ज्योतिष गुरु भारत

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ज्योतिष गुरु भारत कहते हुए लोगो को शर्म क्यों आती है जबकि यूरोपीय और इस्लामी कैलंडर का जानक भारत ही है आओ हम इस गोरव को जाने

ज्योतिष गुरु भारत
ज्योतिष गुरु भारत
मौलिक बातें

दोस्तों अभी तक हमने ज्योतिष से संबंधित इतिहास और उसके परिप्रेक्ष के बारे में जाना है, उसका भारत और दुनिया में क्या स्थान है के बारे में जाना।

यह तो आप सभी जानते हैं कि भारत ही दुनिया में “ज्योतिष गुरु भारत” के नाम से विख्यात है. ज्ञान का प्रारम्भिक सृजन कर्ता है। जिसे देख कर अन्य देशों ने भी अपनी अपनी पद्धतियों का विकास किया लेकिन कोई भी देश इस दिशा में अपने ज्योतिष के ज्ञान को उस ऊंचाई तक नहीं पहुँचा पाया जिस दिशा गति और ऊंचाई पर भारत के मनीशियों ने इसे पहुँचा दिया।

ज्योतिष गुरु भारत

    क्या यह कम गौरव की बात है कि जब सारी दुनिया के केवल गिनती ही सीख रही थी भारत पहले ही  अंश,कला,विकला और पल विपल और प्रतिपल की गणनाएं कर चुका था। हाॅलाकि जो गणनाए आगे चल कर मैं उपलब्ध करवाउंगा उनके स्रोत गणना का तरीका क्या था उसे आज का विज्ञान भी मानता तो है लेकिन विश्वास नहीं करता है कि बिना भौतिक मशीनों के इस प्रकार की गणनाएं भला कोई के नंगी आँखों से आकाश में देख कर कैसे कर सकता है। तो आइए देखें की ज्योतिष की ये सूक्ष्म गणनाएं क्या थीं।

भारत वर्ष में समय का ज्ञान

भारत के मनिशियों ने पता लगाया कि अति कोमल कमल के फूल में एक तीक्ष्ण सूई के चुभाने में जितना समय लगता है, उसका नाम त्रुटि है। ऐसे 100 त्रुटियों का एक लवऔर 30 ‘लवका एक निमेषहोता है। 27 निमेश का एक गुरू अक्षर’, 10 गुर्वाक्षर का एक प्राणऔर और छः प्राण की एक विघटिकाहोती है। 60 विघटिका की एक घटिकाअर्थातदण्डऔर 60 दंड का एक दिनराततात्पर्य यह कि एक रादिन में 17496000000 ‘त्रुटियाँहोती हैं। अंग्रेजी हिसाब के अनुसार 86400 सेकेण्ड एक दिनरात में होते हैं।

दूसरी रीति से समय का अनुमान, महर्शियों ने यों भी किया हैः-

60 तत्परस–  1परस
60 परस–    1विलिप्ता
60 विलिप्ता —1लिप्ता
60 लिप्ता —  1विघटिका
60 विघटिका–1घटिका या दंड
60 दंड —    1दिनरात

अर्थात एक दिनरात्रि में 4665600000तत्परस होते हैं। इस कारण 1 सेकेंड में 540000 तत्परस हुए।

यह तो मानस के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का अनुमान है। हुआ। अब महर्शियों के काल संबंधि ज्ञान का विषाल रूप नीचे दिग्दर्षित किया जाएगा जिसे देख कर मनुष्य साधारण बुद्धि अवश्य ही चकरा जाएगी।

सतयुग    432000×4 =  1728000 वर्ष का
त्रेता युग   432000×3 =   1296000 वर्ष का
द्वापर युग 432000×2 =  864000 वर्ष का
कलि युग   432000×1 =   432000 वर्ष का
इस प्रकार महायुग     =   4320000 वर्ष
71  महायुग                 =    4320000×71
मंवंतर               =  306720000
14    मंवंतर                      =   4294080000वर्श

सतयुग के वर्ष प्रमाण तक पृथ्वी,जल अंतर्गत प्रति मंवंतर के पूर्व और पर रहती है। इस कारण 14 मंवंतर मेंः-

17280000×15       =   25920000
कल्प                — 4320000000 वर्श
ब्रह्म का एक दिनरात  — 4320000;महायुगद्ध×1000
                                      =   4320000000 वर्ष

दोस्तों ! आप लोग समझ ले कि कन्दराओं और गुफाओं में निवास करनेवाले उन निःस्वार्थ तपस्वियों ने क्या कोई गप की बातें बताई थीं 

जब हम लोग कोई हवन या पूजा पाठ घरों में करवातें हैं तो पंडित एक संकल्प बोलते हैं वो यों हैं कि ऊँ ततसत् ब्रह्मणो द्वितीये पराद्र्धे, श्री श्वेत वाराहकल्पे, बैवस्वत् मन्वन्तरै, श्या-विंशति तमें युगे, कलियुगे कलिप्रथम चरणे इत्यादि। अर्थात मैं अमुक शुभ कार्य का कर्ता सतब्रह्म के दूसरे पहर में श्वेत बाराह नामक कल्प में वैवस्वत मन्वंतर के अठाईसवें युग में, कल के पहले चरण में इत्यादि इत्यादि, अपने कार्यारम्भ का संकल्प करता हँू।

ज्योतिष गुरु भारत

इस प्रकार आपने देखा कि भारतीय मनीषी गण कितनी सूक्ष्म गणनाएं कर गए हैं।

अभिप्राय यह है कि उज्जैन में जितने लेख पाये हैं उन लेखों की शुद्धि की अरब देश के अलबेरूनी नामक

गणित सिद्धांतज्ञ ने भी भारतीय गणित को ही शुद्ध बतलाया है। और अलबेरूनी के 800 वर्श पश्चात हन्टर साहब ने भी वही बात बतलाई । अतएव डा. केरू लिखता है हिन्दू गणितज्ञ वैज्ञानिक रीति से गणित करते थे। बड़े शोक की बात है कि जिस भारतवर्ष की सभ्यता का सूर्य हजारों वर्ष पूर्व से ही देदीप्यमान था उस भारत के रहने वाले हम लोग अभी अभाग्यवश और आलस्य में पड़ कर पाश्चात्य सभ्यता के पीछे दौड़े चले जा रहे है।

 
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