ज्योतिष का परिचय

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ज्योतिष का परिचय
ज्योतिष का परिचय
भारत के पुरातन ज्ञान विज्ञानं के भंडार में ज्योतिष भी एक गोरव्पूर्ण विद्या है जिसका परिचय आपको यहाँ उपलब्ध करवाया जा रहा है.भारतीय संस्कृति के मूल ग्रन्थ वेद और उपनिषद है। इन्ही में हमें आदि विद्या ज्योतिष का परिचय मिलता है वेद से ही हमें अपने धर्म और संस्कृति का परिचय मिलता है। हमारे आदि ग्रन्थ वेद पारिवारिक, सामाजिक, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विचार के वाहक है।

वेद और ज्योतिष का परिचय

वेदों के 6 अंग कहे गए है. 1 शिक्षा 2 कल्प 3 व्याकरण 4 निरुक्त 5 छन्द 6 ज्योतिष. इन्हें षड वेदांग भी कहा गया है. यदि वेदों का अध्ययन करना है तो इन्ही 6 अंगो की जरुरत पड़ेगी .

मंत्रो के उचित उच्चारण के लिए शिक्षा यज्ञ कर्मा कांड अनुष्ठान के लिए कल्प का सहारा लेना होता है. शब्दों के ज्ञान के लिए व्याकरण जरुरी है. अर्थ ज्ञान के लिए निरुक्त जरुरी है. वैदिक छन्दो के ज्ञान हेतु छन्द का व् काल अर्थात समय के ज्ञान के लि ज्योतिष का सहारा लिया जाता है.सुबह उठने से ले कर रात को सोने तक हमें हर कदम पर समय अर्थात काल गणना की जरुरत पड़ती है. आज के समय में तो इस कमी को घड़िया पूरा कर देती है लेकिन 100-200 साल पहले तो घड़िया नहीं थी तब इस काम को ज्योतिषी ही पूरा करते थे.भारतीय समाज में ज्योतिषियों का बहुत मेहत्व हुआ करता था. शादी सुझानी हो. मकान बनवाना हो, कही आना जाना हो शिक्षा ग्रहन करनी हो या युद्ध ही करना हो और तो और 15 अगस्त 1947 को भारतीय आजादी का बिगुल भी ज्योतिषियों के कहने पर ही रात 12 बजे बजा था.

इसी कारण ज्योतिष को नेत्र कहा गया है. ज्योतिष पुरुष (ज्योतिष) का नेत्र एक ऐसा नेत्र है जिसके सहारे हौं ब्रह्मांड में स्थित ग्रहो के फलो को उनके विभिन्न राशियों नक्षत्रो में विचरण के फलो को केवल ज्योतिषी ही बता सकता सकता है.

ज्योतिष का परिचय

वैसे मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है की आखिर काल की परिभाषा क्या है? संसार के सभी पदार्थ परिवर्तन शील है इन्ही परिवर्तनों को को जाने का उपाए काल के अंतर्गत होता है. भूत भविषय , वर्तमान, वर्षा, शीत, ग्रीषम ऋतू, सुबह , शाम, समय पर पोधो में बीजन्कुरण होना ये सब ज्योतिष के ही अंतर्गत आता है.

ज्योतिष की शाखाए

जन्म कुंडली – मानव के जन्म से संबधित विवरणप्रश्न ज्योतिष – किसी समय / प्रश्न विशेष के लिए बनाई गई कुंडलीमुहूर्त ज्योतिष – शुभ मुहूर्त निकलने के लिए बनाई गई कुंडलीओषधि ज्योतिष – रोगो आधी से सम्बंधित ज्योतिष .कबाला ज्योतिष – अंको से सम्बंधित । (ank शास्त्र की शाखा )केरलिये ज्योतिष – नाम या चेहरा देख कर भविष्यवाणी करने से सम्बंधित ।उल्का ज्योतिष – मौसम से सम्बंधितन्यायिक या सांसारिक ज्योतिष -desh से sambandhit.

सिद्धांत या गणित

आदि विद्वान भास्कराचार्य ने काल की लघुतम इकाई को कहा है.काल की इन्ही लघुतम इकइयो के आधार पर सूर्य चन्द्रमा, नक्षत्रो के वक्री मार्गी शीघ्री मंद, उच्च नीच, उत्तर दक्षिण आदि गतियो का वर्णन होरा में अंक गणित एवं बीज गणित दोनों गणित विद्याओ का विवेचन किया गया हो ।इसके साथ ही अधिकमास, क्षयमास, अधिकमास, प्रभव, आदि संवत्सर नक्षत्रो का भ्रमण, चरखण्ड, करन आदि का वर्णन हो। इस प्रकार से ज्योतिष में गणित शास्त्र का प्रतिपादन हुआ है।

