दिन महीनो के नामांकन

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दिन महीनो के नामांकन
दिन महीनो के नामांकन

जिस तरह से हर व्यक्ति , वास्तु , स्थान पशु,आदि स्वत नामकरण हो जाता उसी तरह दिन महीनो के नामांकन कारन भी भारतीय ज्योतिष की विशेषता है.

सामान्य विवरण


दोस्तों आपके मन में हमेशा एक सवाल उत्पन्न होता होगा कि ये वार यानि साप्ताहिक दिन महीनो के नामांकन कैसे और किस तरह किये  गए होंगे है
ना अजीब बात। तो आइये इस पर ही विचार करें।
 
इस बात को सभी जानते हैं कि अहोरात्रि दिनरात को कहते हैं और दिन सात होते हैं। पंद्रह दिन का एक पक्ष होता है और एक मास में दो पक्ष होते हैं। एक का नाम है कृष्ण पक्ष और दूसरे का नाम है शुक्ल पक्ष।
 
बारह मास का एक वर्ष होता है। परन्तु यह जानने योग्य बात है कि वारों दिनो का क्रम रविवार के बाद सोमवार तथा सोमवार के बाद मंगलवार, बुधवार आदि क्यों हैं।
 
तात्पर्य यह कि रविवार के बाद सोमवार ही क्यों, दूसरा कोई और वार क्यों न हुआ? गौरव की बात यह है कि इस बात को बतलाने का श्रेय भी भारत वासियों को ही है।
 
यह बात तो सर्व विदित है ही कि सभ्यता का उदय तथा बुद्धि और ज्ञान का विकास सबसे पहले प्रथम भारत में ही हुआ था। यूरोप वासी भी सन्डेरविवार इत्यादि वारों का नाम इसी क्रम में बोलते हैं। परन्तु उन लोगों ने यह नहीं बताया कि इस क्रम से सप्ताहों के नाम पर सात दिन क्यों माने गये।
 

दिन महीनो के नामांकन का कारण

 
 तो आइये हम ही इस पर विचार करें।
 
सबसे दूर शनि है। उसकी दूरी 88 करोड़ मील दूर से अधिक है। अतः शनि की एक परिक्रमा 10759 दिनों में अर्थात तीस वर्ष में होती है।
 
शनि से कम दूरी पर गुरू यानि ब्रहस्पति है। यह 48 करोड़ मील से कुछ और दूरी पर है। इस कारण यह एक परिक्रमा 4332 दिनों में करता है।
 
बृहस्पति से कम दूरी पर मंगल है। इसकी एक परिक्रमा 686 दिनों की होती है। मंगल से कम दूरी पृथ्वी की है। यह लगभग 9 करोड़ मील की दूरी पर है।
 
पर हम पृथ्वी को चलता हुआ ना मान कर सूर्य को चलता हुआ मान लेते हैं। यही स्थान सूर्य को दिया गया।
 
इससे कम दूरी पर शुक्र है इसकी दूरी 6 करोड़ मील से अधिक हैं इस कारण शुक्र एक परिक्रमा 224 दिन में करता है।
 
शुक्र से भी कम दूरी पर बुध है। सबसे निकटस्थ चन्द्रमा है। यह ढाई लाख मील से कम दूरी पर है। अतः चंद्रमा 27 दिनों में अपनी परिक्रमा समाप्त कर लेता है।
 
 अब यदि इन ग्रहों को उनके दूरवर्ती क्रम से लिखें तो वे इस क्रम से पडेंगे। शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र बुध चन्द्रमा। अहोरात्र एक दिन रात को कहते हैं।  अहो शब्द के होऔर रात्रि के राको मिलाने से सांकेतिक नाम होराशायद इसीलिए आवरअंग्रेजी घंटे का नाम भी इसी शब्द की उत्पत्ती है।
 
