ज्योतिष के योग

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ज्योतिष के योग
ज्योतिष के योग

सामान्यतया जो बात कुंडली के ग्रह नहीं कह पाते वो बात ज्योतिष के योग कह देते है. अब इसका पता लगाने की लिए तो आपको ज्योतिषी बनना होगा.

पाए

साधारणतया जिस ज्योतिष के योग की भारतीय जनमानस में चर्चा होती है वो है दंपत्ति के घर में जब बच्चे का जन्म होता है तो वह जन्म पत्री बनवाते हुए कुछ विशेष बातों को जानने का बहुत इच्छुक होता है।

उत्तर भारतीय क्षेत्रों हरियाण पंजाब राजस्थान उत्तर प्रदेश या अन्य प्रदेशों के लोग भी यदि लड़का हो तो सबसे पहले नामाक्षर जानते समय ज्योतिषी से यह भी पूछा जाता है कि बालक किस पाए (पाद) में पैदा हुआ है।

घर के बड़े बूढ़े तो इसी बात को जानकर फूले नहीं समाते कि उनके यहाँ जन्मने वाला बालक शुभ पाए में हुआ है। उनके लिए तो सारी जन्म पत्री का निचोड़ इसी विषय को जानने में निहित है।

वास्तव ज्योतिष के योग में इसी तरह की सामान्य जिज्ञासा की बातें जनसाधारण में प्रचलित हैं, जिन्हें जानने के लिए जनसामान्य उतावले रहते हैं। जैसे बालक किस नक्षत्र में पैदा हुआ है कहीं गण्डमूल नक्षत्र में तो नहीं पैदा हुआ। कहीं बालक मंगली तो नहीं आदि।

इस प्रकरण पर बात करने का उद्देश्य यही है कि जब प्रारम्भिक कंुडली बनाना कोई जान लेगा तो ये सामान्य बाते वह खुद ही जान जाएगा। देहाती पंडित ज्योतिष के योग जानने के मामले ज्योतिष में पारंगत न हो लेकिन यदि इन बातों को बताने की ही सामर्थ्य रखता है तो भारतीय ज्ञान पीठ के मानद पत्र से कम नहीं।

पाया क्या होता है?

सारी कुंडली के बारहों स्थानों को चार भागों में बांटा गया है प्रत्येक भाग एक पाया कहलाता हैं उन पायो में धातुओं की कल्पना की गई है। अर्थात सोने का पाया, चाँदी का पाया, ताँबे का पाया, और लोहे का पाया।

चंद्रमा कुंडली के जिस भाग में स्थित हो उसके अनुसार ही पाया जाना जाता हैं

सोने का पाया –

चंद्रमा यदि कुंडली में पहले छठे ग्यारहवें स्थान में हो तो सोने का पाया होता है।

चाँदी का पाया-

चँद्रमा यदि दूसरे, पाँचवे, व नौवे भाव में हो तो बालक का जन्म चाँदी के पाये से है।

ताँबे का पाया-

चँद्रमा यदि तीसरे सातवे दसवें स्थान में हो तो ताँबे के पाये से बालक का जन्म होता है।

लोहे का पाया-

चँद्रमा यदि चैथे आठवें बारहवें स्थान में हो तो बालक का जन्म लोह पाद से कहें।

चाँदी के पाये से जन्म होने पर बालक को प्रायः भाग्यवान समझा जाता है। अपनी श्रेष्ठता में चाँदी का पाया सर्वोत्तम हैं।

श्रेष्ठता के क्रम में दूसरे नम्बर पर ताँबे का पाया आता है।

तीसरे नम्बर पर जनसामान्य में स्वर्णपाद में जन्म होने को मान्यता प्राप्त हैं।

चोथे नम्बर पर लौह पाद आता है। लेकिन स्वर्ण और लौह को हीन समझा जाता हैे, पर लौह को निकृष्ठ समझा जाता है।

चंद्रमा को जन्म पत्री का प्राण कहा गया है।

ज्योतिष के योग के मामले में चंद्रमा की अच्छी या बुरी स्थिति से बालक के अरिष्ट या शुभ का विचार किया जाता है। वैसे अरिष्ठ भंग का विचार करे तो चंद्रमा की 6ठे एवं आठवे स्थान में स्थिति अरिष्ठ भंग कर देती है।यह अपवाद स्वरूप ही है इसे ध्यान में रखें।

मांगलीेक विचार


कुंडली में मंगल की विशेष स्थिति- एक, चार, सात, आठ, बारह स्थानों में हो तो बालक मंगलीक कहलाता है। ज्योतिष के योग का विशेष कर विवाह के समय ही इसका विचार किया जाता है।

