गोचर किसे कहते हैं?

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गोचर किसे कहते हैं? यानि जन्म कालींन चंद्र राशी

से विभिन्न राशि भावो में ग्रहों का असमान रूप से विचरण करना गोचर कहलाता है .

गोचर (transite)


जन्म समय में ही नहीं बल्कि हर समय चंद्रमा किसी न किसी नक्षत्र में तो रहता ही हैं लेकिन जब हम गोचर किसे कहते हैं? पर विचार करते है तो किसी व्यक्ति विशेष के भविष्य को लेकर तो उस समय हमें व्यक्ति की जन्म कालीन चंद्रमा की राशि को आधार बना कर ही उसका भविष्य कथन करना होता है।

तो इस प्रकार जन्म समय में चंद्रमा किसी एक राशि में रहता है, और उस राशि को जन्म राशि कहते हैं

उसी जन्म समय की चंद्र राशि को लग्न मानकर जो कुण्डली बनाई जाती है उस कुण्डली को चंद्र कुण्डली कहते हैं।

ग्रह स्थिति

उदाहरण कुण्डली के जातक का जन्म उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हुआ है। इसलिये उदाहरण कुण्डली का चंद्र मीन राशि में है। मीन राशि को लग्न मानकर उदाहरण कुण्डली की चंद्र कुंडली यह बनी है।

गोचर किसे कहते है ?
गोचर किसे कहते है ?


जन्म समयोपरांत सभी ग्रह अपनी अपनी चाल यानि गति के अनुसार चलते रहते हैं।

इसी कारण चंद्र लग्न दी गई कुंडली में मीन लग्न है और लग्न में चंद्र भी स्थित है अतः स्वतः मीन राशि भी यहाँ हो गई।

यहाँ देखने में आ रहा है कि चंद्र कुंडली में गुरू चतुर्थ स्थान में हैं लेकिन कुछ दिनों के पश्चात लगभग एक वर्ष में गुरू अपनी चाल के अनुसार चलता हुआ चंद्रमा से पंचम स्थान में चला जाएगा एवं उससे एक वर्ष बाद षष्ठ स्थान में चला जाएगा।

इसी प्रकार सब ग्रह अपनी अपनी चाल के अनुसार चंद्र लग्न से भिन्न भिन्न स्थानों में चलते रहते हैं। इसी को ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का गोचर भ्रमण कहते हैं।

इसका प्रभाव समस्त जीवन पर पड़ता है। इसी कारण जब उस लग्न से ग्रहगण अन्यान्य स्थानों (भावों) में जाते हैं तब प्रत्येक ग्रह का भिन्न भिन्न प्रभाव उस समय में जातक के जीवन पर पड़ता है।

शनि ढाई वर्ष तक एक राशि में रहता है। इस कारण लगभग तीस वर्ष में शनि घूमता घूमता पुनः उस स्थान में आता है, जहाँ जन्म के समय था।

बृहस्पति एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है। इस कारण लगभग बारह वर्ष में चलता चलता उस स्थान में आ जाता है जहाँ वह जन्म के समय में था।

राहू एवं केतू लगभग डेढ़ वर्ष एक राशि में रहते है। इस कारण लगभग अठारह वर्ष में जन्म के स्थान पर आ जाते हैं।

शेष ग्रह शीध्रगामी होने के कारण एक वर्ष के भीतर ही अपनी अपनी आवृत्ति को समाप्त कर लेते हैं और चंद्रमा तो लगभग 27 दिन में ही राशि चक्र को पूरा कर लेता है।

इसका मतलब यह है कि जन्म समय के 12-18 और तीस वर्ष के बाद मनुष्य जीवन में एक नया प्रभाव काल आता रहता है। जिंदगी की किताब का एक नया अध्याय शुरू हो जाता है।

यूरोप और अमेरिका निवासी ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों के फल कथन की रीति गोचर जैसी ही शैली पर आधारित है। जिसे ‘‘डायरेक्शन एंड डाइरेक्टिंग’’ के नाम से जानते हैं। परंतु उसमें कुछ विलक्षणता अवश्य है।

