दान पुन्य के फल

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व्यक्ति की कुंडली में ख़राब ग्रहो की अनुकूलता हेतु भारतीय ज्योतिष में दान पुन्य के फल का महत्व बताया गया है. जिससे शुभ परिणाम प्राप्त होंगे.

daanpuny ke fal
daanpuny ke fal

ज्योतिष में बुरे ग्रहो के प्रभाव को शांत करने के कुछ उपाए सुझाए गए है उन्हें दान पुन्य के फल के रूप में दर्शाया गया है. इन ग्रहो को कम प्रभावशाली बनाने के लिए उनके ताप को मिटाने के लिए उपायों का सहारा लिया जाता है जिन्हें हम दान पुन्य के फ्लो के अंतर्गत जानेंगे. तो आइये शुरू करे और जाने की क्या है वे उपाय .

अशुभ ग्रहो के उपाए

दान-पुन्य के फल
दान-पुन्य के फल

सूर्य ताप से जगत में वर्षा, होती है, गर्मी होती है, सर्दी होती है बरसात होती है, तूफान आते हैं, बाढ़ आदि प्राकृतिक नियमानुसार इस संसार में आते हैं, उसी तरह यह प्राकृतिक नियम है कि ग्रह अपने शुभ या अशुभ फल अवश्य देंगें।

दान पुन्य के फल को प्राप्त करने के लिए, प्राकृतिक विपदाओं से बचने के लिए मानव सदा से सुरक्षात्मक उपाय करता आया है तथा नित्य निरन्तर नए उपायों की भी खोज जारी है। उन सबके करने से जिस तरह प्राकृतिक प्रकोपों के सीधे कुप्रभाव से बचा जा सकता है, उसी तरह उपाय करने से ग्रहों के कुप्रभाव को भी यथा समय कम करना आसान है।

इसी कारण विद्वान आचार्यों ने शास्त्रों में ‘अरिष्ट शांति या ग्रह शांति’ विधान किया है। आसान शब्दों में कहा जा सकता हैं कि जो ग्रह आपके लिए किसी समय विशेष कष्टकारक या अनिष्टकारक हो रहे हों, उनके लिए कुछ दान पुन्य, जप, व्रत अथवा नग आदि धारण करने से काफी हद तक उनके कुप्रभाव को कम किया जा सकता हैं।

यहाँ सभी ग्रहों की दान पुन्य की वस्तुएँ, मणि, जप का मंत्र का तथा जप मंत्र कितना करें ये सब जानकारी दे रहे हैं। इससे पाठक अवश्य लाभ उठाएँगे। ग्रहों की सम्बन्घित मणियाँ विधिपूर्वक धारण करने से प्रत्यक्ष फल का अनुभव किया जा सकता है।

सूर्य
दान पुन्य- गेहूँ, ताँबा, घी, मसूर, गुड़, कंुकुम, लाल कपड़ा, कनेर के फूल, लाल कमल, बछड़े सहित गौ तथा सोना सबका अथवा जितनी वस्तुएँ उपलब्ध हों उनका यथा शक्ति दान करें।
मन्त्र- ऊँ घृणिः सूर्याय नमाः इस मंत्र का 7000 जप करके आक की लकड़ी से हवन करना चाहिए।

चन्द्रमा
दान पुन्य- सफेद कपड़ा, मोती, चाँदी, चावल, खाँड चीनी, दही, शंख, सफेद फूल, सफेद वृषभ (साँड)
मंत्र-ऊँ स्वौं सोमाय नमः इसका 11000 जप करना चाहिए तथा ढाक की लकड़ी से हवन कना चाहिए।
मणि- सफेद शुद्ध मोती चाँदी में मढ़वाकर दाएँ हाथ की अनामिका में पहने।

मंगल
दान पुन्य वस्तु- मसूर, गुड़, घी, लाल कपड़ा, गेहूँ, लाल फूल, ताँबा, केसर,
मंत्र- ऊँ अं अंगारकाय नमः इसका 10000 जप करना चाहिए। खेर (खादिर) की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- मूँगा सोने या ताँबे में पहनना चाहिए।

बुध-
दान पुन्य वस्तु – मूँग, खाँड, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे का बर्तन, हाथी दाँत, कपूर।
मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः इस मंत्र का 19000 जप करके चिरचिटा (अपामार्ग) की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- पन्ना (मरकत मणि) चाँदी या सोने में बनवाकर छोटी अँगुली में पहनना चाहिए।

