ज्योतिषीय के शब्दों अर्थ और भावार्थ

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ज्योतिषीय शब्दों के अर्थ और भावार्थ
ज्योतिषीय शब्दों के अर्थ और भावार्थ

ज्योतिषीय शब्दों के अर्थ और भावार्थ से मेरा तात्पर्य ये है जिन ज्योतिषीय शब्दों को आपने सुना उन्हें समझना भी चाहिए.

ज्योतिष एक कठिन और भावनात्मक विषय है और उतना ही कठिन और भावनात्मक है ज्योतिषीय

के शब्दों अर्थ और भावार्थ को समझाना क्योकी जितना ही हम इस विषय में प्रवेश करते जाते है हमें उतने ही कठिन विषय और शब्दों से पाला पढता है. देखोगे कि कोन से शब्द है और क्या उनके अर्थ है

पीड़ित-

जब कोइ ग्रह अपने भाव से 6-8-12वें भाव में या अस्त, या नीच राशि में होता है तो वह पीड़ित कहलाता है।

केन्द्र-

किसी भी भाव से प्रथम चतुर्थ सप्तम और दशम भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं ये स्थिति याँ 0 डि, 90 डि, 180 डि, 270 डि पर निर्मित होती है।
केन्द्रीय- जब कोई ग्रह एक किसी दूसरे ग्रह से केन्द्र स्थान में स्थित हो तो यह स्थिति केंद्रिय स्थिति कहलाती है। 1-4-7-10 Bhaw

संगति-

संगति का तात्पर्य ग्रह की गति से है जो दूसरे ग्रह की ओर गति करते हुए उससे दृष्टि संबंध बनाए।

तीव्र गति से चलने वाला ग्रह मंद गति से चलने वाले ग्रह के साथ संगति करता है जो कि युति बद्ध होने के बाद उस धीमी गति के ग्रह से अलग होकर उससे आगे निकल जाता है और यह कहा जाता है कि संगति की अपेक्षा अलग होकर उससे आगे निकल जाना एक शक्तिशाली संबंध है।

उदाहरण के लिये तुला राशि के 10 अंश पर मंगल स्थित हो तो 7 अंश पर बुध हेा तो यह संगति की दृष्टि कहलाएगी। और जब बुध तुला राशि के 13 अंश पर स्थित हो तो यह स्थिति अलग होने की दृष्टि कहलाएगी। जो कि अधिक शक्तिशाली होगी।

यह ठीक उसी प्रकार है जब कोई ग्रह वक्रगति वाले ग्रह से अधिक तेज गति से चलता हो जिससे कि वक्र गति वाला ग्रह दृष्टि संबंध बनाता हो।

निष्फल राशियाँ

मिथुन, कन्या , सिंह- ये राशियाँ निष्फल कहलाती हैं। यदि पंचम भाव का भावेश इन राशियों में हो तो संतान को प्रभावित करता है।

शुभ ग्रह-

लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम ये केंद्र स्थान शुभ होते हैं। इसके अलावा द्वितीय पंचम नवम और एकादश भी शुभ स्थान होते हैं। परन्तु केंद्र और कंेद्रस्थ ग्रह विशेष प्रभावशाली होते है।

द्विशरीरी राशियाँ-

मिथुन, धनु, और मीन राशियाँ द्विशरीरी कहलाती हैं। भ्
पणफर भाव- तृतीय, षष्ठ, नवम द्वादश भाव पणफर कहलाते हैं। इन्हीं भावों के ग्रह यदि इन्हीं भावों में हों तो विदेश यात्रा करवाते हैं।

चर राशियाँ-

मेष, कर्क, तुला, और मकर चर राशियाँ कहलाती हैं।
अस्त- सूर्य से 8 अंश की दूरी तक ग्रह अस्त कहलाता है। बुध और शुक्र सूर्य के अत्यंत नजदीक होते हैं और वे सूर्य किरणों से सुरक्षित होते हैं। उनका अस्त होना सही मायने में पीड़ित होना नहीं है।
द्विस्वभाव राशियाँ- मिथुन, कन्या, धनु, एवं मीन राशियाँ द्विस्वभाव राशियाँ कहलाती हैं।

कस्प (भाव)

जन्म कुण्डली के बारह भावों में से किसी भी भाव का प्रारंभिक बिंदू कस्प कहलाता है।

क्रांति-

भूमध्य रेखा के उत्तर में या दक्षिण में किसी ग्रह की दूरी (अक्षांशों में)

