ग्रहो का परिचय

ग्रहो का परिचय
ग्रहो का परिचय
ग्रहो का परिचय

भारतीय प्रायद्वीप में प्राचीन काल से अनेक प्रकार की धारणाए प्रचलित है उनमे से नवग्रहों की उपासना भी एक है, तो आइये इन ग्रहो का परिचय ही जान ले.

ग्रहो का परिचय के अंतर्गत हम जानेंगे की आखिर इन नवग्रहों का मानव जीवन में क्या प्रभाव है. प्रचलित है की “यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे” अर्थात जो कुछ इस शरीर में है वही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि उतनी ही नहीं है जितनी को हम देखते है.

प्रत्येक वस्तु का एक एक अधिष्ठात्री देवता होता है. ये बात अनुभव सिद्ध है. शरीर नेत्र है जिनके कारण हम दुनिया देखते है लेकिंन इन नेत्रों को दृष्टि देने वाला सूर्य ग्रह है. यह नेत्रों का अधिदेव स्वरुप है. नेत्र के द्वारा दुनिया को देखना सूर्य के बिना संभव नहीं.

जैसे सूर्य का साक्षात् सम्बन्ध पृथिवी , समुद्र,, चन्द्रम, विद्युत्, गर्मी आदि से सबंध है वैसे ही उन पदार्थो से भी सम्बन्ध है जिनसे मानव ही नहीं किसी भी जीव शरीर बना है. हर शरीर की उत्पत्ति के समय चाहे वह गर्भ में ही हो या भूमि पर आया हो का सम्बन्ध प्रकृति द्वारा निर्मित तत्वों के कारन हर शरीर से है जिनसे वह बना है. आइये ज्योतिष जाने

अत इस प्रकार भला क्यों न मानव व् अन्य जीवो पर ग्रहो का प्रभाव पड़ेगा. मनुष्य के जीवन की हर घटना का सम्बन्ध इस प्रकार ग्रहो से हो कर आता है. सम्बन्धित प्रभाव न केवल मनुष्यों पर बल्कि देशो पर भी होता है. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण कोविद -19 है जो की प्रकृति के किसी न किसी उपादान के कारन हर देश में पहुँच गया. और काल बन कर फैला हुआ है.

कोविद-19
कोविद-19

संसार में अनेक घटना प्रतिदिन घटती है. उनका सम्बन्ध जीवन के प्रारब्ध व् पुरुषार्थ से समष्टि के मालिक ईश्वर की इच्छा, और प्रकृति से बताया जाता है. इन घटनाओं के साथ ग्रहो के आकर्ष का क्या सम्बन्ध है इन्ही सब तत्वों का विवेचन हम करेंगे आगे ग्रहो का परिचय में.

प्राचीन काल से ही वैदिक मर्यादाओ के चलते ग्रहो के प्रति पूजा पाठक विधान भारत में रहा है.आज भी इस प्रथा का पालन जहा होता है. वहां हर शांति कर्म में पहले नव ग्रहो की पूजा होती है. ध्यान रहे की इस पूजा का सम्बन्ध उन ग्रहो के देवताओ से भी है.

आत्मा रवि शीत करोमंस्तु सत्वं कुजो भाषणम मव्ज सूनु| वाचापतिग्यांसुखे मदश्च शुक्रो भावेदार्कासुतास्त्स्तु दुखम ||

अर्थ- सूर्य शरीर, चंद्रमा मन, मंगल बल,बुध वाणी ,व्ब्रहस्पति ज्ञान और सुख शुक्र काम और शनि दुःख ऐसा ग्रेह मय हमारा शरीर है.

उपरोक्त श्लोक से स्पष्ट है की सूर्य,चंद्रमा, मंगल, बुध,,गुरु, शुक्र,शनि, राहू , केतु ग्रह पृथ्वी पर जन्म लेने वाले मनुष्य को भोतिक, व् मानसिक रूप से प्रभावित करते है.इस प्रकार भारतिय ज्योतिष में नव ग्रहो का अध्ययन किया जाता है.

