कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान (Requirement of Kundali)

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कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान
कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान

सारा संसार चक्र ग्रह, राशियाँ, नक्षत्र , वनस्पति,हम, तुम सब ज्योतिष पर आधारित है लेकिन ज्योतिष किस पर आधारित है बताएँगे कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान में.

सबसे पहलें जरुरी ये होता है की जन्म का समय, जन्म का स्थान, और जन्म की तारीख, स्थानीय पंचांग, का ज्ञान,बस ये ही है कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान में. जातक के जन्म के समय ग्रह नक्षत्र की स्थिति पर से जीवन के सुख दुःख के फल का आकलन किया जाता है. आपके ज्ञान के लिए जन्म कुंडली निर्माण कतिपय आवश्यक बाते यहाँ वर्णन कर रहे है.

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(रोग का योग)

1- इष्टकाल

नव जन्मे बालक की कुंडली निर्माण के लिए सबसे पहले आवश्यक है की उसका इष्टकाल बनाया जाय, ये जितना शुद्ध होगा उतना ही फलित सही मिलेगा, सूर्योदय से जन्म समय तक के काल को इष्टकाल कहते है. जिस स्थान का इष्ट कल बना रहे है उस स्थान का सूर्योदय ठीक होना चाहिए। हर स्थानीय पंचांग में सूर्योदय सूर्यास्त दिनमान दिया होता है.

बाद में जन्म स्थान का देशांतर संस्कार करके कुंडली बनती है जन्म समय में से वहा का सूर्योदय घटा कर ढाई से गुना करके घटी पल बना लिए जाते है. प्राप्त फल इष्ट काल कहलाता है। (समय की जानकारी के लिए रेलवे समय का उपयोग करना चाहिए।) जैसे 1 से लेकर 24 घंटे।

भयात भभोग का साधन

स्थानीय पंचांग से जन्म का नक्षत्र देखकर उसका कितना समय का कुल मान कितना था को ज्ञात कर जन्म समय में से घटा का कर बाकी बचे मान को ढाई से गुना कर के घटी पल बनाकर उसे दो जगह लिख लेना चाहिए एक स्थान पर इष्ट काल जोड़ दे ये भयात कहलाएगा और दूसरी जगह जन्म नक्षत के घटी पल जोड़ दे ये भभोग कहलाएगा। (ये केशवीय पद्धति से है लेकिंन हमने अपनी पोस्ट में आधुनिक तरीका बताया है )

लग्न का निर्धारण

देखे की जब जन्म हुआ उस समय पूर्व में किस राशि का उदय हो रहा था वही बालक की जन्म लग्न राशि कहलाती है. सारी कुंडली का आधार ये जन्म लग्न ही है. शास्त्रानुसार लग्न गणित करके लग्न निकालना चाहिए।

ग्रह स्पष्ट करना

यहाँ तक बालक के इष्ट काल का लें निर्धारन हो गया भयात भभोग सिद्ध हो गया , वह लिख लिया अब इसके बाद ग्रह स्पष्ट कर लेने चाहिए ग्रह स्पष्ट से अर्थ है उनके राशि मान क्या होंगे? कौन सा ग्रह कितने राशि अंश कला विक्ला का है का ज्ञान ही बताता है कि ग्रह कहा है. अत: जन्म कुंडली में ग्रह स्पष्ट लिखना आवश्यक है.

पंचांगों में सुबह के 5 .30 के ग्रह स्पष्ट दिए होते है साथ ही वही पर आपके जन्म समय तक कितना समय व्यतीत हुआ है के आधार पर गणित करने की विधा भी दी होती है.यदि वहां न मिले तो आपको एक पुस्तक का सुझाव देता हूँ जिससे कुछ ही क्षणों में ग्रह स्पष्ट हो जाएंगे

( इस पुस्तक के दवारा आप मिंटो में ग्रह स्पष्ट, भाव स्पष्ट , विंशोत्तरी दशा, कुंडली निर्माण करना सीख सकते है. )

वैसे आपको अपने पास एक अच्छा पंचांग रखना चाहिए जिससे दैनिक ग्रहो लग्नो आदि की जानकारी मिल सके

जन्मपत्री लिखने की विधि

जन्म पत्री में सर्प्रथम गणेश वंदना के श्लोक लिखे जाते है जो की परम्परागत विधान है। बाद में किस सम्वत, मॉस पक्ष , किस तिथि , किस चंद्र वार में, किस नक्षत्र में , किस इंग्लिश तारीख में , किस समय में (सुबह, शाम, दिन , रात ) में जन्म हुआ. फिर पंचांग की सहायता से जन्म दिन की तिथि, घटी पल मान , योग घाटी पल मान, उस दिन का सूर्योदय, सूर्यास्त, का समय दिनमान , रात्रि मान आदि लिखे जाते है.