संहिता स्कंध

ज्योतिष में का संहिता स्कंध भी बड़े महत्व का है। इसके अंतर्गत समष्टि का अध्ययन होता है। संहिता भाग सार्वभौम है। और होरा व्यक्ति विषयक है। संहिता स्कंध में सिद्धांत और फलित दोनों का मिश्रण है। इसके ग्रंथकारो में (varahi संहिता ) वराहमिहिराचार्ये , गर्ग, पराशर, असित, देवल, कश्यप, भृगु, आदि हुए है।
ज्योतिष का परिचय
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होरा स्कंध

मानव जीवन के सुख दुःख इष्ट अनिष्ट आदि सभी शुभाशुभ विषयो का वर्णन करने वाला होरा विभाग है। इसमें ईष्टकाल के आधार पर कुंडली का वर्णन और निर्माण सम्मिलित है। पुर्जन्म वर्तमान जन्म तथा भविष्य के फलो की विधि का निरूपण है।वराह मिहिर ने कहा है की मिर्त्यु के समय जन्मलग्न से केंद्र या छठे स्थान में उच्च का गुरु हो या मीन राशि का गुरु हो और सभी ग्रह निर्बल हो तो जातक को मोक्ष प्राप्ति होती है।

विंशोत्तरीदशा-ज्योतिष का परिचय

विंशोत्तरी दशा 120 वर्षो की होती है । फलादेश के लिए पराशर जी ने महादशा अन्तर्दशा का विधान किया। उनका कहना था की सब ग्रह अपनी दशा आने पर ही तदनुसार शुभ व् अशुभ फल देते है। जन्म समय किस ग्रह की दशा चल रही थी इसका निर्णय चंद्र स्थित नक्षत्र से होता है। इसके अलावा ाष्टक वर्ग गोचर, प्रश्न कुंडली से भी फल का विचार होता है।दाहिने स्वर को पिंगला , बाये स्वर को चंद्र स्वर कहते है। कभी कभी दोनों से भी सामान स्वर निकलता है इसे सुषुम्ना नाड़ी स्वर कहते है. यही स्वरविज्ञान ज्योतिष है।

पंचांग परम्परा

तिथि वर नक्षत्र कारन योग पांच अंग इसमें निरूपित है। पंचांगों में निर्माण की अत्यंत लम्बी परम्परा है। कहा गया है की जो इनका ठीक तरह से अध्ययन कर ले तो वह देवज्ञ यानि देवताओ के सामान ज्ञानी हो जाता है। पंचांगों का निर्माण अलग – अलग अक्षांश देशान्तरों के आधार पर होता है।

सामुद्रिक शास्त्र यानि हस्तरेखा विज्ञानं

हस्त रेखा पठान शास्त्र भी भारतीय ज्योतिष परम्परा का एक अभिन्न अंग है। ये बिना कुंडली के हाथ या माथे की रेखाओ के आधार पर भाग्ये फल बताने की परम् विद्या है. प्राचीन काल में हस्तरेखा विज्ञानं भारत में बड़ी उन्नत दशा में था। किन्तु वर्तमान में इसका ह्रास हो गया है।

स्वरविज्ञान-ज्योतिष का परिचय

>मनुष्य में स्वाभाविक रूप से सांस लेने के दो छिद्र है वे है नाक से। जब एक से वायु प्रवाह बंद हो जाता है तो दूसरा शुरू हो जाता है। इस प्रकार वायु संचार की स्वेत क्रिया को स्वरविज्ञान कहते है। स्वर ही श्वास है। मनुष्य 24 घंटो में 21600 बार श्वास लेता और छोड़ता है। स्वर सूर्योदय के साथ शुरू हो जाता है। हर घंटे स्वर बदल जाता है।

पृथ्वी के 5 तत्व है । पृथ्वी तत्व 20 मिनट , जल तत्व 16 मिनट , अग्नि तत्वे 12 मिनट, वायु तत्व 8 मिनट, और आकाश तत्वे 4 मिनट, ये तत्व नियम हर घंटे की इन मिनट में सक्रिय रहते है। प्रत्येक दाया बाया स्वर स्वाभाविक गति से एक घंटे में 900 बार श्वास संचार क्रम होता है। और ये पांचो तत्व 60 घड़ी में 12 बार बदलते है।

शकुन शास्त्र

ज्योतिष में शकुन का भी बहुत महत्व है। शकुन जाग्रत और सवप्न दोनों में होते है ये हमें सावधान करते है की कोन-सा काम करना कोन-सा नहीं । ये पशु पक्षियों मुष्यों द्वारा इंगित होते है। शकुन शुभ अशुभ दोनों प्रकार के होते है। जैसे – यात्रा के समय सवत्सा गाय , सौभाग्यवती स्त्री, पानी से भरा घड़ा दिखना, आदि शुभ शकुन है।इसके अलावा सहरीर पर छिपकली का गिरना, गिरगिट का छूना शुबहा शुभ फल होते है। दाहिने आगे पर गिरे तो शुभ और बाए पर गिरे तो अशुभ मन जाता है। पशु पक्षियों से भी अशुभ की सूचना मिलती है। बिल्ली दवार रास्ता कटे जाने पर, कुत्ते के कान फड़फड़ाने पर, कुत्ते, गाय और सियार के रोने पर, गिद्ध के माकन पर बढ़ने पर कव्वे के शोर मचने पर, अशुभ संकेत माने जाते है। पुरुष का दाया और स्त्री का बाया अंग फड़कना शुभ होता है। इसके विपरीत अशुभ।