सूर्य SUN

सूर्य
सूर्य

सूर्य ग्रहो के राजा है. इनका कश्यप गोत्र एक लिंग देश के स्वामी है. सूर्य समस्त सोर मंडल का केंद्र बिंदी है अत: इसीलिए इसे ग्रहो का पिता खा जाता है. नक्षत्रो के अध्ययन में सूर्य सबसे बड़ा है. सभी नक्षत्रो को यदि इकठ्ठा करले तो भी सूर्य उनसे 750 गुना बड़ा है.सत्व गुण प्रधान सूर्य शुष्क व् नर संज्ञक है. स्थिर स्वभाव सूर्य अग्नि तेज से युक्त है.

सूर्य सिंह राशि में स्वग्रही,मेष में 10 अंश पर उंचच, तुला मे 10 अंश पर नीच हो जाता है. यानि 25 अप्रैल को उच्च और 25 ओक्टुबर को लगभग नीच हो जाता है. धातुओ में स्वर्ण पर अधिकार ,पित्तदोष प्रधान, अल्प केश , व् चतुष्पद पशुओ का स्वामी होता है. शाशक का प्रिय , पहाड़ो व् वनों की यात्रा करने वाला , लाल रंग, देवी बुद्धि या गुण सूर्य के बताए जाते है.

शारीरिक गठन

यदि लग्न में सिंह या मेष राशि हो तो सूर्य से प्रभावी व्यक्ति सुन्दर, बलिष्ठ ,शहद के सामान आंखे और बड़े सर वाला होता है.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

सूर्य यदि बलवान नहीं है, (तुला में) तो रोग कारक होने पर आँखों व् हृदय सम्बन्धी रोगों को फलीभूत करता है. इस पर यदि शनि की दृष्टि होतो ये रक्त चाप में कमी यदि गुरु का दुष्प्रभाव होतो उच्च रक्त चाप,और मंगल का दुश्प्रभाव हो तो रक्त विकार होने की आशंका रहती है. पित्त विकार सूर्य का मुख रोग है.

सामान्य चरित्र

जातक की कुंडली में यदि सूर्य बलवान होतो उसे सत्ता और राजसुख के ऐश्वर्य दिलवाता है.प्रथम व् दशम भाव में सूर्य निश्चित रूप से राजसुख दिलवाता है. वर्तमान काल में ऐसे सूर्य वाले को राजसुख जरुर मिलता है. लेकिन ये सुख किस स्टार का होगा ये बात कुंडली के अन्य ग्रहो का सूर्य पर प्रभाव देख कर ही जाना जा सकता है. राज सत्ता धरी मंत्री भी होता है. चपरासी भी.

स्वस्थ सूर्य आत्मविश्वास ,इश्वर के प्रति आस्था ,मवियता के गुण प्रदान करता है. लेकिन कठिन परिश्रम के बाद कम आय का संकेतक है.

रत्न

सूर्य का रत्न माणिक (रूबी) है. सूर्य प्रभावित व्यक्ति को रविवार को माणिक जड़ित अंगूठी मध्यमा अंगुली में धारण करनी चाहिए.

चंद्रमा

moon
moon

ग्रहो का परिचय के अंतर्गत अब हम बात करेंगे चन्द्रमा की. चंद्रमा का गोत्र अग्नि होत्री है.ये अमृत का स्वामी है. दो हाथो वाले चंद्रमा के एक हाथ वर मुद्रा में है (आशीर्वाद में ) और दूसरा हाथ गदा युक्त है. श्वेत शरीर पर श्वेत माला मोती की धारण किये हुए है. इसके देवता उमादेवी है.प्रत्यक्ष देवता जल है. ग्रहो का परिचय

चन्द्रम पृथ्वी के समीप स्थित पृथिवी के मुकाबले सबसे तेज गति का ग्रह है. हर 27 दिनों में चन्द्रमाँ 12 राशियों की परिक्रम पूर्ण कर लेता है.