गुरू
दान पुन्य वस्तुएँ-चने की दाल, कच्ची शक्कर, हल्दी, पीला कपड़ा, पीला फूल घी सोना।
मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः इस मंत्र का 19000 जप करना चाहिए तथा पीपल की लकड़ी में हवन करना चाहिए।
मणि- पुखराज को सोने में बनवाकर अंगूठे के पास वाली अंगुली (तर्जनी) में अथवा अनामिका में धारण करना चाहिए।

शुक्र
दान पुन्य वस्तु – चाँदी, चावल, दूध सफेद कपड़ा, घी, सफेंद फूल खुश्बुदार धूप या अगरबबत्ती, सफेद चन्दन।
म्ंात्र- ऊँ शंु शुक्राय नमः । इस मंत्र का जप 6000 करके गूलर की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- हीरा किसी सफेद धातु प्लेटिनम में पहनना चाहिए।

शनि-
दान पुन्यवस्तु- काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, तेल, सन (जूट) काला पुष्प, कस्तूरी, काला तिल, काला कम्बल
मंत्र- ऊँ शनेश्चराय नमः इसका 23000 जप करके शमी (जांड) की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- नीलम, चाँदी, या सप्तधातु में बनवाकर बाएँ हाथ की बड़ी अंगुली में पहनना चाहिए।

राहू
दान पुन्य वस्तु- काला तिल, तेल, उड़द कुलथी,(गहत) सरसोदाना, राई, काला फूल, नीला कपड़ा, काला नीला कम्बल, या ऊनी कपड़ा।
मंत्र- ऊँ रां राहवे नमः इस मंत्र का 18000 जप करके दूब ( घास) सहित आम की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- गोमेद को चाँदी या अष्टधातु में बनवाकर बाएँ हाथ की मध्यमा उंगली में पहनना चाहिए।

केतू
दान पुन्य वस्तु- सात अनाज, काजल, झंडी, ऊनी कपड़ा तिल, बकरा।
मंत्र- ऊँ कें केतुवे नमः इस मंत्र का 17000 जप कर कुशा (डाब,कांस) मिश्रित आम की लकड़ी से हवन करना चाहिए।
मणि- लहसुनिया चाँदी, ताँबे या अष्टधातु में बनवाकर बाएँ हाथ की लम्बी अंगुली अथवा अनामिका में पहने।

ग्रह की प्रसन्नता

ग्रह की प्रसन्नता के लिए दान पुन्य योग्य वस्तुओं में से यदि कुछ वस्तुएँ उपलब्ध न हों अथवा सामथ्र्य न हेा तो यथाशक्ति वस्तुंओं का दान करना चाहिए।

हवन के लिए जो लकड़ी बताई गई है वास्तव में उन उन ग्रहों की वे समिधाएं है। यदि वे उपलब्ध न हों तो आम, पीपल या गूलर की लकड़ी से हवन किया जा सकता है तथा सम्बंधित ग्रह की समिधा की कुछ आहुतियाँ देनी चाहिए।
यदि तुंरंत मणि का प्रबंध न हो सके अथवा सामथ्र्य न हो तो ग्रहों की सम्बन्धित धातु की अंगूठी या छल्ला ही बनवाकर निर्दिष्ट अंगुलियों में पहन लेना चाहिए।

यदि कोई तंत्रोक्त मंत्रों के स्थान पर वैदिक मंत्रों का प्रयोग करना चाहे तो कोई हानि नहीं है। मंत्र की जप संख्या उस स्थिति में भी पूर्ववत रहेगी।

यद्यपि जप, हवन, दान व मणिधारण इन सबके करने से पूर्णफल मिलता है, लेकिन आजकल के व्यस्त जीवन में यदि कोई व्यक्ति एक ही कार्य करना चाहे तो उसे मणि या धातु धारण कर लेनी चाहिए। मणि शीध्र व सबसे अधिक प्रभावकारी होती हैं इसकी विकीरण क्षमता त्ंकपव ।बजपअपजल शरीर की तरंगों के साथ मिलकर तुरन्त फल देने में समर्थ होती है।

वैसे महामृत्युंजय जप, दुर्गा सप्तशती पाठ अथवा हनुमान चालिसा या हनुमान बाहुक का नित्य पाठ अथवा आयोजित पाठ जप आदि कराने से सामान्यतः सभी अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

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