लड़का लड़की की कंुडली में समान दोष युक्त संबंध हों तो विवाह उत्तम माना जाता हैं यदि एक की कुंडली में जिस स्थान में मंगल हो दूसरे की कंुडली में उसी स्थान या इनमें से जिस किसी स्थान पर मंगल के अलावा शानि हो तो मंगलदोष का परिहार हो जाता है।
इसी प्रकार मंगलीक का विचार चंद्र कुंडली से भी करना चाहिए। यदि लग्न में मंगल इनमें से किसी स्थान में हो और चंद्र कुंडली में दूसरे के इन्हीं स्थानों में मंगल हो तो दोष माना जाता है। मंगल किस स्थान पर है इसका विचार कंुडली बनाते समय भाव मध्य में मंगल किस स्थान पर है से करना चाहिए।

गंडमूल नक्षत्र

ज्योतिष में इसे निकृष्ठ कहा गया है क्योकिं तिथि, लग्न व नक्षत्र का कुछ भाग गंडांत कहलाता है। अतः तिथि गंडांत , नक्षत्र गंडांत, लग्न गंडांत माने जाते हैं। सामान्य गण में विश्वास है कि गंडांत में पैदा हुआ बालक अधिक जीवित नहीं रहता।या कष्ट पूर्ण जीवन जीता है।

सरावली ज्योतिष पुस्तक में कहा गया है कि गंडांत में जन्मा बालक जीवित नहीं रहता। यदि जीवित रहे तो माता के लिए कष्ट दायक होता है। तथा स्वंय वह धन संपत्ति शाली होता है।

इसलिए गंडांत बालक को सदैव दुर्भाग्यशाली ही नहीं समझना चाहिए। हम तीनों ही गंडांतो पर विचार करेंगे लेकिन नक्षत्र गंडांत विशेष व प्रभावशाली होता है।

 पहली, छठी, एकादशी तिथि की शुरू की एक घड़ी (24 मिनट) तथा पूर्णिमा, पंचमी, दशमी की अंत की एक घड़ी:तिथि गंडांतः कहलाती है।

 मीन के अंत की आधी घड़ी, और मेष की शुरू की आधी घड़ी कर्क के अंत की आधी घड़ी व सिंह के शुरू की आधी घड़ी, वृश्चिक के अंत व धनु के शुरू की आधी आधी घड़ी ‘लग्न गंडांत’ कहलाती है।

 रेवती, ज्येष्ठा व अष्लेषा की अंत की दो-दो घड़ी (48मि) अश्विनी, मधा व मूल के शुरू की दो-दो घड़ी –‘नक्षत्र गंडांत’ कहलाती है।

इनमे उत्पन्न बालक विशंेष रूप से अनिष्ठ कारी समझा जाता है। यदि अरिष्ठ भंग योग व आयु योग तथा चंद्र बृहस्पति की स्थिति अच्छी हो तो बालक जीवित रहता है।

सामान्य रूप से अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, और रेवती ये नक्षत्र गंडमूल कहलाते हैें। इनमें चरण विशेष में पैदा होने पर अलग अलग फल होता है। इनमें जन्म हो तो मूल शान्ति कराई जाती है और 27वें दिन जब पुनः वहीं नक्षत्र आता है, तो स्नान विधानपूर्वक जप समाप्ति व हवन आदि किया जाता है।

इनमें भी अश्लेषा, ज्येष्ठा व मूल ये तीन विशेष प्रभावशाली माने गये हैं।

मंगलीक दोष के अपवाद
 यदि इन्हीं 1-4-7-8-12 स्थानों में एक की कंुडली में मंगल हो और दूसरे की कुंडली में शनि राहू मंगल हो तो दोष नहीं रहता है।

 यदि बलवान गुंरू या शुक्र लग्न में अथवा सप्तम में हो तों दोष खतम हो जाता है।

 यदि मंगल नीच अस्त या शत्रु राशि (पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार) का हो तो दोष नहीं रहता है।

 क्ेंद्र व त्रिकोण में शुभ ग्रह तथा 3,6,11 स्थानों में अशुभ ग्रह हों तो मंगल दोष नहीं होता है।

 यदि सप्तमेश सातवे स्थान में ही हो तो मंगल देाष नहीं रहता है।

एक नक्षत्र जन्म फल

एक ही नक्षत्र में माता पिता व सन्तान का जन्म अशुभ होता है। यदि एक ही नक्षत्र में दो भाई बहनांें का जन्म हो तो अशुभ होता है। दोनों मे से एक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

त्रिखल (तेगड़ा) विचार

यदि किसी परिवार में तीन लड़की या तीन लड़कों के बाद होने वाले बच्चे का लिंग बदल जाए तो त्रिखल दोष होता है। मतलब यह कि तीन लड़कियों के बाद लड़का हो या तीन लड़कों के बाद लड़की हो तो यह दोष होता है। जनसाधारण की भाषा में इसे (तेगड़ा) कहते हैं। मूल शान्ति की तरह इसकी भी शांति कराई जाती है।

कार्तिक माह में जन्म अशुभ

कार्तिक (सौरमास) में यदि यदि बच्चा हो तो अशुभ माना जाता हैं। शास्त्रों जीवों के जन्म के कुछ अशुभ माह बताए गए है। कार्तिक में जन्म होने पर बालक कुल नाशक होता है। इसके लिए कार्तिक शांति का विधान है।