चंद्रमा का प्रभाव जीवन पर सबसे जयदो पड़ता है. चन्द्रमाँ जातक की मनोदशा को इंगित करता है यह कुंडली में जिस घर में होता है. उसी भाव के कार्यो के लिए रूचि उत्पन्न कर देता है. चन्द्रमा आर्द्र, भूमि चारी , तपस्वी, जल चारी , सत्वगुण प्रदान करने वाला , काफ प्रकृति का होता है. रजत (चांदी) का स्वामी,कर्क राशि का स्वामी, वृष राशि में उच्च् और वृश्चिक राशि में नीच होता है.

शारीरिक गठन

इसका गोर वर्ण, स्थूल चकोर शरीर,पुष्ट वक्ष स्थल, उभरे हुए पेट वाला होता है

सामान्य चरित्र

इसका चरित्र परिवर्तन शील है. शुभ या अशुभ अन्य ग्रहो की दृष्टि और साथ का इस पर विशेष प्रभाव कुंडली में पड़ता है. ये मिलन सार जन प्रिय व्यक्तित्व देता है. अन्य ग्रहो के अनुकूल होने पर राजनितिक सफलता दिलाता है. सामान्यत चंद्रमा द्रव तत्वों का भी परिचायक है. अत यह जातक को तेल,दूध,इत्र ,तरल पदार्थो से आय के अवसर उपलब्ध करवाता है. ग्रहो का परिचय

कल्पना शीलता के कारन चन्द्रम व्यक्ति को गायक, संगीतकार,लेखक, वैज्ञानिक होने की मानसिकता प्रदान करता है. अशुभ बुध की दृष्टि इस पर हो तो जातक झूट बोलता है. पूर्ण चन्द्रम पर शुक्र के साथ या दृष्टि के कारन व्यक्ति कलाकार संगीतग्य आदी कला क्षेत्र का माहिर बनता है. अशुभ शुक्र का साथ जातक को कामुकता प्रदान करता है. इसी प्रकार से शुभ अशुब मंगल के प्रभाव से जातक साहसी या कायर झगडालू बनता है.

स्त्रियों में चन्द्र मंगल की अशुभ युक्ति मासिक गड़बड़ी को बनाए रखती है. मासिक धर्म कष्ट पूर्ण होता है.गुरु चन्द्र की दृष्टि अत्यंत उत्तम होती है. इसके कारन मन लगनशील , धेर्यवान कल्पना शील आशावादी बनता है, लेकिन यदि दृष्टि शुभ न होतो चंचल, और खर्चीला बनता है. चन्द्र पर शनि की दृष्टि व्यक्ति को धेर्यवान बनाती है.यदि शनि की दृष्टि ख़राब हो तो व्यक्ति मिर्गी रोगी,मानसिक रोगी तक बनाती है.

रत्न

मोती चन्द्र का प्रिय रत्न है. अत चन्द्र पीड़ित व्यक्ति को मोती जड़ित अंगूठी सोमवार को दाहिने हाथ की कनिष्ठ अंगुली में धारण करनी चाहिए.

मंगल

mash planet
mash planet

सूर्य के लिए पृथ्वी के पथ से बाहर की और मंगल का परिक्रमा स्थित है. इस प्रकार से मंगल पृथ्वी का पडोसी ग्रह है. जिस पर पर मगल सूर्य के परिक्रमा करता है वह पृथ्वी से बाहर की और स्थित है. मंगल सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करने में 687 दिनों का समय लेता है. इस प्रकार मंगल 12 राशियों का परिभ्रमण 687 दिनों में पूर्ण करता है. ग्रहो का परिचय

मंगल औसतन एक राशि में 57 दिनों तक रहता है.पृथ्वी की तरह मंगल भी अपनी धुरी पर घूमता है.और यह चक्र 24 घंटे 37 मिन23 सेकेण्ड का होता है. इस प्रकार से मंगल में भी लगभग पृथ्वी के सामान ही दिनरात होते है. लेकिन इनका समय कुछ अधिक होता है. लाल रंग का मंगल रात्रि में आकाश स्वच्छ होने पर स्पष्ट दिखाई देता है. ये एक शुष्क और पुरुष ग्रह है.

