ज्योतिष की वैज्ञानिकता

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ज्योतिष   की वैज्ञानिकता
ज्योतिष की वैज्ञानिकता

यहाँ हम आपको फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता पर जो विवरण दे रहे है उसे पढ़ कर आप भी ज्योतिष विद्या को सीखने को आतुर हो जाएँगे .

ज्योतिष की वैज्ञानिकता-आक्षेपक रोते



कतिपय ज्योतिषियों द्वारा की गई कुछ भविष्वाणियों की असत्यता एवं फलित योगों के स्रोतों की अनुपलब्धि के कारण कुछ लोग ज्योतिष को मिथ्या विज्ञान कह देते हैं। फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता पर आक्षेप करने वाले इस चमत्कारिक शास्त्र पर टिपण्णी करने वाले यहा दिए गय विवरण को पढ़ कर ज्योतिष की वैज्ञानिकता पर उंगली नहीं उठाएँगे हजारोवर्षो से  चले आ रहे इस शास्त्र विद्या को जानने वाले योग्य ज्योतिष शास्त्रियों द्वारा की गई भविष्वाणियाँ इस शास्त्र की वैज्ञानिकता में प्रथम प्रमाण हैं।

भविष्य वाणि की विफलता में दैवज्ञ ही दोषी है, शास्त्र नहीं।

अनेक डाक्टरों के हाथों अनेक रोगी मर चुके हैं इसका मतलब ये नहीं कि चिकित्सा शास्त्र झूठा है।़

ऋतु विभाग द्वारा की गई अनेक भविष्य वाणियाँ वर्षा न होने के कारण झूठी सि़द्ध हुई हैं। अनेक भूकम्प के धक्कों ने भूगर्भ वेत्ताओं के इस निर्धारण को झूठा सिद्ध कर दिया है कि महाराष्ट्र-स्थित कोयना बाँध भूकम्प क्षेत्र के अंतर्गत नहीं है।

कहने का अभिप्राय यह है कि सिद्धांतों के आधार पर शास्त्र की वैज्ञानिकता को झुठलाया नहीं जो सकता है।

कोई भी शास्त्र अपनी उत्पत्ति के सिद्धांतो का कारण नहीं दे सकता इसका अर्थ यह नहीं कि शास्त्र झूठा है।

फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता:

ऋतु का एकमात्र कारण सूर्य ही है। सूक्ष्मता से देखा जाए तो कक्षा वृत के विशिष्ट बिंदू पर सूर्य की स्थिति से उत्पन्न ऋतु प्रति वर्ष समान नहीं होती। उदाहरण के रूप में वसंत संपात या शरत-सम्पात पर सूर्य की स्थिति के समय प्रतिर्ष दिल्ली में तापमान समान नहीं होता।

प्रति वर्ष हिमाचल पर समान हिमपात नहीं होता। वर्षा प्रत्येक वर्ष में समान नहीं होती। तापमान में आकस्मिक परिवर्तन होते रहते है। इन प्राकृतिक घटनाओं में असमानता का एकमात्र कारण आकाशीय ग्रह-बिम्ब ही है। इस धारणा को कोई अतार्किक नहीं कह सकता।

यदि ऋतु शास्त्री चन्द्र, मंगल आदि ग्रहों से उत्पन्न ऋतु संबंधी विक्षोभ का अध्ययन करें तो उनकी ऋतु संबंधी भविष्यवाणियाँ शतप्रतिषत सत्य होंगी ऐसा मेरा अचल विश्वास है।भारतीय ज्योतिष संहिताओं में मंगल की सूर्य सापेक्ष स्थिति सूर्य चंद्र के नक्षत्र, गुरू शुक्र के उदय अस्त आदि के द्वारा ऋतु निर्णय की पद्धति का विस्तृत निर्देश भी है।

ज्योतिश शास्त्र का यह मूल सिद्धांत है कि यह संसार चक्र भगवान के एक निश्चित विधान के अनुसार चल रहा है। एवं आकाश में जो ग्रह नक्षत्र आदि हैं उनसे पृथ्वी अप्रभावित नहीं रह सकती। तो भला जीव जगत कैसे रह सकता है।

भाग्यवाद में भी कार्य कारण का सिद्धांत है। वह इस जन्म के प्रत्येक कार्य का कारण पूर्व जन्म के कार्य को मानता है।

भारतीय ज्योतिर्विदों व मुनियों ने मानव जीवन पर जन्म कालिक ग्रहों की स्थिति के प्रभाव का निर्देश इस प्रकार किया है जिसकी यर्थातता अनुभव द्वारा की जा सकती है।

जीव गर्भ के समय आकाश, तेज, भूमि, वायु, जल इन तत्वों के सूक्ष्मांश के साथ रवि की कक्षा से आत्मा, चन्द्रमंडल से मन तथा पूर्वार्जित कर्मानुसार तात्कालिक विष रश्मि वाले ग्रहों की कक्षाओं से विष, तथा अमृत रक्ष्मिवाले ग्रहों की कक्षाओं से अमृत लेकर अपनी माता के गर्भ में मनोमय आनन्दमय विज्ञानस्य वा वासनामय कोशों के साथ प्रवेश करता है।

जिसकी कुण्डली में सूर्य षडवर्ग शुद्ध होकर केशवोक्त बली होता है, उसे यह आत्मबल पूर्ण देकर यशस्वी बनाता है। यदि यह निर्बल हो तो अपनी अशुभ दशान्तर्दशाओं में मनुष्य को अस्थि ज्वर, दाद, खाज, खुजली विस्फोटक सिरदर्द, नाक से खून बहना आदि रोग देता है।

चन्द्रमा शुभ स्थान में बली शुभयुक्त या दृष्ट हो तो पूर्ण मानसिक बल, कान्ति स्वास्थ्य, विद्या राज प्रतिष्ठा देता है, और धन सम्पत्ति न होने पर भी चित्त में शान्ति बनी रहती है। अशुभ स्थान में पाप युक्त व दृश्ट केशवोक्त निर्बली हो, तो उसे अतुल सम्पत्ति होने पर भी सुख चैन नहीं होता है। वैसे ही आकस्मिक चिन्ताएं बनी रहती हैं। और जातक जीवन से घबराकर आत्मघात भी कर लेता है।…..

तो इस प्रकार हम देखते है की ” फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता कोरी कल्पना न हो कर तथ्यों पर आधारित एक सम्पूर्ण भारतीय विज्ञानं जिसे सिद्ध करने का दायित्व आज के तेजस्वी ज्योतिषियों पर ही निर्भर है .

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