उस रीति का उल्लेख करना यहाँ उपयोगी नहीं है। प्रसंग वश इतना ही कहा जा सकता है कि गोचर फलादेश में वे लोग जन्म चंद्र के बजाय जन्म सूर्य से ग्रहों की तत्कालीन स्थिति का विचार कर फल निरूपण करते हैं। जो स्पष्टतया हमारी भारतीय प्रणाली से स्थूल है।

क्योंकि सूर्य एक राशि में एक माह रहता है और चंद्र केवल ढाई दिन ही। अतः जहाँ हमारे यहाँ ढाई दिन के अंतर पर पैदा हुए बच्चे का गोचर फलादेश में कुछ विषयों की समानता रहेगी, वहाँ उनकी रीति से पूरे 30 दिनों के अंदर उत्पन्न व्यक्तियों के लिए ऐकसा ही फलादेश रहेगा।

अतः वह निश्चय ही बहुत स्थूल होगा। यही कारण है कि अब वे गोचर प्रणाली के बजाय एक नई प्रणाली ‘‘प्रागे्रस सिस्टम’’ को विशेष रूप से अपना रहे हैं।

भारत में विद्वानों ने कहा है कि प्रत्येक ग्रह जब जन्म राशि में पहुँचता है अथवा जन्मराशि से द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठम, सप्तम, अष्ठम, नवम, दशम एकादशम या द्वादश में पहुँचता है तब जातक के जीवन में अपने अपने गुणों और दोषों का प्रभाव अपनी तात्कालिक स्थिति के अनुसार डालता है। इसी को गोचर का फल कहते है।

शनि का विशेष गोचर विचार

शनि का प्रभाव अन्य ग्रहों की अपेक्षा कुछ विशेष देखने में आता है। शनि बुरे स्थान में होने से कोई बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है तो सबसे अधिक समय तक शनि के प्रभाव से ही दुख भोगना पड़ता है। इस प्रकार शनि लगातार ऐसी 3 राशियों में रहता है जिनका प्रभाव जातक पर बुरा पड़ता है तो लगातार साढे़ सात वर्षों तक शनि का बुरा प्रभाव जातक के जीवन पर पड़ता है। उस समय

शनि की साढ़ेसाती

जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर हेा उसे जन्म राशि कहते हैं यह तो उपर हमने समझ ही लिया है। जब शनि अपनी जन्म राशि के समीप की राशि पर आता है तो वह पीड़ा देना आरम्भ करता है।

यह राशि जन्म राशि से बारहवीं होती है। वह वहाँ ढाई वर्ष रहता है तो यहाँ से अगले ढाई वर्ष के लिए जन्म राशि पर आता है इसे सिर पर आई या नेत्र पर आई साढ़े साती कहते हैं।

शनि जब जन्मराशि और उसके अंश पर आता है तो साढ़े साती का मध्य भाग होता है उस समय शनि उदर में आया कहते हैं।

तदुपरांत अगले ढाई वर्ष के लिए दूसरे स्थान की राशि पर चंद्र जन्म अंश के बराबर आता है तो इसे शनि की उतरती हुई साढ़े साती या पैरों पर आई साढ़ें साती कहते हैं।

यहाँ मेरा अपना सुझाव है कि शनि जब बारहवे आए तो वह तो अशुभ स्थान है ही लेकिन पहला और दूसरा भाव तो शुभ स्थान है। इसलिये शुभ और अशुभ स्थान का समन्वय करते हुए और अष्टक वर्ग की 4 से अधिक शुभ रेखाओं को ध्यान में रखते हुए और कुंडली में शनि के भाव स्वामित्व, भाव स्थिति और नवांश में शनि का स्थान कहाँ है, को ध्यान में रखते हुए फलादेश करना विशेष योग्यता को दर्शायेगा।

इस काल में नाना प्रकार के कष्ट और भिन्न मनुष्यों को जन्म कुण्डली के अनुसार शनि के प्रभाव से भिन्न भिन्न प्रकार की आफतें आती हैं। इस में किसी की मृत्यु होती हैं किसी का घर जलता है। किसी की जीविका जाती है। इत्यादि अनेक प्रकार के संकटमय प्रसंग आते हैं। लेकिन विशेष परिस्थिति में यह कभी कभी शुभ फल भी देता है। जब शनि की अशुभ साढ़े साती हो तो लोहे की अंगूठी पहननी चाहिए, शनि की उपासना करना जप दान आदि करना चाहिए।