मंगल मेष और वृश्चिक दोनों राशियों का स्वामी है. कर्क राशि में नीच व् मकर राशि में उच्च का होता है. मंगल उर्जा , शक्ति , व् शोर्य का प्रतीक ग्रेह है. इस प्रकार से यदि मंगल शुभ स्थिति में हो तथाकथित जातक को देता है. यदि कुंडली में इसकी स्थिति ख़राब हो तो इसके विपरीत अवगुणों को देता है. भाइयो को प्रतीक मंगल की प्रकृति क्रूर होती है. ग्रहो का परिचय

ज्योतिषीय आधार पर मंगल से शारीरिक मानसिक शक्ति,पृथ्वी से प्राप्त होने वाले खनिज पदार्थ,अग्नि, स्वर्ण, रति, उत्साह, पाप कर्म , घाव , चोट , रक्त, सेनापति, पुलिसे आदि का विचार किया जाता है.

शारीरिक गठन

गोरापन लिए हुए गुलाबी रंग होता है. स्वास्थ्य मस्पेशियो वाला सुन्दर शारीर होता है. गोल आंखे पतली कमर ,मजबूत अस्थिय होती है.

स्वास्थ्य स्थिति

मंगल के कुंडली में कमजोर या अशुभ स्थिति में होने पर दुर्घटनाओ और रक्त स्राव का कारन बनता है. 12 भाव में होतो जेल या अस्पताल में पीड़ा जनित बंधन का कारन बनता है. स्त्री के पंचम भाव में मंगल अशुभ स्थिति में प्रसव समय में रक्त स्राव करता है.

सामान्य चरित्र,

क्रोधपूर्ण मनस्थिति, जल्द्बाज,सेना में , या पुलिसे में मुखिया होता है. यदि मंगल शुभ स्थिति में हो तो ठीक इसके शुभ आचरण वाला होता है. अत मंगल पर कोई भी निर्णय कुंडली ठीक प्रकार से विश्लेषण के बाद ही करना उचित होगा.

रत्न

मंगल का विशेष रत्न मूंगा है. कुंडली में मंगल ख़राब स्थिति में हो तो मंगल वर के दिन दाय हाथ की तीसरी अंगुली में मूंगा जड़ित अंगूठी धारण करनी चाहिए.

बुध ग्रह

बुध ग्रह
बुध ग्रह

सूर्य के सबसे निकट वर्ती ग्रहो में बुध सबसे निकट है. इसके बाद शुक्र फिर पृथ्वी का स्थान आता है.बुध सूर्य से 28 अंश के कोणीय अंतर पर है. इसी कारन हर कुंडली में बुध सूर्य से आगे -पीछे या साथ साथ चलता है.

बुध बुद्धि का करक ग्रह इसके शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति डाक्टर , इंजिनीअर, गणितग्य,विज्ञानिक बनता है. बुध परिवर्तन शील मनोवृत्ति का ग्रह है ये शुभ ग्रेह के साथ शुभ प्रभाव व् आशुभ के साथ अशुभ प्रभव उत्पन्न करता है.

बुध का रंग हरी दूर्वा के सामान हरा चमकीला रंग होता है. इसमें वात पित्त, कफ त्रिदोषो का सम्मिश्रण होता है. यह राग कारक भी और स्नायुमंडल से भी सम्बन्ध रखता है. हास्यप्रिय , अतिविद्वान, रजोगुण प्रधान , तवचा प्रधान ग्रेह है.यह मीन राशि में नीच का होता है और मिथुन व् कन्या राशि में स्वग्रेही होता है. कन्या में स्वग्रेही उच्च, व् मूल त्रिकोण तीन स्थिति एकसाथ रखता है.

शारीरिक गठन

लम्बा पतला चंचल शरीर, पतली आवाज , तेज चाल, काले बाल, हंसी का लबादा ओढ़े होता है. सामान्य शरीर, तीव्रबुद्धि, क्षमता शील, किसी वाद विवाद को तुरंत सुलझाने वाला होता है. सामाजिक समरसता पूर्ण होता है,दोस्ती करना पसंद करता है.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

त्रिदोष करक व् तवचा सम्बन्धी रोगों के मामले में शुभ होने पर शुभ व् अशुभ होने पर अशुभ परिणाम उत्पन्न करता है. षष्ठ भाव से सम्बन्ध होने की दशा में ये रोग विशेष प्रभाव दिखाते है. लम्बी आयु पाया जातक अंतिम वर्षो में विशेष रूप से प्रभावित रहता है.

