ग्रहण लगने का कारण

ग्रहण लगने का कारण

वेद जो की भारतीय संस्कृति के आदिकालीन ग्रंथ है में भी इस बात का उल्लेख है की ग्रहण लगने का कारण क्या है ?अत भारतीयों को ग्रहण के बारे में पहले से ही पता है.

आदि कालीन भारतीय ज्योतिष साहित्य में मान्यता रही है की सूर्य जगत का आत्मा और चंद्रमा जगत का मन है. क्या वास्तव में चंद्रमा और सूर्य ही इस पृथ्वी ग्रह पर जीवन के आधार है. इसका उत्तर है -हाँ ! निश्चय ही पृथ्वी पर जीवन का आधर ये दोनों है अन्यथा यहाँ भी अन्य ग्रहो की तरह जीवन शून्य होता. पृथ्वी पर जीवन का आधार होने पर भी इन्हें आखिर ग्रहण लगने का कारण क्या है?

आइये विश्लेषण करे की ग्रहण का कारण क्या है. हमें इसके लिए इन दोनों की वैज्ञानिक स्थिति का अध्ययन करना होगा. सूर्य ग्रहण के समय सूर्य चंद्रमा का वही भाग दृष्टि गोचर होता है जो की सूर्य की और होता है. अत न तो चन्द्र प्रकाश होता है और न ही सूर्य पृथिवी के बीच चंद्रमा के आजाने से सूर्य प्रकाश ही दृष्टिगोचर होता है.

इस प्रकार सूर्य ग्रहण वाले स्थान पर सूर्य और चंद्रमा दोनों में से किसी की किरण सीधे प्राप्त नही होती है. चन्द्र ग्रहण के समय भी चन्द्रमाँ की किरण उस स्थान पर नहीं पहुँचती जिस भाग में ग्रहण होता है. क्योंकि उस समय उस भाग पर रात का समय होता है. ऐसा चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने से होता है.

क्या होता है प्रभाव ?

एक बार सन 1980-17 फरवरी को उत्तरी गोलार्ध के अनेक देशो में सूर्य ग्रहण लगा था जिससे भारत में तो दिन में ही रात हो गई थी. आपको मनोरंजक बात बता दे की उस समय टी वी पर चुपके चुपके फिल्म दिखाई गई थी इसलिए की हास्य से भरपूर फिल्म होने के कारण कोई बहार न निकले.

ग्रहण लगने का कारण
ग्रहण लगने का कारण

दरअसल ग्रहण के समय में वैज्ञानिक चेतावनी जारी की जाती है की यदि कोई ग्रहण को सीधे खुली आँखों से देखेगा तो आँखे ख़राब हो जाएंगी. व्यक्ति नपुंसक भी बन सकता है. विज्ञानिको के अनुसार चन्द्र ग्रहण की अपेक्षा सूर्य ग्रहण का प्रभाव अधिक होता है. सूर्य ग्रहण के समय गामा किरने अधिक निसृत होती है जिसके कारण जीवधारियो के मन ,रक्तचाप,ख़राब हो जाता है.

सूर्य ग्रहण के समय पशु पक्षी उत्तेजित हो जाते है. पक्षी घोसलों मे छुप जाते है. अनेक फूल अपनी पंखुड़िया समेट लेते है.वैज्ञानिक अन्वेषण के अनुसार प्रबेंगनी विकिरण घट जाता है किन्तु एक्स किरणों में कोई अंतर नहीं आता है. कोमल एवं संवेदन शील व्यक्ति , पक्षी,बालक, गर्भस्त शिशु,पर इनका अधिक प्रभाव पड़ता है.

सूर्य चन्द्र ग्रहण का प्रभाव ग्रहणके समय केवल उसी भाग पर पड़ता है जिसभाग के सामने वाला क्षेत्र पृथिवी पर होता है. पूरे पृथ्वी ग्रह पर इसका प्रभाव नहीं होता है.

धार्मिक आधार

भारत में ग्रहण लगने का कारण का अध्ययन आदि काल से होता आया है. भारतीय महर्शियो ज्योतिषियों ने इनके कुप्रभावो से जनता को बचाने के लिए इन्हें धार्मिक कर्तव्य बोध से जोड़ दिया था क्योकी यहाँ अपने देश में जनता धार्मिक प्रवृत्ति की होने से किसी बात, या घटना को धार्मिक आधार दे दिया जाए तो उसे कर्तव्य समझ कर मनोयोग से मानती है, दान पुन्य के फल

इस परिप्रेक्ष्य में देखे तो भारतीय आदिकालीन ज्योतिषियों और धर्म पिपासुओ ने धार्मिक आधार पर आर्थिक दोहन भी किया है. क्योंकि भारत में समय पूर्व काल गणना के आधार पर ज्योतिषी लोग पता लगा लेते थे की कब कब ग्रहण किन किन क्षेत्रो में दिखेगा अत तत्संबंधी स्थान निवासियों को ग्रहण का भयानक प्रभव बता कर प्रभावित काल में दान पुन्य के महान फल बता कर अपनी झोली भरने का इंतजाम कर लेते थे.यथा – जातक की राशि पर ग्रहण का प्रतिकूल प्रभाव बता कर सोने का नाग बनाकर ताम्बे के पात्र में तिल सहित ज्योतिषी को दान करने का विधान है.