यहा मेरा अपना सुझाव है कि जातक को संकट काल में दुर्गा सप्तशती में से ‘‘सिद्ध कुंचीकास्तोत्रम का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ या 108 बार गायत्री मंत्र’’ का जाप करना चाहिए।

किसी भी मनुष्य के जीवन में साढ़े साती तीन बार ही आती है। चैथी साढ़े साती बहुत कम देखने में आती है।क्योंकि 120 वर्ष आयु अब नहीं होती है।

शनि की साढ़ेसाती का शुभाशुभ फल जो मिलता है वह इस प्रकार है।

राशि समय और प्रभाव.
1 मेष – बीच के ढाई वर्ष अनिष्ट 2 वृष-आरंभ के ढाई वर्ष अनिष्ट 3 मिथुन’ अन्त के ढाई वर्ष अनिष्ट

4 कर्क- पहिले ढाई वर्ष अच्छे शेष अनिष्ट 5 सिंह अंत के ढाई वर्ष श्रेष्ठ

6कन्या-पहिले ढाई वर्ष अनिष्ठ

7 तुला अंत के ढाई वर्ष अनिष्ट 8 वृश्चिक-पहले ढाई वर्ष अच्छे फिर अनिष्ठ

9 धनु; अंत के ढाई वर्ष अच्छे शेष अनिष्ठ

10 मकर अंत के किंचित ढाई वर्ष अनिष्ठ 11 कुंभ सब अच्छा 12 मीन के अंतिम ढाई वर्ष अनिष्ट

विशेष अनुभव से सिद्ध होता है कि साढ़े साती का शुभाशुभ फल जातक के जन्म शनि के ऊपर निर्भर है।

12वंे स्थान में आता है तो शरीर कष्ट, अधिक खर्च व्यापार में अड़चन धन की हानि और शरीर नेत्र में पीड़ा करता है।

जन्म स्थान में आता है तो पेट में विकार, जमीन सम्पत्ति तथा पशु वाहन की हानि अधिकारियों से मनमुटाव और अपयश करता है।

दूसरे स्थानमें आता है तो बेकार आज्ञा, कुटुम्ब तथा शत्रु विरोध, कुटुम्ब वियोग, मार्ग में झंझट होते हैं।

शनि का स्वस्थान मकर और कुम्भ है। जब शनि अपने स्वस्थान या उच्च स्थान पर आता तो जन्म कुन्डली की स्थिति के अनुसार वह जातक को लाभ भी करता है।

ढैया शनि का विचार- जब शनि जन्म राशि से चौथे और आठवे स्थान में आता हैं तो जन्म कुंडली की स्थिति के अनुसार वह जातक की ढैया कहलाती है। इसमें शनि कष्ट देता है। जिसका फल इस प्रकार है।

चतुर्थ में – शरीर में तथा माता पिता को कष्ट, मार्ग की चिंता, सम्पत्ति संबंधि झंझटे, धन खर्च।

अष्टम में- शरीर व शत्रु भय, मानसिक चिंता और धन का अपव्यय। इस प्रकार सभी तरह से देख भाल कर ज्योतिषी केा शनि के बरे में विचार कर फल कथन करना उचित है।

शनि का चरण विचार

शनि जब एक राशि छोड़ कर दूसरी राशि में जाता है तो उस समय देखो शनि अपनी जन्म राशि से कितने स्थान में हैं, उसके अनुसार निम्नलिखित फल का विचार करना होता है।

1-6-11 स्थान में हो तो सुवर्ण पद फल सुख की वृद्धि

2-5-9 रजत पद फल हर्ष युक्त कर्म, फलप्रद

6-7-10 ताम्र पद फल मध्यम फल प्रद

4-8-12 लोह पद फल दुख दारिद्रय दायक।

तो इस प्रकार आपने सम्पुर्ण रूप से जाना की गोचर किसे कहते है? वैसे इस के अलावा भी ज्योतिष का गोचर विचरण प्रभाव बहुत विस्तृत है. यहाँ तो मात्र लघु रूप ही प्रस्तुत किया गया है.

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