कुंडली की जानकारी

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कुंडली जानो
कुंडली की जानकरी
कुंडली जानो
1कुंडली की जानकरी

जन्म कुंडली एक पृथ्वी पर एक निश्चित स्थान पर निश्चित समय के लिए आकाशिय ग्रहो का मानचित्र होता है. इस विषय को ही कुंडली की जानकरी से जानेंगे .

बच्चे के जन्म के समय जो राशि पूर्वीय क्षितिज पर उदय हो रही होती है उसे हम लग़न के रूप में या प्रथम भाव के रूप में जानते है नीचे इस विषय को कुंडली की जानकारी के अंतर्गत एक चित्र के माध्यम से बताया गया है. यहाँ एक से लेकर बारह तक जो संख्या लिखी है उसी को भाव या भर के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसी को हम हर जगह विश्लेषित करेंगे भारतीय प्रायद्वीप में कुंडली के अनेक रूप प्रचलित है लेकिन उनमे से केवल तीन ही रूप मुखत प्रचलित है जिनमे से एक है उत्तर भारतीय प्रारूप जो की साथ में दिख रहा है दूसरा है दक्षिण भारतीय प्रारूप और तीसरा है बंगाली प्रारूप ये दोनों नीचे मिलेंगे

कुंडली की जानकारी (बंगला)
2कुंडली की जानकारी (बंगला)
कुंडली की जानकारी (बंगला)
3कुंडली की जानकारी (दक्षिण भारतीय )

ऊपर (1) में उत्तर भारतीय जन्म पत्रिका का रूप स्वीकार्य है. जहा एक लिखा है वह लग्न कहलाता है. और इस प्रकार 2 -3-4 से लेकर 12 तक भाव या घर होते है. भावो को घड़ी सुइयों की दिशा के विपरीत देखते जाना होता है.भावो की क्रम संख्या कुंडली मे नहीं लिखी जाती भावो की स्थिति fix मान ली जाती है.

किसी भी भाव में जो राशि होती है उसमे उस राशि की संख्या लिख दी जाती है.

हमने देखा की जहा Ascendant में 1 लिखा है वह राशि मेष राशि है इस लिए मेष लगन की कुंडली बनी हुई है.

दक्षिण भारत की कुंडलियो में राशिया स्थिर रखी जाती है जबकि भाव चलते रहते है. जैसे ऊपर बाये हाथ के कोने वाले भाव में मीन राशि फिर मेष राशि इसी प्रकार सभी राशि स्थिर रहती है.जिस राशि को लग्न बनाया जाता है वहा लग्न लिख दिया जाता है या पहचान के लिए वहां एक लघु वर्ग बना देते है. फिर वाम दिशा अनुसार भावो का क्रमांकन स्वत हो जाता है.

जन्मपरी के दुसरे प्रारूप का प्रयोग बंगला व् उसके आस- पास के क्षेत्रो में किया जाता है. इसमें ऊपर कुंडली के मध्य भाव में मेष राशि और फिर दक्षिण की और चलते हुए वृष मिथुण आदि राशिया लिख दी जाती है. जन्म समय जो राशि लग्न बनती है वहां दो सामानांतर तिरछी रेखा खिंच दी जाती है. बाद में ग्रेह स्पष्ट करके उन्हें कुंडली में स्थापित कर दिया जाता है.

ज्योतिष में काल पुरुष को 12 राशियों व् 12 भावो में बांटा गया है जबकि भाव स्थिर होते है. व् सुविधा अनुसार राशियों को चलायमान माना गया है. किसी भाव के कार्य को करने वाले ग्रह को कारक ग्रह कहा जाता है. भाव से भाव का कार्य चिन्हित होता है.

प्रत्येक भाव मनुष्य के किसी अंग या मनुष्य के जीवन की किसी विशेष परिस्थिति को लक्षित करता है. जिस प्रकार बीमार होने पर किसी मनुष्य का x-ray लेकर किसी अंग विशेष को देखा जाता है उसी प्रकार भाव द्वारा भी किसी अंग या घटना विषय विश्लेषण किया जाता है.इस प्रकार भाव के विषय, भाव में स्थित राशि के विषय, और भाव में स्थित ग्रह के विषय मिलकर भाव का भाव फल उत्पन्न करते है.

इस प्रकार हमने यहाँ तक जाना की राशिया बारह होती है और भाव भी बारह होते है. हम आगे देखेंगे की बारह भावो द्वारा कोन से विषयों के बारे में हम कुंडली विषय विश्लेषण कर सकते है.जब किसी भाव में जो राशि होती है उस राशि के स्वामी ग्रह को भावेश कहते है. जैसे यदि सातवे भाव में सिंह राशि हो तो सप्तम भाव का स्वामी सूर्य कहलाएगा.

जातक

जिस व्यक्ति की कुंडली का अध्ययन किया जाना है उसके लिए ज्योतिष में जातक शब्द का प्रयोग किया जाता है.