बालक का जन्म लग्न कौन सा है. उसका मान लिखना होता है. सूर्य उत्तरायण है या दक्षिणायन है ऋतु , संवत्सर , बच्चे के दादा, पिता, माता का नाम वै किस जाती धर्म के है.किस स्थान के निवासी हैः जिला , निवास स्थान, प्रान्त के निवासी है

जन्म कालीन नक्षत्र चरण, कौन से पाए में जन्म हुआ है. ये सब लिखे,जन्म कालीन नक्षत्रनुसार किस ग्रह की दशा चल रही थी। नव ग्रह चक्र लिखने के बाद जन्मांग कुंडली बनानी चाहिए, जैसे हमने ऊपर बनाकर दिखा रखी है. ये साधारण जन्म कुंडली टेवा है,(आवश्यक प्रथम सूचि पत्र)

भाव स्पष्ट लिखना

आगे कुन्डली मे भाव स्पष्ट चक्र बनाना चाहिए, -भाव स्पष्ट से मतलब जन्म समय पर लग्न कितने अंशो का था, दशम भाव कितने अंशो का था, बाकी भाव कितने अंशो के थे।इसके बाद में ग्रह स्पष्ट चक्र बनाना चाहिए जिससे पता लगे की ग्रह वास्तव में किस भाव में है. यानि भाव मध्य में है शुरू अंशो में है या अंशो में है.

तदुपरांत चलित चक्र बनाना चाहिए जिससे पता लगे की ग्रह उसी भाव में है या अगले पिछले भाव में है क्योंकि जिस भाव में ग्रह होगा वास्तव में ग्रह को फल उसी भाव का देना होता है राशि स्थित भाव का नहीं। इसीलिए भाव और ग्रह स्पष्ट किये जाते राशि स्पष्ट नहीं की जाती राशि तो केवल ग्रह की शक्तिके बारे में बताती है की वह उच्च है, नीच है या स्वग्रही है, मित्र या शत्रु ग्रही है,

इसके बाद लग्न कुंडली की दशवर्ग कुण्डलिया भी बनानी चाहिए,इन्हे बनाने की रीति भी बहुत आसान है कुंडली में ग्रह के आधार पर पंचांग में टेबल दी होती जिसमे ग्रह अनुसार मिलान करके सहायक कुण्डलिया बना लेनी चाहिए,जो की इस प्रकार से है होरा कुंडली , नवमांश कुंडली,सप्तांश कुंडली ,द्रेषकाण कुंडली दशमांश कुंडली, द्वादशांश कुंडली, षोडशांश कुंडली, त्रिशांश कुंडली,

दशाओ का निर्धारण

जमकुन्डली बना लेने के बाद आपको चंद्र नक्षत्र के आधार पर ग्रहो के दशा का भी निर्धारण करना होता है. दशाए भी तीन प्रकार की होती है.

1 विंशोत्तरी दशा 2 अष्टोत्तरी दशा ,3 योगिनी दशा

मुख्यत विंशोत्तरी दशा का ही प्रचलन है. विंशोत्तरी दशा का मान 120 वर्षो का माना गया है,जिसमे सूर्य दशा 6 , चंद्र दशा 10 वर्ष,मंगल दशा 7 सात वर्ष,राहु दशा 18 वर्ष, गुरु दशा 16 वर्ष, शनि दशा 19 वर्ष बुध दशा 17 और शुक्र 20 वर्षों की दशाए होती है.

कही कही प्रथानुसार सुदर्शन चक्र कुंडली भी बनाई जाती है इसमें चंद्र को लग्न मान कर बाकी ग्रह यथावत रखे जाते है. इसमें तीन कुण्डलिया एकसाथ चलती है प्रथम सूर्य को लग्न मान कर, मध्य में चंद्र को लग्न मान कर, फिर लग्न कुंडली को बना दिया जाता है. सुदर्शन चक्र कुण्डली का फल तीनो लग्नो की तुलना करते हुए देखा जाता है.

तो इस प्रकार आपने जानो की कुंडली निर्माण-जरुरी ज्ञान में इस प्रकार से कुंडली का निर्माण और अन्य भाव विशोत्तरी दशा आदि को किस क्रम वार से लिखते है.

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बनी हुई कुंडली को देखन या कंप्यूटर से कुंडली बनाना एक ही बात है लेकिन अपनी कुंडली बनाओ इसको यहाँ बताना हमारा उद्देश्य है.