उलझन की सुलझन

दोस्तों ज्योतिष बड़ा कठिन विषय है यहाँ एक नियम दूसरे को काटता जान पड़ता है, इस उलझन की सुलझन क्या है यहाँ जाने?

शंका 1 उलझन की सुलझन

उलझन की सुलझन सुलझाते हुए कई बार मै स्वयं उल्जन में पड़ जाता हूँ.एक सज्जन ने पुछा कि ज्योतिषिय ग्रंथो में लिखा है की जिस भाव का स्वामी अपने भाव को देखता हो उस भाव की उन्नति होती है, दूसरी और ये भे कहा गया है कि जो भाव् स्वामी अपने भाव से 6 – 8 – 12 में होता है उस भाव की हांनी होती है. ऐसी अवस्था में अगर दूसरे भाव का स्वामी अष्टम में हो तो क्या फल होगा?

उलझन सुलझन
उलझन सुलझन

ज्योतिष में ऐसी स्थिति में उलझन की सुलझन समाधान किया गया है की पहला नियम दुसरे को override कर जाएगा यानि लाँघ जाएगा. द्वितीयेश अष्टम में होकर माँ के भाई को आयु की हानि पहुंचाएगा ‘होराशातक ‘ में भी लिखा है की कोई पापी ग्रह (6-8-12 का स्वामी)का अपने भाव को देखना अच्छा है लेकिन उम्र के लिए ठीक नहीं.

ऐसे ही उलझन की सुलझन सुलझाते हुए होराशतक में लिखा है की यदि नैसर्गिक पापी ( सूर्य,शनि, मंगल, रहू, केतु ) 11 वे का स्वामी 5 में स्थित होकर ग्यारहवे को देखे तो बड़े भाई की आयु की हानि होती है. भले ही लाभ के रूप में ये स्थिति अच्छी है.

शंका -2 उलझन की सुलझन

जिस घर का स्वामी नीच होता है उसके घर के हानि होती है. यहाँ नीच लग्नेश शनि चतुर्थ भाव में है तो भला लग्न को कैसे उन्नति देगा?

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन

पहले वाले नियम को यहाँ भाई लागू करना होगा.ऐसी स्थिति में शनि लग्न को लाभ पहुंचाएगा क्योकि वेह 10 दृष्टि से लग्न को देख रहा है. यानि धन प्रसिद्धि सब कुछ. पर कुछ अंशो में स्वस्थ में कमी नाडी सम्बन्धी जन्घो में दर्द आदि देगा.

शंका -3 उलझन की सुलझन

ज्योतिष ग्रंथो में कहा गया है की जो ग्रह शत्रु राशी में उसके भाव की हानि होती है. फिर जोग्रह अपने भाव से शत्रु भाव में बैठ कर देखता है जैसे सूर्य कुम्भ में स्थित हो कर सिघ राशी स्थित घर को देखेगा तो ऐसी अवस्था में किस फल को लागू करेगे ?

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन

ऐसे स्थिति में पहला नियम प्रभावी होगा इस स्थिति में शत्रु राशी में स्थित होने का कोई दोष नहीं लगेगा. अत: कुम्भ में स्थित सूर्य यदि सप्तम में हो तो राज्य के प्राप्ति यश धन प्रसिद्धि सब की प्राप्ति होगी.

एक भुक्त भोगी का विवरण

बुध दशा में निम्नोक्त जातक बहुत दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा था.बुध ऐसे दो घरो का स्वामी है जिनका सम्बन्ध लक्ष्मी से जुडा है; यानी दो और ग्यारह लक्ष्मी स्वामी बुध का सम्बन्ध 6 भाव में राहू जैसे ग्रह से है उस पर भी चोथे भाव स्थित शनि की दृष्टि बुध पर है किसी शुभ ग्रह की दृष्टि बुध पर नहीं है. अत : ये स्पष्ट हुआ की बुध की दशा में आर्थिक हानि होगी.

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन

अब बाकी रही सही कसर मंगल के नाक्षत्र धनिष्ठा ने पूरी कर दी जिसमे बुध स्थित है.इस तरह मंगल बुध की हालत ख़राब करने का कारन बना. एक तो बुध छठे भाव में फिर शनि की दृष्टि ऊपर से मंगल का नक्षत्र जो की बुध का शत्रु है. इस कारन स्पष्ट है की जातक को शत्रुओ द्वारा आर्थिक हानि पहुंचाइ जाएगी.

जब किसी पापी ग्रह की दशा होती है और वह लग्न को पीड़ित करता हो और फिर लग्नेश के भी नक्षत्र में हो तो तो वह शरीर संबधी हानि या पीड़ा को बढ़ाता है.

