मोह, आदि सभी प्रकार की भावनाओं का समावेश है। उधर पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि अभाव कमी, रिक्तता, शून्यता आदि का सूचक है। इस संदर्भ में तिथियों के नामों का विवेचन उपयुक्त होगा। प्रथम तिथि का स्वामी शुक्र है जोकि आमोद प्रमोद का ग्रह है। मौज उड़ाना, आनन्द का स्वामी शुक्र है। इसलिए इस तिथि को नन्दा कहते हैं। दूसरी
तिथि का स्वामी बुध है जोकि विष्णु नाम से भी प्रसिद्ध है विष्णु ही के अवतार हेाते हैं और उनका उद्देश्य दूसरांे का भर्ला आैर कल्याण करना होता है। इसीलिए दूसरी तिथि को भद्रा कहते हैं। तीसरी तिथि का स्वामी मंगल है जिसका काम लड़ना और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना है। यही कारण है कि इस तिथि को जया कहते है। पंचम तिथि का स्वामी गुरू है जो ज्ञान धन और गुणों में पूर्ण है। इसीलिए पांचवी तिथि को पूर्णा कहते हैं। रह गई चतुर्थ तिथि। इसका स्वामी शनि है। इसीलिए चतुर्थी का नाम रिक्ता (खाली)है। इसी प्रकार पांच पांच तिथियों के भी यही नाम हैं।
तो हमने देखा कि जो शून्यता की स्थिति साधारण व्यक्ति के लिए भय औार कष्ट देने वाली है वही शुन्यता ज्ञानियों की उत्कृष्ट भूमि है। कबीर कहते हैं ‘‘जिस मरने से जग डरंे मेरे मन आनंद’’ तो गुरू ग्रह यदि शनि की पुष्य नक्षत्र शून्यता को पाकर अपने आप को सराहता है तो कौन सी आश्चर्य की बात है। उसका ऐसा करना मुक्तजनों तथा ज्ञानियों की परम्परा के अनुरूप शास्त्र सम्मत है।

शुक्र –

अब आइये शुक्र की उच्चता के आधार पर भूत तथ्यों पर विचार करें। शुक्र मीन राशि में रेवती नक्षत्र के 27वें अंश पर उच्च माना गया है। (देखिये कोष्ठक पैरा 3 ) इस नक्षत्र का स्वामी बुध है। हम पहले ही बता चुके है कि शुक्र विलासिता का स्वामी है। यदि शुक्र को किसी बात से चिढ़ है तो वह है ज्ञान की बातों से। आमोद प्रमोद की बात करों तो इसी अच्छी लगती हैं। गुरू का उपदेश सुनने के लिए मंदिर जाने को कहों तो यह सिनेमा जाना पसंद करता है।
तो इस प्रकार हमने देखा कि शुक्र का मीन राशि के वातावरण मे ंरहते हुए भी अपनी बुद्धि को न खोना बुद्धिस्थ रहना उसकी परम साधना है। इसलिए शुक्र का मीन राशि के 27वें अंश पर उच्च होना अनुभव व्यवहार और धर्म सभी दृष्टियों से उपयुक्त है।

शनि

अंत में शनि की उच्चता पर भी थोड़ा विचार कर लें जैसा कि कोष्ठक से ज्ञात हेाता है कि शनि तुला राशि में 20 अंश पर राहु के नक्षत्र के अन्त पर गुरू के नक्षत्र के बिल्कुल समीप उच्च होता है। शनि की निम्न श्रेणी है। यह बेचारा धनहीन साधनहीन है। यदि इसको कहीं विलासिता का भरपूर वातावरण मिल जाए तो इसका सिर फिर जाए क्योंकि धन और सम्पत्ति जहां हों वहां अनर्थकारी सि़द्ध होती है

जवानी, दौलत, सत्ता और मूर्खता इनमें से एक भी जहां उपस्थित हो वह अनर्थ खड़ा करती है और जहां चारों इकट्ठे हो जाएं तब तो ईश्वर ही रक्षा करें। कहने का भाव यह है कि तुला राशि शुक्र की राशि है यह विलासिता की द्योतक हैैं। इस राशि में स्थित शनि को हम इसीलिए उच्च मानते हैं कि प्रतिकूल वातावरण में भी यह गुरू के गुणों (विशाखा नक्षत्र गुरू का नक्षत्र) है को ग्रहण करने को उद्यत है। क्या ऐसे निम्न स्तरीय व्यक्ति के लिए यह कम गौरव की बात है। इसलिए तुला राशि में गुरू के नक्षत्र के पास शनि को उच्च समझना यह एक व्यावहारिक सत्य है जिसका कि उपयोग हम ज्योतिष शास्त्र में करते हैं।

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