रत्न

अशुभ बुध प्रभावित व्यक्ति को दाए हाथ की कनिष्ठा अंगुली में बुधवार को 55 रत्ती का पन्ना धारण करना चाहिए .

ब्रहस्पति ग्रह

गुरु ग्रह
गुरु ग्रह

पृथ्वी के आकर से दस गुना बड़ा ग्रह ब्रहस्पति सूर्य से बहुत दूरी पर स्थित है. किन्तु अमावस्या की रात्रि में नंगी आँखों से ही ये आकाश गंगा में विचरण करता हुआ देखा जा सकता है. मंगल व् शुक्र के बाद ये सबसे चमकीला ग्रह है. परिक्रमा पथ पर 12 वर्षो में ये सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करता है.

आपकी जानकारी के लिए बता दे की सूर्य से केवल ३० अंश की दूरी पर ही 12 राशियों की स्थिति मानी गई है. इस प्रकार एक राशि में ये एक वर्ष तक चलाय्मान रहता है. अनुशासन प्रिय, सत्यवादी, क्रिडाप्रिय,कर्तव्यनिष्ठ सत्यवादी,सद्गुणी प्रसन्न, व् विद्वान होना इसके गुणों शामिल है. ये बड़े पेट वाला , कफ प्रकृति युक्त है.

धनु व् मीन राशि का स्वामी,कर्क राशि में उच्च व् मकर राशि में नीच अवस्था में होता है.सुगठित शरीर वाला, मजबूत हद्दियोवाला होता है.

सामान्य चरित्र

अध्ययन व् ज्ञानार्जन से युक्त ये एक शुभ ग्रह है. बुध भी इसी की श्रेणी का शुभ ग्रह है.अशुभ ग्रहो की दृष्टि से फ्लात्मक परिवर्तन हो जाता है लेकिन अपने शुभ भाव को हमेशा बनाए रखता है.ये परिश्रम पूर्ण खेलो में रूचि लेता है. जैसे फुटबाल, हाकी, आदि.

ये धर्मनिष्ठ बड़ो का आदर करने वाला देवताओ का भी गुरु. राजकीय सहायता का भाव भी रखता है .

स्वास्थ्य पर प्रभाव

जातक की कुंडली में यदि ब्रहस्पति प्रतिकूल हो तो यकृत(लीवर) सम्बन्धी गड़बड़ी, हर्निया रोग,व् पीलिया रोगों को देता है.

रत्न

ब्रहस्पति का रत्न हल्का पीला पुखराज होता है.प्रशासकीय कार्यो में ये अत्यंत सहायक है, 55 रत्ती का पुखराज गुरु वर को तर्जिनी अंगुली में पहनना चाहिये

शुक्र ग्रह Venus

ग्रहो का परिचय
ग्रहो का परिचय

शुक्र आकाश में अपनी तेज चमक के लिए प्रसिद्ध है. ये कुछ माह तक शाम को उत्तर दिशा में व् कुछ माह तक सुबह सूर्योदय से पहले चमकता है. मंगल और पृथ्वी ग्रेह के मध्य में स्थित शुक्र सूर्य से 48 अंश की कोणीय दूरी पर स्थित है. अत कुंडली में सूर्य शुक्र या तो साथ साथ या अधिक तम दो भावो की दूरी पर स्थित होते है.

सुख , सुन्दरता, प्यार , रति, संगीत का सूचक ग्रह है. ये एक स्त्री ग्रह, सुहाने नेत्र, सुखी, बलवान, काँती युक्त,सुख समृद्धि से पूर्ण, नीले रंग, रजो गुण,कफ प्रकृति से युक्त ग्रह है. वृष व् तुला राशि का स्वामी शुक्र मीन राशि में उच्च तथा कन्या राशि में नीच का होता है.