ग्रहण लगने का कारण धार्मिक ग्रंथो यथा पुराणों में अलग ही बताया गया है. समुद्र मंथन के दोरान बारह वर्षो तक हुए समुद्र मंथन के दोरान जो अमृत प्राप्त हुआ उसे पाने को लेकर मचे घमासान में चार स्थानों पर गिरे अमृत कणों के आधार पर आज भी उन्ही स्थानों पर हर तीन वर्षो बाद लघु कुम्भ पर्व व् हर 12 वर्षो के बाद पूर्ण कुम्भ मनाया जाता है. इसी कथा के अनंतर जो अमृत प्राप्त हुआ उसे राहू द्वारा जो लघु अंश छीना झपटी में प्राप्त हुआ उसे पी लिया जिसे सूर्य चंद्रमा ने देखा तो विष्णु भगवन को बताया परिणाम स्वरुप विष्णु ने उसका शिरोदोहन कर दिया इससे उसके दो हिस्से हो गए अत अमृत पी कर अमर हो जाने के कारण एक शिरो भाग का नाम राहू पड़ा और धड़ भाग का नाम केतु पडा.जबकि ये उपरोक्त गणना अनुसार जब सूर्य चंद्रमा का अंतर पुर्णिमाँ या अमावस्या को 5 डिग्री रह्जाता है तब ग्रहन लगता है. राहू केतु के प्रभाव

शास्त्रों में दान का विशेष पुन्य बताया गया है.सूर्य ग्रहण में 12 घंटे पूर्व और चन्द्र ग्रहण में 9 घंटे पूर्व सुटक दोष लग जाता है. सामान्यत ग्रहन काल में भोजन करना निषिद्ध है. पेड़ काटना, निद्रामग्न होना.मलमूत्र त्यागना दातुन करना बाल कटवाना, मैथुन करना तथा पशुओ का दूध निकलना मना है.

वैज्ञानिक आधार

उपरोक्त आलंकारिक वर्णन ज्योतिष विज्ञानं से अलग है. क्योंकि ग्रहण का ज्ञान ज्योतिषीय सिद्धांत से ही होता है. पुराणों की अलंकारिक कथो से हमारा ज्योतिषीय ज्ञान सर्वथा अलग है. जब सूर्य चन्द्रम और पृथ्वी एक सूत्र में आते है. तब ग्रहन संभव होता है. ऐसी स्थिति साल में 24 बार आती है.किन्तु ये तीनो परस्पर एक सूत्र में होते हुए भी ग्रहन इसलिए नहीं पड़ता की ये एक समतल स्तर पर नहीं होते. सूर्य, चद्र, पृथ्वी, साल में केवल चार बार एक समतल स्तर पर होते है. अत एक साल में 2 सूर्य ग्रहन व् 2 चन्द्र ग्रहन ही पड़ते है.

सूर्य चंद्रमा ओर पृथ्वी आकाश मंडल में जिस बिदु पर सम्सुत्र में एक रखा पर आते है इन्ही दो बिन्दुओ में एक का नाम राहू व् दुसरे का केतु है. अत रहू केतु कोई ग्रेह न होकर सूर्य चन्द्रमा के मध्य 180 डिग्री पर स्थित दो परस्पर बिन्दू है.ज्योतिषीय सिद्धांत में राहू का नाम चंद्र्पात भी है.

ये जरुर है की प्राचीन महर्षियों ने ग्रहण के समय स्नान तथा शुद्धता सम्बन्धी जो नियम बनाए थे वे भी विज्ञानं सम्मत है.

ग्रन्थ आधारित मत

वेदों के बाद जिन भारतीय खगोल वैज्ञानिक ग्रंथो में ग्रहण विषयक वर्णन मिलता है. उनमे पंच -सिद्धान्तिका,(पोलिश) सूर्य सिद्धांत, रोमक सिद्धांत वशिष्ठ सिद्धांत,ब्रहम सिद्धांत प्रसिद्द है. इनका रचना काल विद्वानों ने ढाई हजार साल माना है. इनमे ग्रहन समय का गणित विद्यमान है.

महाभारत में भी ग्रहण का वर्णन मिलता है. ब्रहम गुप्त कृत ब्रहम सिद्धात, और भास्कराचार्य कृत सिद्धांत शिरोमणि गृह्न्थ में खंडन पूर्वक बताया गया है की चन्द्र व् सूर्य ग्रहण का सम्बह्ध राहू यु केतुना होकर चद्र ग्रहण का कारन पृथ्वी की छाया और सूर्य ग्रहन का कारन चंद्रमा है. अब ये सब जानते है.

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