सृष्टि की उत्पत्ति के समय सबसे पहले सूर्य का उदय होता है। उसी क्रम में पृथ्वी और अन्य तारा मंडल का उदय होता है। तो ऋषियों ने पहला होरा सूर्य का माना और उसके बाद दूसरा होरा शुक्र का जो उससे समीपवर्ती ग्रह है। उसके बुध का, क्योंकि शुक्र बुध के निकट है।
 
इसी क्रम में चैथा होरा चन्द्रमा का, पंचवा शनि का और छठा बृहस्पति का। सातवां मंगल का। पुनः आठवां रवि का, नवां शुक्र का दसवां बुध का, ग्यारहवां चन्द्रमा का, बारहवां शनि का, तेरहवां बृहस्पति का, चैदहवां मंगल का, पंद्रहवां सूर्य का, सोलहवां शुुक्र का, सत्रहवां बुध का, अठारहवां चंद्रमा का उन्नीसवां शनि का, बीसवां बृहस्पति का इक्कीसवां मंगल का, बाईसवां सूर्य का तेइसवां शुक्र का और चैबीसवां या अंतिम बुध का हुआ।
 
इस कारण ऋषियों ने सूर्यवार के बाद चंद्रवार(सोमवार) नाम रखा। पुनः आप इसी क्रम से पहिला रवि से आरम्भ करें।
 
1           2शु            3बु               4चं
5           6गु           7मं               8
9शु           10बु         11              12
13गु         14मं      15                 16शु
17बु          18चं      19               20गु
21मं          22      23                24बु
 
इसी तरह 24वां होरा पर सोमवार समाप्त हुआ। अतएव जब मंगल का होरा उसके बाद पड़ा तो उस वार का नाम मंलवार पड़ा यदि आप इसी क्रम से गिनते जाए तो मालूम होगा कि मंगल से पहला होरा प्रारम्भ करने पर चैबीसवां होरा शुक्र का होता है।
 
इस कारण मंगल के बाद का दिन बुधवार हुआ क्योंकि शुक्र के बाद चक्र में बुध का स्थान आता है। इसे फिर से समझे माना आज रवि वार है तो पहला घंटा रवि का दूसरा शुक्र का तीसरा बुध का चैथा चंद्रमा का पंचवा शुनि का छठा गुरू का सातवां मंगल का आदि। इस प्रकार आज का चैबीसवां घंटा बुध का हुआ। जब अगला घंटा शुुरू होगा तो वह चंद्र का अर्थात सोमवार का होगा दिन का प्रथम घंटा होगा। इसी क्रम में अन्यों को भी समझे।
 
अतएव उपरोक्त बातों के देखने के बाद स्पष्ट होता है कि भारतवासियों की कोई भी बात कपोल कल्पित नहीं है।
 

मास

 
मास बारह होते हैं यह सभी जानते हैं और उनके नाम से भी परिचित हैं। एक बात यहां भी जानने योग्य है कि चैत्रादि नाम इन मासों का किस तरह पड़ा। विचारना यह है कि ये नाम सार्थक हैं अथवा निरर्थक।
 
देखने से यह ज्ञात होता है कि जिस मास की पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र पड़ा उसका नाम चैत्र हुआ और जिस मास की पूर्णिमा को विशाखा पड़ा उसका नाम वैशाख पड़ा इसी रीति से ज्येष्ठा के पड़ने से ज्येष्ठ, पूर्वाषाढ़ के पड़ने से आषाढ़ श्रवण से श्रावण, पूर्वाभाद्र से भाद्रपद अथवा भादों, अश्विनी से आश्विन, कृतिका से कार्तिक, मृग्शिरा से मार्गशीर्ष(अगहन), पुष्य से पौष, मघा से माघ और पूर्वा-फाल्गुनी से फाल्गुन हुआ। (इस नियम से अब युग परिवर्तन के कारण तथा नक्षत्रों की गति परिवर्तन से यदा-कदा किसी किसी मास में कुछ परिवर्तन नजर आता है।)

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