ज्योतिष मे पिता

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ज्योतिष मे पिता
ज्योतिष मे पिता

ज्योतिष में पिता को एक महत्व पूर्ण आधार स्तम्भ के रूप में माना गया है जिसके बिना दुनिया ही न होती.

ज्योतिष मे पिता

नवमस्थान, नवमेश और सूर्य से रात्रि मे शनि से भी होता है।

बताया जा चुका है कि सूर्य ज्योतिष पिता का कारक होता है। इस कारण यदि छठे स्थान में सूर्य हो तो शुभ तो होता है लेकिन वंश वृद्धि में सहायक नहीं होता है।

दशम में यदि मंगल हो और नवमेश नीच राशि में हो तो पिता को दुख होता है।
सूर्य व नवमेश पापयुक्त अथवा दृष्टि हों या दो पाप ग्रहों के बीच हों तोे पिता को दुख होता है।


सूर्य शुभ युक्त हो और नवमेश शुभ ग्रह हो तो पिता सुंखी होता है।
नवमेश शुभ ग्रहों के बीच हो और गुरू और शुक्र में से किसी की भी उस पर दृष्टि हो तो पिता सुखी होता है।


ज्योतिष मे पिता के अष्टम भाव की राशि यदि पुत्र का लग्न हो तो पिता को अशुभ होता है।
नवमेश से यदि लग्नेश बलवान हो और सूर्य पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो पुत्र पिता से प्रेम करने वाला
पिता के दशम भाव की राशि यदि पुत्र का लगन हो तो पिता समान पुत्र होता है।
पिता पुत्र का लग्न समान हो या तीसरे भाव की राशि पुत्र का लग्न हो तो पुत्र पैत्रिक धन प्राप्त करता है।

ज्योतिष मे पिता—दशम भाव में सूर्य हो तो भी पैत्रिक धन पुत्र को मिलता है।


पुत्र का जन्म लग्न यदि पिता के छठे या आठवें भाव की राशि हो तो पुत्र पिता का वैरी या छिद्रांवेषी (Camouflage) होता हैं।


पुत्र का लग्न यदि पिता की द्वितीय, तृतीय या नवम भावस्थ राशि हो तो पुत्र पिता का आज्ञाकारी होता है।

यदि पिता पुत्र का जन्म नक्षत्र एक ही हो या एक आगे का या एक पीछे का हो तो पुत्र परदेश गामी होता है। पिता को पुत्र का वियोग रहता है।


रात्रि में विषम राशि में पुत्र का जन्म होने से पुत्र पिता के लिए शुभ होता है।
यदि चतुर्थेश और षष्ठेश नवम भाव में हों तो पिता भोगी विलासी होता है। इसी प्रकार चतुर्थेश नवमेंश चतुर्थ भाव में हों तो पिता विलासी होता है।

बचपन में पिता की मृत्यु का योग


पंचम अथवा नवम में क्रूर राशि हो और उसमें सूर्य बैठा हो तो पिता मृत्यु को शीघ्र प्राप्त हो, चंद्रमा बैठा हो तो माता की मंगल बैठा हेा तो भाई की बुध बैठा हेा तो मामा की गुरू बैठा हो तो नानी की शुक्र बैठा हो तो नाना की शनि बैठा हेा तो स्वयं बालक की मृत्यु हो।


सूर्य, शनि द्वादश में चंद्र सप्तम में हो तो पिता की मृत्यु शीध्र हो। यदि मंगल सूर्य साथ हों और शनि की दृष्टि इन पर हो तो एक वर्ष में पिता की मृत्यु हो जाती है।

नवमस्थ राहू पर सूर्य शनि अथवा मंगल की दृष्टि हो तो पिता को एक सप्ताह में कोई अरिष्ठ होता है।


सूर्य से शनि मंगल अंष्टम में हों और उन पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हेा तो पिता की मृत्यु होती है।

नवमेश से सूर्य राहू कुंडली मे अष्टम में हों और साथ कोई शुभ ग्रह न हेा या न देखता हो तो पिता की मृत्यु होती है।
लग्न से नवम में सूर्य पाप ग्रह के साथ बैठा हो और चंद्र सूर्य के नक्षत्रों में हो यानि कृतिका दोनो उत्तरा में हेा तो पिता की मृत्यु शीध्र हो।
नवमेंश राहू के साथ नवम स्थान में हो और राहू की दशा हो तो पिता की मृत्यु शीध्र होती है।

पिता की मृत्यु का समय

लग्न से एकादशस्थ या नवमस्थ शनि, मंगल और राहू अपनी दशा अंतरदशा में पिता के लिए मारक होता है।


यदि नवमेश के साथ अष्टमेश हो अथवा अष्टमेश की नवमेश पर दृष्टि हो तो नवमेश की दशा में पिता की मृत्यु हो सकती है लेकिन राग तो अवश्य होता है।

इसी प्रकार और भावों का भी विचार किया जा सकता है।जैसे, यदि सप्तमेश के साथ अष्टमेश हो अथवा सप्तमेश पर अष्टमेश की दृष्टि हो तो सप्तमेश की दशा अन्तरदशा में स्त्री के लिए अनिष्ट होता है।

इसी प्रकार पंचमेश के साथ अष्मेश हो अथवा पंचमेश पर अष्टमेश की दृष्टि हो तो पंचमेश की दशा अंतरदशा पुत्र को अनिष्ट होता है।

यहाँ दृष्टि से अभिप्राय पूर्ण दृष्टि यानि 180 डिग्री से है।


लग्न से नवमस्थ और एकादशस्थ शनि, मंगल और राहू अपनी-2 दशा अंतरदशा में पितृमृत्युकारक होता है।


रवि जिस राशि या नवांश में हो, उस में से बलवान राशि के त्रिकोण में गोचर का रवि आने से पिता की मृत्यु होती है। जिससे मृत्यु के मास का ज्ञान होता है।


सूर्य से द्वितीय द्वादश जो ग्रह हो और जिस पाप ग्रह के साथ सूर्य हो अथवा जिस पाप ग्रह से सूर्य सप्तमस्थ हो वही ग्रह पिता के लिए अपनी दशा अंतरदशा में दुखदायी अथवा मृत्यु कारक होता है।

यदि लग्न में गुरू और द्वितीय में रवि शनि मंगल और बुध हो तो बालक के विवाह के समय जातक के पिता की मृत्यु होती है।


यदि लगन या चैथे में राहू और शत्रु राशि गत गुरू हो तो पिता की मृत्यु बालक के 23वे वर्ष में होती है।


रवि अथवा चंद्रमा केंद्र में चर राशि 2-5-8-11 में हो तो ऐसा जातक अपने माता पिता का अंतिम दाह संस्कार आदि नहीं कर सकता है। अर्थात अपनी अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण सेे पुत्र पिता की अंतिम क्रिया में सम्मिलित न हो सकता है।

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