शारीरिक गठन

माध्यम ऊँची, सुंदर आँखे, स्थूल शरीर,मधुर आवाज व् घुंगराले बाल होते है.

सामान्य चरित्र

सुख पूर्वक , विलासिता पूर्ण जीवन शुक्र ग्रह की देंन होती है. शुक्र प्रभावित व्यक्ति संगीत सुगंध कलाप्रेमी होता है. निवास को सदैव सुंदर ढंग से सजाना चाहता है.आधुनिक , रंग रंगीला , सुंदर वस्त्र पहनने का शोकीन होता है.विपरीत लिंग के प्रति सुदरता पूर्ण आग्रह इसकी विशेषता है. ऐसे व्यक्ति को नित्य नए वहां चलने का शौक होता है.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

शुक्र की सर्दी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को शरीर के लिए कम करना है यानि सर्दी के प्रति असहन शील बनता है. अत प्रभावित व्यक्ति श्वास सम्बन्धी रोग ,टांसिल, जुकाम आदि से पीड़ित रहता है. देखा गया है कलाकारों को ये रोग ज्यादा सताते है. जननांग सम्बन्धी रोग भी सताती है.

रत्न

शुक्र का रत्न हीरा है इसे कभी भी अपनी आर्थिक सुविधा अनुसार शुक्र वर को धारण कर सकते हो

शनि ग्रह

शनि ग्रह
शनि ग्रह

ये एक धीमी गति से चलने वाला ग्रह है इसे सूर्य पुत्र की संज्ञा से विभूषित किया गया है. इसे सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करने में 30 वर्ष से कुछ कम समय लगता है. अत ढाई वर्ष एक ही राशि में रहता है / आपकी आयु को निर्धरित करने वाला ये ग्रह मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी है. मेष राशि में नीच अवस्था को प्राप्त होता है तो तुला राशि में उच्चावस्था को प्राप्त होता है. ये विलम्ब का प्रतीक है.अर्थात सम्बंधित भाव का कार्य विलब से लेकिन निश्चित ही करवाता है. शनि शुभ या अशुभ

आलसी , कंजूस, समय का पालन न करनेवाला आदि अवगुणों के साथ ही धार्मिक प्रवृत्ति का भी है. यह ग्रह वायु प्रकृति का, संध्या बलि,त्रिदोष से युक्त, कड़वा स्वाद, नीले रंग,और बूढा है. यानि किसी के चोरी हुई होतो चोर का सम्बन्ध बड़ी उम्र वाले चोर से होगा सप्तम और सप्तमेश चोर के कारक है.पाप ग्रह होने के कारण दुष्ट स्वाभाव का झूठा, और दुबला होता है.

शारीरिक गठन

प्रथम भाव में शनि होतो दुबला पतला , कला, घने बालो वाला होता है.दाढ़ी मुच रखता है.आँखों में पीला पन लिए गहरे का एहसास लिए होता है. स्वास्थ्य पर शनि का दुष्प्रभाव होतो लम्बी चलने वाली बीमारी होती है.शनि मंगल का सम्मिलन दुर्घटना चोट, रक्त स्राव अग भंग होना संभव है. शनि के प्रभाव से त्वचा सम्बन्धी रोग, पथरी,कान के रोग , व् स्वास सम्बन्धी रोग संभव है.

सामान्य चरित्र

शनि प्रभावी व्यक्ति इसकी धीमी गति के कारण समय का पालन न करने वाला,आलसी बना देता है लेकिन येही शनि यदि कुंडली में शुभ हो तो धेर्य के गुण को विकसित कर मंत्री पद, या उच्च पदों की प्राप्ति करवाता है. शनि को सदेव अशुभ या पापी ही न समझे शनि की स्थिति व् अन्य ग्रहो की कृष्टि के आधार पर किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए.