पृथ्वी तत्व राशियाँ-

वृषभ, कन्या और मकर राशियाँ पृथ्वी तत्व राशियाँ कहलाती हैं लग्न भाव का स्वामी यदि इन राशियों में हो तो जातक दृढ़ संकल्पवान होता है।

पंचांग- समय विशेष के लिए ग्रहों की स्थिति आदि विवरणों की जानकारी देने वाली पुस्तक पंचांग कहलाती है। सभी ज्योतीषिय गणनाएं इसी के आधार पर की जाती हैं।

पतन-

किसी भाव का स्वामी यदि नीच राशि में या अस्त हो तो उसे पतन शाील कहते हैं।

स्त्रैण राशियाँ-

वृषभ, कर्क, वृश्चिक, मकर ओर मीन राशियाँ स्त्रैण कहलाती हैं। लग्न भाव के उपाधिपति का इन राशियों में स्थित होना जातक में स्त्रियोचित गुण उत्पन्न करता है। और ऐसे जातक समझौते के लिए स्वयं ही पहल करते हैं।

अग्नितत्व राशियाँ-

वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशियाँ स्थिर कहलाती हैं। लग्न भाव का अधिपति का इन राशियों में स्थित होना जातक कोे व्यवहारिक बनाता है। जन्म स्थान पर ही भाग्योदय होता है। और ऐसे जातक को परिवर्तन पसंद नहीं होता ।

फलदायी राशियाँ –

कर्क, वृश्चिक और मीन राशियाँ फलदायी राशियाँ फलदायी कहलाती हैें। किसी भाव का भावाधिपति यदि इन राशियों में पड़े तो संबंधित भावों के फलों में भरपूर वृद्धि होती है।

भाव-

किसी भाव का प्रारम्भिक बिंदू से लेकर उसके अगले भाव के प्राम्भिक बिन्दु के बीच के क्षेत्र को भाव कहते हैं।

स्वामी-

किसी भाव में पड़ने वाले राशि पति कों भाव का स्वामी कहते हैं। माना यदि मेष में 20 अंश तक द्वितीय भाव है तो भावाधि पति मंगल कहलाएगा।
अशुभ भाव-छठा भाव, आठवां भाव व बारहवां भाव अशुभ भाव कहलाते हैं।

वृत्तांश (प्रभावक्षेत्र)

ग्रहों के वृत्तांश की हद मान्य की गई है ंजैसे सूर्य के दोनों और 8 अंश और अन्य सभी ग्रहों के लिए 3 अंश। यदि कोई ग्रह सूर्य से 7 अंश पर स्थित हो तो उसे सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में स्थित कहा जाएगा।

पूर्वी-

दशम, एकादश, द्वादश, लग्न, द्वितीय और तृतीय भावों को पूर्वी कहा जाता है। लग्न का स्वामी इन भावों में स्थित होकर जातक की सफलता को दर्शाता है। जातक महत्त्वाकांशी होता है।

समानांतर-

उत्तर या दक्षिण क्राँति में भूमध्य रेक्षा से समान दूरी केा समानांतर कहते हैं।

पृथकता-

युति के पश्चात ग्रह एक दूसरे से दूर हेा जाते हैं जिसे पृथकता कहा जाता है। और ये दृष्टि शक्तिद्यशाली होती हैं
दीर्घ विषुवांश राशियाँ- कर्क, कंुभ, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु।

लघुविषुवांश की राशियाँ- मकर, कुंभ, मीन, मेष, वुषभ और मिथुन । हांलाकि इन्हें दीर्घ और लघु कहा जाता हैं पर भुमध्य रेखा पर और उससे निकट इनमें असमानता नहीं होती है दीर्घ विषुवांश की राशियाँ दक्षिणी गोलार्ध में लघु लघुविषुवांश की राशियाँ होती हैं। इसी प्रकार लघुविषुवांश की राशियाँ दक्षिणी गोलार्ध में दीर्घ विषुवांश की राशियाँ होती हैं। उत्तरी अक्षांशो का लगन दक्षिणी अंक्षांशों में सप्तम भाव होगा।

अयन राशियाँ-

कर्क राशि उत्तरायण राशि है और मकर राशि दक्षिणायन राशि है

जलीय राशि-

कर्क, वृश्चिक, ओर मीन राशियाँ जलीय राशियाँ कहलाती हैं

शून्य पथ-

जब कोइ ग्रह किसी राशि में गोचर में अन्य किसी ग्रह से दृष्टि संबंध नहीं बनाता है तो उसे शून्य पथ कहते है।

अन्योन्याश्रय-

एक दूसरे की राशि में होना। यथा मेष में सूर्य व सिंह में मंगल का होना। इसे क्षेत्र सम्बन्ध या स्थान सम्बन्ध भी कहते है।