रत्न विज्ञानं-ज्योतिष का परिचय

ज्योतिष में रत्नो की विशेष महिमा मानी गई है। रत्नो की चमत्कारी शक्ति का सम्बन्ध ग्रहो से है। अनुभव से ये पता चलता है की ग्रह और रत्नो में अनोखा गुणसाम्य उपस्थित है।सूर्ये के लिए = माणिक्यचंद्र के लिए =मंगल के लिएबुध के लिए =गुरु की लिए =शुक्र के लिए =शनि के लिए = नीलमराहु के लिए = गोमेदकेतु के लिए = लहसुनिआ गन समय रखते है जातक की जन्म कालीन ग्रहो की स्थिति के आधार पर शुभाशुभ ग्रहो का निर्धारण किया जाता है। जो रत्न एक व्यक्ति के लिए अनुकूल हो वही दुसरे के लिए प्रतिकूल भी हो सकता है।

ज्योतिष और आयुर्वेद-ज्योतिष का परिचय

प्राचीन भारतीयः संस्कृति में जितना प्रभाव ऋग्वेद का है उतना ही आयुर्वेद का भी है। जन्म कुंडली के आधार पर ये ज्ञात हो सकता हे की जातक में किन तत्वों की कमी है। ज्योतिष ज्ञान के बल पर ज्योतिषी पहले ही भविष्यवाणी कर देता है की जातक किन रोगो से प्रभावित होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह निम्न शारीरिक अवयवों पर शासन करते हेसूर्ये – अस्थि, जैव -श्वसनतंत्र,2-चन्द्रमा-rakt , जल, अंतस्रावी ग्रंथिया– यकृत , रक्त कनिकाय , पाचन तंत्र4 बुध तंत्रिका तंत्र, त्वचा,guru – नाड़ी तंत्र, स्मृति, बुद्धि6-शुक्र – वीर्य, राज, कफ,गुप्तांग,7- शनि – केंद्रीय नाड़ी8- राहु केतु – शरीर के अंदर आकाश एवं अपानवायु ।औषधि मिश्रित जल से स्नानं करने से ग्रह दोष निवारण होता है। शरीर के रोगो की जानकारी प्राय जातक की कुंडली से होती है। इसके अलावा हाथ की रेखाएं , नाख़ून, हाथ के पर्वत, के अध्ययन से भी रोग का ज्ञान हो जाता है . भारत में पहले ये आवश्यक था की वैद्य ज्योतिषी भी हो।

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भारतीय ऋषि मुनियो की तरह आज के सामान न तो वेधशालाय थी न आधुनिक सूक्षम उपकरण लेकिन फिर भी वे अपने अंतर ज्ञान के बल पर मौसम का पूर्व अनुमान लगा लेते थे। यद्यपि अपने वैदिक पुराणों ,संहिताओं, स्मृतियों में इस विज्ञानं का उल्लेख मिलता है। आचार्य वराहमिहिर का इसमें विशेष योगदान रहा है। वृहित संहिता में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। संहिता ग्रंथो में ऐसे मंत्रो का विधान है जिनके जप से वर्षा हो जाया करती थी ।सूर्य जब आर्द्र नक्षत्र में प्रवेश करता है। तब ही औपचारिक रूप से वर्ष ऋतुका आरम्भ माना जाता है। भारतीय पंचांग कार प्रति वर्ष आर्द्र में सूर्ये के प्रवेश की कुंडली बनाकर आगामी वर्ष की वर्षा की भविष्वाणी करते है। गर्ग , पराशर आदि ऋषियों के समय से ही यह विज्ञान गुरु शिष्य परम्परा में रहा है। अनेक ज्योतिषियों दवारा इसे उपलब्ध करवाया जाता रहा है।

कर्म फल से अशुभ का निवारण।

मनुष्य के सुख दुःख का कारन कुंडली में उपस्थित ग्रह नक्षत्र न हो कर उसके कर्म होते है ग्रह नक्षत्र तो केवल इस बात की सूचना देते है की पूर्व जन्मो में किये गए कर्मो के आधार पर तुम्हारा अच्छा या बुरा समय कब आने वाला है। ये तो केवल घटनाओ के सूचक मात्र है।तो इस प्रकार से हमने अपनी इस पोस्ट में ज्योतिष का परिचय पूर्ण रूप से दे दिया है।
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