शनि मारक के साथ साथ अष्टम भाव में होकर लम्बी आयु भी प्रधान करता है. शुभ स्थित शनि व्यक्ति को धार्मिक व् ध्यान में स्थिर योगी बनाता है. शनि प्रभावित व्यक्ति किसी स्थान पर पहुँचने में विलम्ब करता है लेकिन इसका उसपर को मानसिक प्रभव नहीं पड़ता है. शनि निराशा वादी बनता है, चन्द्र या बुध पर इसकी दृष्टि हो तो व्यक्ति निराशा वाड़ी होता है. कमजोर शनि की चन्द्र पर दृष्टि आत्म घात को प्रेरित करती है. दान पुन्य के फल

रत्न

शनि का रत्न नीलम है परन्तु नीलम यदि शनि कुंडली में शुभ हो तो उन्स्की शक्ति को बढ़ाता है. अशुभ स्थिति में नीलम शनि को सबल मानेगा लेकिन कम न होंगी.सामन्यत शनिवार को दाहिने हाथ की माध्यम अंगुली में लोहे का छल्ला पहनना पर्याप्त है.

राहू और केतु

राहू ketu

राहू – केतु किसी अन्य भोतिक ग्रहो की तरह किसी भोतिक पिंड का नाम न हो कर केवल छाया ग्रहो के रूप में स्थापित गणितीय परिगणना है. इन छाया ग्रहो के 5अंश के अंतर पर आते ही सूर्य चद्र ग्रहन ग्रस्त हो जाते है.

पृथ्वी से देखने पर सूर्य चन्द्र जिस परिक्रमा पथ पर घुमते है वह पथ आपस में दो बिन्दो पर कटता है. इस प्रकार सूर्य व् चन्द्र जिन दो बिन्दो पर पथ को कतरे है वह 180 अंश पर होता होता है. इन दोनों बिन्दुओ का जो कटान बिंदु चन्द्र के दक्षिण से उत्तर की और जाते हुए बनता है उसे रहू कहते है. ठीक इसके विपरीत जब चन्द्र उत्तर से दक्षिण की और जाते हुई जो बिंदु बनता है उसे केतु कहते है.

सूर्य व् चन्द्र जिस समय उच्च कटान बिंदु पर हो तब यदि अमावस्या हो तो सूर्य व् पृथ्वी के बीच चंद्रमा के आजाने से सूर्य प्रकाश पृथ्वी पर नहीं आता है उस समय पर सूर्य ग्रहण लगता है. इसी प्रकार पूर्णमासी को जब चंद्रमा उच्च काटन बिंदु पर से गुजरता है तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ेगी तब चन्द्र ग्रहण की स्थिति पैदा होगी.

इसी आधार पर रहू व् केतु की शत्रुता चंद्रमा व् सूर्य से होती है. रहू व् केतु की दूरी 180 डिग्री पर होने के कारण यदि राहू लग्न में हो तो केतु सप्तम में होगा

राहू केतु सामान्यत पाप ग्रहो की संज्ञा से विभूषित है. राहू को ज्योतिष में चोर कहा गया है क्योकि ये दूसरो के प्रति बुरी भावना से ग्रस्त है और केतु को कुत्ता कहा गया है क्योकि ये दूसरो की चीजे झपट लेता है. ये केवल ज्योतिष विचार है न की वास्तविकता क्योंकि जब हम रहू केतु पर किसी कुंडली में विचार करे तो इनके चरित्र सम्बन्धी भावार्थ को ध्यान में रखना होता है.

राहू केतु के क्रम वर चारित्रिक विश्लेषण

1 ये जिस भाव में स्थित हो यदि वह कोई ग्रह हो तो ये उसके समान चरित्र ग्रहन कर लेते है. क्योंकि इनका अपना कोई भोती स्वरुप न होने की कारन अपना कोई घर भी नहीं होता है.

2यदि कोई ग्रेह साथ न हो तो जिस ग्रेह की दृष्टि इन पर पड़ रही हो ये उसका चरित्र धारण कर लेते है.

३यदि किसी के साथ भी नहीं है, और किसीकी दृष्टि भी इन पर नहीं है तो ऐसे हालत में ये भाव स्वामी के अनुसार आचरण करते है.

इस प्रकार राहू केतु अन्य ग्रहो का चरित्र ग्रहण करके फल देते है लेकिन इनकी भाव स्थिति के अनुसार भी फलो की कल्पना करनी चाहिए .

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