अयुक्त-

साथ न होना या सम्बन्धी न हेाना।

इतर-

दूसरा। केन्द्र व त्रिकोण के अतिरिक्त दूसरा।
उडडुदाय-

उड्ड अर्थात् नक्षत्र पर आधारित दाय-दशा।

कारक ग्रह-

शुभ फल देने वाले ग्रह।
जीव- ब्रहस्पति ग्रह का नाम

तमोग्रह-

भौतिक पिंड रहित ग्रह। जैसे राहू व केतू।

त्रिकोण-

कुंडली में 1-5-9 स्थान।

त्रिषडाय-

कुंडली में 3-6-11 भाव।
दोष 3 6 11 स्थानांे का स्वामी होना अथवा शुभग्रह बृहस्पति,शुक्र, पापसंगरहित बुध व वर्धमान चंद्रमा की राशि में केंद्र में पड़ना। (केंद्राधिपत्य दोष)

परसाहचर्य-

साथ स्थित दूसरे ग्रह का प्रभाव ले लेना।

पापी-

स्वाभाविक पापग्रह शनि, मंगल, राहू, केतू, सूर्य। पाप स्थानों के स्वामी ग्रह। अष्टमेश सर्वाधिक पापी।

पापकृत-

पापफलदायक, स्थिति चेष्टा आदि से पापी।

पिष्टपेशन-

एक बार कहि बात को दोहराना।

पाप-

स्वाभाविक पापी या दोषयुक्त, जैसे निचाअस्तंगतशत्रुक्षेत्रादि में होना।

प्रसक्त-

संबंध रखना। अप्रसक्त – संबंध न रखना।
फलानुगुण्य-

शुभ पाप मिश्रित। दो विरोधी फलों का समन्वय करनार्। शुभ व पाप फलदायक ग्रहों के फल का इकट्ठा होना।

भावसाहचर्य-

साथ में बैठकर, उसी भाव के शुभाशुभ प्रभाव को ले लेना।

भावेशसाहचर्य-

साथ में स्थित ग्रह की अपनी राशियाँ जिन भावों में हों उन भावों के शुभाशुभ प्रभाव को ले लेना।

भुक्ति-

अंतर्दशा। महादशा में आने वाली भीतरी दशा। महादशा का स्वामी महादशेश। अंतर्दशा का स्वामी अंतर्दशेश कहलाता है।

मारक स्थान-

लग्न से 2-7 भाव। सप्तम भाव का स्वामी बली मारक होता है।

मारकेश-

लग्न से द्वितीय व सप्तम भावों के स्वामी।

मारकग्रह-

मृत्यु देने वाला ग्रह।

योग-

शुभ फल देने वाली ग्रह -स्थितियां

योगफल-

अत्यंत शुभ फल। योगज-योग से उत्पन्न शुभ फल।

योगकारक-

अत्यंन्त शुभ फल देने वाला ग्रह।केंद्रेशों व त्रिकोणेशों का परस्पर संबंध योग कारक होता है।

रन्ध्र-

लग्न से अष्ठम स्थान।

राजयोग-

मान, सम्मान,, धन, पदवी, यश, देने वाली ग्रह स्थितियां। योगों में राजा अर्थात श्रेष्ठ योग।

व्यत्यय-

परस्पर विपरीतता। उल्टा पुल्टा। यथा- नवम का स्वामी दशम में व दशम का स्वामी नवम में हो। क्षेत्र संबंध का पर्यायवाचक ।

सधम्र्य-

समानता। समान शील स्वभाव होना। शुभ ग्रहों में परस्पर साधम्र्य होता है। इसी प्रकार एक पापी ग्रह दूसरे पापी ग्रह का सधर्मी होता है।

सम-

न शुभ न अशुभ। द्वितीय व द्वादश स्थान सम स्थान और इनके स्वामी ग्रह समग्रह।

सम्बन्ध-

बन्ध या सम्बंध। ग्रहों का परस्पर चतुर्विध संबंध।

संयुत-

एक साथ होना। कहीं कहीं पर चार संबंधों का वाचक है। पर्यावाचक संयुक, संयुक्त सहावस्थित।

सहावस्थान-

साथ साथ एक ही स्थान में होंना। चार संबंधों में सबसे निर्बल संबंध।

सुन्दोपसुन्द न्याय-

जितने शुभ योग उतने ही अशुभ योग का होना फल का शून्य हो जाना।

निसर्गबली- प्राकृतिक रूप से बली।

स्फुट- भाव स्पष्ट, ग्रह स्पष्ट।

संक्रमण काल – गोचर

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