जानकारी के लिए कुछ अन्य प्राणियों के लिए भी अशुभ संतानोत्पत्ति मास ये है।
माघ यानि मकर संक्रांति पर भैंस का जन्म, सिंह सौर मास में गाय का जन्म, कर्क सौर मास में घोड़ी का जन्म, धनुमास में बकरी का जन्म तथा वृश्चिक मास में हथिनी का जन्म मालिक के लिए अशुभ होता है।

ज्वालामुखी योग-

ज्योतिष में कुछ विशेष तिथियों और नक्षत्रों के योग को बुरा माना गया है। इन योगों में भी सबसे अशुभ नाशक योग को ज्वालामुखी योग कहते है।

जिस प्रकार ज्वालामुखी के फूटने से आसपास की सारी वनस्पति और जीव नष्ट हो जाते है, उसी प्रकार ज्वालामुखी योग में किए गए सारे कार्य नष्ट हो जाते हैं।

1- प्रथम तिथि के समय मूलनक्षत्र
2- पंचमी तिथि के समय भरणी नक्षत्र
3- अष्टमी तिथि के समय कृतिका नक्षत्र
4- नवमी तिथि के समय रोहिणी नक्षत्र
5- दशमी तिथि के समय अश्लेषा नक्षत्र

उपरोक्त समयावधि में किए गए सारे कार्य नष्ट हो जाते हैं। बच्चा हेा तो जीवित न बचे चूड़ी पहने तो विधवा हेा फसल बोए तो नष्ट हो यानि जोभी काम करे वह सब खराब हो जाता है।

यदि उपरोक्त योगों में बालक का जन्म हो और कंुडली में अरिष्ठ भंग योग ना हेा तो बालक का क्षय अवश्य हो। पर साथ ही कंडली में वायु मारक अरिष्ट का विचार भी कर लेना चाहिए। साधारणतः ज्योतिषी इनका विचार ना करके सीधे ही अरिष्ट फल बता देते हैं जबकि बालक जीवित ही रहता है।
प्रायः देखने में आया है कि ज्वालामुखी योग में अन्य ज्षोतीषिय कारणों के रहते बालक जीवित पाया गया। कारण यही था कि ज्योतिषि ने उपरोक्त अरिष्ठभंग का विचार ही नहीं किया। अतः निष्कर्ष यह है कि बुरे ग्रह योगों के साथ तिथि नक्षत्र के कुयोग भी मिल जाएँ तब तो बड़ा अनिष्ट हो जाता है। लेकिन अकेले तिथि नक्षत्र योग पूरी तरह ध्वंस करते में समर्थ नहीं होते।

अमावस्या व चतुर्दशी तिथि में जन्म

कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी व अमावस्या में बालक का जन्म हो तो अशुभ व अरिष्टकारक माना जाता है। अमावस्या में जन्म हो तो स्त्री, पुत्र, कुल, धन आदि की हानि होती है। इसके लिए शास्त्रोक्त पूजा अवश्य करा लेनी चाहिए। इसी तरह कृष्ण चतुर्दशी कोे (तिथि योग)को 6 से भागकर लेने चाहिए। यदि कृष्ण चतुर्दशी का मान 60 घड़ी ही हो तो 10 घड़ी का एक एक भाग होता है अधिक या कम होने पर खुद विचार कर लेना चाहिए।

पहले भाग को शुभ समझा जाता है अमावस्या में पहली 10 घड़ियों मे जन्म होतो शुभ होता है। शेष सभी पाँचों विभागों में क्रमशः पिता, माता, मामा, कुल, व धन का नाश होता है।

जन्म समय के अन्य बुरे योग।

 क्षय तिथि में जन्म होने पर कुल नाशक योग होता है। अर्थात जिस तिथि का क्षय:(घटनाः) हो तथा उस घटी हुई तिथि में ही बालक का जन्म हो तो महा अशुभ होता है।

 व्यतिपात गंड, अतिगंड, वज्र, व्याघात, वैधृति, शूल, परिध, यमकंटक योग में जन्म होने पर भी महा अशुभ होता है। ये योग पंचांग में से जन्म समय पर देख लेने चाहिए।

 क्षय मास में बालक का जन्म अशुभ होता है।
 भद्रा करण में जन्म कष्ट दायक होता है।

 संक्रांति के दिन सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय जन्म लेना कुल के लिए बहुत अशुभ फल करने वाला होता है। सभी प्रकार के गंड योगों में पूजा विधान करना चाहिए। कहा गया है कि जिस तरह साँप का विष मंत्र के सुनने से विलीन हो जाता है उसी तरह गंड दोष भी शांति विधान करने से नष्ट हो जाता है।

इस प्रकार हमने अशुभ योगों का वर्णन और उनका परिहार बताया है आशा करता हूँ अपकों पसंद आएगा। क्योंकि ये सामान्यतः जन रूचि के प्रसि़द्ध विषय है।

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