भाव जनित संज्ञाए

जन्म कुंडली में लग्न को केंद्र बिंदु मान कर बाकी भावो(Houses) को धर्म , अर्थ, काम , मोक्ष के आधार पर भारतीय ऋषियों ने अनेक वर्गों में बनता हुआ है जैसे –

भावो की संज्ञाभाव (हाउसेस)
धर्म1-5-9
अर्थ2-6-10
काम3-7-11
मोक्ष4-8-12
केंदर भाव1-4-7-10
त्रिकोण भाव1-5-9
पणफर भाव2-5-8-12
अपोक्लिम भाव3-6-9-12
चतुरस्त्र भाव4-8
उपचय भाव3-6-10-11
अन उपचय भाव1-2-4-5-7-8-9-12
दुष्ट भाव6-8-12
पतित भाव6-12
मारक भाव2-7
आयु भाव3-8

कारक , अकारक, बाधक ग्रह.

चर लग्न 1,4,7, 10 में 11 वा भाव बाधक होता है, स्थिर लग्न 2-5-8-11-में 9वा भाव बाधक होता है. द्विस्भव लग्न 3-6-9-12 में 7वा भाव बाधक होता है.

लग्नयोगकारकअकरकबाधक
मेषसूर्यसूर्यशनि
वृषशनिगुरुशनि
मिथुनबुद्धमंगलबुध
कर्कमंगलबुधशुक्र
सिंहमंगलशनिमंगल
कन्याबुधमंगलGURU
तुलाशनिगुरुSURY
वृश्चिकचन्द्रबुधचन्द्र
धनुगुरुशुक्रबुध
मकरशुक्रगुरुमंगल
कुंभशुक्रचन्द्रशुक्र
मंगलगुरुशुक्रबुध

ग्रह परिचय -इसी क्रम को बनाए रखते हुए आगे ग्रहो का परिचय पोस्ट को भी देखे

अब हम आगे आपको ग्रहो का उच्च नीच अंशो में होना TABLE द्वारा दिखाएंगे

ग्रहउच्च राशिअंशनीच राशिमूल त्रिकोण राशिअंश
suryमेष10तुलासिंह11-20
चन्द्रमावृष3वृश्चिकवृष4-20
मंगलमकर28कर्कमेष0-12
बुधकन्या15मीनकन्या16-20
ब्रहस्पतकर्क5मकरधनु0-10
शुक्रमीन27कन्यातुला0-15
शनितुला20मेषकुम्भ00-20-
राहूमिथुन15धनुकन्या00-15
केतुधनु15मिथुनमीन00-15

ज्योतिष में ग्रहो की दो प्रकार की गतिया मानी गई है एक हे वक्र गति और दूसरी है मार्गी गति इन गतियो के आधार पर ही ग्रह सूर्य से निम्न राशि अंशो पर आकर उदय अस्त होते है.

ग्रहचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मार्गी direct+- 12+-17+-14+-11+-10+-16
वक्री retro+- 8+- 12+-11+- 8+- 16

ग्रहो के आपसी सम्बन्ध

ग्रहो में 5 प्रकार के आपसी सम्बन्ध होते है जिनका वर्णन हमने अपनी एक पोस्ट में कर रखा है

दृष्टि

इसी प्रकार से ग्रहो की दृष्टिया भी होती है सूर्य, चन्द्रमा,बुध, शुक्र की अपने स्थित स्थान से सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि होती है, मंगल की अपने स्थित स्थान से 7 के अलावा चोथे व् आठवे स्थान पर भी दृष्टि होती है. गुरु की अपने स्थित स्थान से 5 व् 9वे स्थान पर पूर्ण दृष्टि होती है. और शनि की अपने स्थित स्थान से तीसर और दसवे स्थान पर पूर्ण दृष्टि होती है.

कारकत्व Significator

ज्योतिष में सब ग्रहो को उनके लिए कुछ निश्चित कामो को सोंप रखा है , जोकि इस प्रकार से है

सूर्य को- 1 अर्थात तनु भाव

गुरु को 2 धन भाव

मंगल को 3 सहज भाव (भाई -बहन)

चन्द्रम को 4 सुख भाव

गुरु को 5 संतान भाव

शनि को 6 शत्रु भाव

शुक्र को 7 पत्नी अर्थात काम भाव

शनि को 8 आयु भाव

गुरु को 9 धर्म,पिता , भव्य भाव \

बुध को 10 कर्म भाव

गुरु को 11 आय भाव

शनि को 12 व्यय भाव

इसी क्रम में आप हमारी पोस्ट राशि परिचय , ग्रहो के परिचय , भावो के परिचय , कुंडली बनाने के तरीके , अष्टक वर्ग बनाने के तरीके, गोचर विचार , कुंडली देखने के तरीके को पढ़ कर कुंडली वचन में प्रवीणता प्राप्त कर सकते है.

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