ग्रहों की गति

ग्रहो की गति
ग्रहो की गति

 

हर ग्रह की अपनी अपनी अलग अलग गति होती है। ग्रहों की गति से तात्पर्य है की गोचरस्थ ग्रह का प्रभाव क्या हो रहा है.

गति दो प्रकार की होती हैं 1 परिभ्रमण  2 परिक्रमण

परिभ्रमण –

जब ग्रह अपनी धुरी पर अपने ही पश्चिम से पूर्व को घुमता है उस गति को परिभ्रमण कहते है। पृथ्वी जब दिन रात अपने ही धुरी पर अपने चारों ओर घूमती है उसे परिभ्रमण कहते है।

ग्रहों की गति

परिक्रमण

पृथ्वी परिभ्रमण करते हुए अपनी कक्षा पर सूर्य परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ती है उसे परिक्रमण कहते है।

परिक्रमण

भी दो प्रकार का होता हैं

1- ग्रहो की गति मार्गी और वक्री 

1-   मार्गी   – जब ग्रह अपने मार्ग में सीधा बढ़ते चला जाता है तो उसे मार्गी ग्रह कहते हैं। यह गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। जैसे कोई ग्रह मेष राशि में है और उसके बाद वह वृष राशि में आ जाता है तो उसे मार्गी गति कहेंगे।

2- वक्री- जब ग्रह सीधी चाल चलते चलते एकदम वापस लौट हुआ दिखता है तो उसे वक्री ग्रह कहते हैं। यह गति पश्चिम से पूर्व की ओर सूर्य की चाल के विरूद्ध होती है। जैसे किसी ग्रह को चलते हुए मिथुन से कर्क में जाना था लेकिन वह इसके उलट वृष में जाने लगे तो इसे ग्रह की वक्र गति कहंेगे।

ग्रहों का चलन- 1- सबसे तेज चलने वाला चंद्रमा हैं। पृथ्वी के आसपास करीब 30 दिन में अपनी एक परिक्रमा पूरी कर लेता है।

2 शनि- सबसे आलसी यानि सबसे धीमा चलने वाला ग्रह है।यह 30 साल में क्रांति वृत्ति की परिक्रमा पूरी करता है।

3-सूर्य- सूर्य एक वर्ष मंे यानि 365-4 दिन में अपनी एक परिक्रमा पूरी करता है। इस प्रकार स्थूल रूप से एक राशि में एक महीना रहता है।

इस तरह से चंद्रमा एक राशि में सवा दो दिन, मंगल डेढ़ मास बुध एक मास गुरू 13 मास शुक्र एक मास शनि 30मास राहु 18 मास केतू 18 मास रहते है।

राहू और केतू को छोड़ कर ओर सब ग्रहों की गति बदलती रहती है।राहू केतू सदा वक्री ओर एक सी गति में परीभ्रमण करते हैं।

ग्रह कोई अपनी मर्जी से वक्री मार्गी नहीं होते सूर्य की प्रबल शक्ति के खिंचाव के कारण ही ग्रहों की गति में परिवर्तन होता रहता है। सूर्य की परिक्रमा का मार्ग गोल ना होकर अण्डाकार है। इस कारण कोई ग्रह भाग सूर्य के नजदीक व कोई दूर हो जाता है। (पृथ्वी लगभग एक जनवरी को सूर्य के नजदीक होती है और एक जुलाई को सूर्य से दूर होती है।)

ग्रह जब चलते चलते सूर्य के नजदीक आता है तो सूर्य के खिचाव के कारण ग्रह की गति बढ़ जाती है उसे शीघ्री कहते हैं। जब चलते हुए दूर जाता है तो सूर्य के खिंचवा के कारण ग्रह की गति धीमी हो जाती है इससे पृथ्वी से देखने पर ग्रह की धीमी गति के कारण ग्रह पृथ्वी पर वक्री दिखाई देता हैं। परंतु जबइदूर से लौट कर ग्रह सूर्य की ओरी बड़ता है तो फिर वह सूर्य के प्रभाव से बल पाता है और आगे बढ़ता है तब मार्गी कहलाता हैं।

