गोचर में अष्टकवर्ग का प्रयोग

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	 गोचर में अष्टकवर्ग का प्रयोग
गोचर में अष्टकवर्ग का प्रयोग

अष्टक वर्ग बनाना सीख लेने के पश्चात हमें गोचर में अष्टक वर्ग का प्रयोग करना है यहाँ इसी विषय को बताने का प्रयोजन है।

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दोस्तों देखने में आता है की जब भी शनि ढैया या साढ़े साती की बात की जाती है तो लोग घबरा जाते है की पता नहीं इस समयावधि में क्या होगा। लेकिन घबराने की जरुरत नहीं है

गोचर में अष्टक वर्ग का प्रयोग के अंतर्गत बताएंगे की शनि के शुभ या अशुभ अंश कब किस समय आने वाले है.अष्टक वर्ग का गोचर के लिए साधारण नियम ये है की हर ग्रह कुंडली में अपनी स्थिति अनुसार दूसरे ग्रहो को शुभ अंक देता है

साधारण गोचर की अवधारणा ये है की गोचर को कुंडली में चन्द्रमा स्थित राशि के अनुसार देखा जाता है लेकिन अष्टक वर्ग में हर ग्रह अनुसार दूसरे ग्रह के शुभत्व को देखा जाता है.

गोचर में अष्टकवर्ग का प्रयोग

गोचर में अ ष्टक वर्ग का प्रयोग
गोचर में अ ष्टक वर्ग का प्रयोग

आपको फिर से बता दें कि एक राशि 30 अंश की होती है और अष्टक वर्ग सात ग्रहो और आठवे लग्न के दवारा कुंडली में शुभ अंक प्रदान करने के उपरांत बनता है हर ग्रह को कुंडली में अन्य ग्रहो द्वारा शुभ अंक प्रदान किये जाते है जो ग्रह अंक नहीं दे पता उस स्थान को रिक्त छोड़ दिया जाता है. अब क्योंकि एक राशि ३० अंश की होती है तो इसके आठ सामान विभाग किये जाते है। अब ये कैसे करेंगे , 30 अंश को 60 से गुना करेंगे तो 1800 कला बन जाएंगी अब इस संख्या को 8 से विभाजित करेंगे तो 3.45 (तीन अंश 45 कला या परिणाम अनुसार 135 कला का एक विभाग बनेगा) का एक विभाग प्राप्त होगा कुंडली में शनि के अंश अनुसार हर विभाग का एक स्वामी ग्रह होगा

शनि अष्टक वर्ग में कहा – कहा अन्य ग्रह अंक देंगे देखे

सूर्य 1-2-4-7-8-10-11=कुल 7 स्थान -(7.23.2.28)

चंद्र -3-6-11कुल =3 स्थान -(11.17.11.34)

मंगल 3-5-6-10-11-12 कुल=6 स्थान -(7.10.34.8)

बुध -6-8-9-10-11-12कुल =6 स्थान -(7.2.31.19)

बृहस्पत -5-6-11-12 कुल 4 स्थान _(7.20.23.19)

शुक्र 6-11-12 कुल =3 स्थान (8.23.13)

शनि 3-5-11-12 कुल 4 स्थान -(8.13.32.2)

लग्न 1-3-4-6-11-12 कुल 6 स्थान -(9.1.47.33)

देखने का तरीका-

दी गई कुण्डली में शनि अपने राशि स्थित स्थान में अंक दे रहा है फिर 5 वे स्थान में फिर 11 वे स्थान में फिर 12 वे स्थान में अंक दे रहा है इस प्रकार शनि ने स्वयं को 4 स्थानों पर अंक दिए. ठीक इसी प्रकार अन्य ग्रहो ने भी उसे अपने और से अंक दिए है.

अब चाहे कोई भी राशि हो प्रथम 8 वे भाग पर शनि का अधिकार होता है इसलिए धनु राशि की 3 .45 कला की कक्षा शनि की कहलाएगी दुसरी कक्षा गुरु की तीसरी मंगल, चौथी सूर्य, पांचवी शुक्र छठी बुध,सातवीं चंद्र, आठवी लग्न चाहे किसी का भी महाअष्टक वर्ग बना रहे हो क्रम ये ही रहेगा, लेकिन जिसका वर्ग बनाया जाए उसी प्रथम तीन अंश 45 कला के कक्षा का स्वमी रखा जय फिर इसी क्रमानुसार कक्षाए स्थापित की जाए

इस प्रकार शनि के अष्टक वर्ग में 39 शुभ बिंदु पड़ते है नीचे शनि का प्रस्ताराष्टक वर्ग दिया जा रहा है यहाँ नीचे देखने से हमें पता चलता है की शनि को किन अंशो पर किस ग्रह ने बिंदु अंश दिए ।

शनि तो अपने गोचर काल में एक राशि में 30 महीने यानि ढाई साल रहता है तो क्या वह ढाई साल ख़राब ही रहेगा नहीं ऐसा नहीं है जनम कालीन ग्रह भी उससे प्रेम सम्बन्ध रखने के कारण उसे अपने हिस्से का शुभ बिंदु देते है. जैसे यहाँ स्वयं शनि ने मेंष, तुला , वृश्चिक , कुम्भ में अपने को जब वह गोचर में इन राशियों पर oo से 3 .45 अंश कला के क्षेत्र में भ्रमण करेगा तो अशुभ फल नहीं देगा, बल्कि शुभ रहेगा

इस प्रकार से शनि की साढ़े साती का अशुभ काल का भय आपके मनो से निकल जाना चाहिए इसे तरह से आप अन्य ग्रहो का भी 96 वर्गों का एक टेबल बनाकर सर्वथा शुभ फल जान सकते है

राशि123456789101112अंश
शनि****0से 3.45
गुरु****7.30
मंगल******11.45
सूर्य*******15
शुक्र***18.45
बुध******22.30
चंद्र***26.15
लग्न******30
जोड़622245432324=39
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