ग्रहों का उदय अस्त ज्ञान-

सूर्य के पास आ जाने से ग्रह का अस्त होना कहा जाता है। यदि वही ग्रह सूर्य से आगे चला जाए तो वह उदय कहलाता है।

सूर्य को छोड़ कर सब ग्रहों का उदय अस्त लगा रहता हैं। इसमें भी यह है कि किसी विशेष अंश पर कोई ग्रह उदय और कोई ग्रह अस्त कहलाता है।

सूर्य से अंशात्मक दूरी के आधार पर ग्रहों का उदय अस्त होना इस प्रकार से है।

चंद्र 12º      मंगल17º     बुध13º       गुरू11º              शुक्र शनि 15º

सायन Moveble

निरयन fixed zodic

ग्रहों की गति -अयनांश अयन के अंग हिन्दू से माना हुआ प्रथम बिंदू और शरद सम्पात के बीच जो अंतर है वह निश्चित बिंदू से नापा जाता है उसे अयनांश कहते हैं।

अयन क्या है

यह जानने के लिए सम्पात बिंदुओं का जानना आवश्यक है। नाड़ीवृत्ति और क्रांतिवृत्त एक दूसरे को अलग-2 जगह काटते हैं इनमें शरद संपात और दूसरे को वसंत संपात कहते हैं। इन्हीं दोनों बिंदुओं को अयन भी कहते हैं। इन्ही दोनों बिंदुओं पर सूर्य के आने पर दिन रात बराबर होते हैं।यह संपात बिंदुओं हमेशा उल्टे चलते हैं। जिसे प्रकार राहू केतू उल्टे चलते हैं।

शरद संपात बिंदू अपनी पूर्व स्थिति से पीछे हटता जा रहा हैं इसी कारण इसे वक्री गति कहते हैं। इसकी पूर्व स्थिति रेवती नक्षत्र है।परन्तु ज्योतिष चक्र (भचक्र) में संपात बिंदुओं को मेष के प्रथम बिंदू से माना गया है। इस संपात बिंदू की वार्षिक गति होती है और यही गति अयन चलन कहलाता है। इसे विषुवत्क्रांति वलय पात चलन भी कहते हैं। ज

जहाँ इस सायन का उपयोग होता है उसे सायन (चलित ग्रह) कहते हैं। निरयन में स्थित मेष के पहले अंश से यह संपात बिंदू आरम्भ होता है। इस कारण निरयन को स्थिर movable zodic कहते है।

इसी संपात की गति को अयनांश कहते हैं। इस सम्पात का पूर्ण चक्र 25868वर्ष में अर्थात लगभग 26000में पूरा होता हैं इस प्रकार इस प्रमाण से इसकी गति 1 अंश चलने पर 72 वर्ष लगते हैं। अर्थात एक वर्ष में प्राय 50 विकला के हिसाब से अयन की गति होती है।

अयनांश सहित ग्रह – चलित ग्रह -सायन ग्रह- सायन मत

अयनांश रहित ग्रह- स्थिर ग्रह- निरयन मत

सायन मत के मानने वाले पश्चिमी लोग हैं वे इसे अपनी ज्योतिष में शामिल करते हैं। भारत में महाराष्ट्र में भी सायन का उपयोग किया जाता है।सायन में से अयनांश निकाल कर उसे निरयन बनाकर या नियन ग्रह हो तो बिना मिलाए ही यह ग्रह का बहुधा उपयोग करते हें वे निरयन मत के है।

अयनांश का उपयोग निरयन मत में कई जगह होता है। जेैसे भाव स्पष्ट करने के लिए निरयन सूर्य में अयनांश मिलाकर उसे सायन सूर्य बनाकर उस पर से लग्न साधन करते हैं। और फिर सायन लग्न निकलने पर अयनांश घटाकर निरयन ग्रहण करते है। अयनांश का उपयोग कंुडली बनाने में करना पड़ता है। इसलिये इसको जानना आवश्यक है।

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