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन

निम्नोक्त कुंडली वाले जातक की मृत्यु शनि की दशा में हुई थी . देखने से पता चलता है की शनि कर्क लग्न के लिए हानि प्रद है. क्योंकि ये दो मारक भावो 7-8 का स्वामी भी है. शनि रोहिणी नक्षत्र में स्थित होकर जो की चन्द्र का नक्षत्र है लग्न स्थित चन्द्र को 11 वे भाव से तृतीय दृष्टि से देख रहा है इस प्रकार नक्षत्र में स्थित हो कर भी पापी ग्रह नक्षत्र स्वामी के भाव को हानि पहुंचाते है.

JLNehru एक उदाहरण

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन(नेहरु)

इनका जन्म बुध की विंशोत्तरी महादशा में (13 -7-6 दिन शेष )रहते रात ग्यारह बजकर कुछ मिनट पर 14-11-1989 को इलाहाबाद में हुआ था इनकी मृत्यु राहू में केतु की अंतर दशा में हुई थी जो पापी ग्रह जन्म लग्न चन्द्र लग्न को पीड़ित करते है वो अपनी दशा में मृत्यु देते है.

लग्न और 8 आयु भाव आयु के द्योतक है. राहू 12 वे भाव से अष्टम भाव को अपनी नवम दृष्टि से देख रहा है. और केतु आयु भाव के स्वामी शनि को नवम दृष्टि से शनि को देख रहा है राहू की स्थिति लग्न के एक और है तो केतु की दृष्टि लग्न के दूसरी और इस प्रकार रहू केतु के प्रभाव में लग्न लग्नेश चन्द्र चंद्रेश है. जो की नेहरु जी की मृत्यु के प्रमुख कारन बने.

शंका 4

-यदि किसी कुंडली में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही उच्च हो तो कोन बलि माना जाएगा.

ऐसे में शास्त्रों में चन्द्र को निर्बल मानने की प्रथा है.

शंका 5

पराशर और फलदीपिका कर मन्त्रेश्वर का दवाद्शेष को लेकर मतभेद है . एक पराशर परिस्थिति अनुसार फल की बात करते है और मन्त्रेश्वर का कहना है ये जहा जाएगा उस भाव की हानि करेगा.

मेरा मानना है की दवाद्शेष मुख्यतः व्यय का करक है. कुंडली में यदि सबल व्ययेश होगा तो धन व्यय करने के अवसर भी अन्य ग्रह उपलब्ध करवा देंगे यदि निर्बल होगा तो अन्य ग्रह सबल होते हुए भी कोई अवसर उपलब्ध नहीं करवाएँगे . यहाँ पराशर मत ही लगू होता है.

शंका 6

षष्ठ स्थान उपचय स्थान है और दुःख स्थान भी है जबकि कोई ग्रह षष्ठ में पड़े तो अपने भाव की हानि करता है, पापी ग्रहो की यहाँ स्थिति शुभता वाली मानी गई है तो उन भावो का क्या होगा जिनके वे स्वामी है?

ऐसे में दोनों स्थितियों का ध्यान रखना होगा, नैसर्गिक शुभ हो या पापी दोनों ही अपने भावो को ख़राब करते है लेकिन यहाँ बैठ कर अपने ही भाव को देखे तो स्वभाव के लिए शुभ ही होगा.अष्टमेश नवमेश शनि यदि तीसरे भाव से नवम को देखेगा तो नवं की तो वृद्धि करेगा ही अष्टम को भी शुभता देगा.

शंका 7

ग्रहो को नैसर्गिक शुभ अथवा पाप माना गया है, ये भी कहा जाता है की ग्रह अपने भाव का शुभ फल करते है. ऐसे में ग्रहो की प्राकृतिक शुभता अशुभता का क्या लाभ?

ऐसा नहीं है की ग्रह सदा अपनी शुभता अशुभता को खो देते है. बल्कि लघु पाराशरी अनुसार यो समझे की ग्रह यदि शुभ है और केन्द्रों का स्वामी है तो अशुभ नहीं रहता है और अशुभ ग्रह यदि केन्द्रधिपति है तो शुभ हो जाता है. बाकी ज्योतिष बोद्धिक कोशल पर निर्भर है.

शंका 8 उलझन की सुलझन

उलझन की सुलझन
उलझन की सुलझन

ग्रह यदि शुभ वर्गों में शुभ हो जाते है तो ऐसे में नैसर्गिक पपत्व शुभत्व,स्वामित्व से क्या प्रयोजन है.

ग्रह शुभ वर्गों में होने पर बलवान हो जाते है न की शुभ. फल फिर भी स्वामित्व पर ही निर्भर है. पराशर मतानुसार पापी (कुम्भ लग्न में मंगल) शुभ वर्गों में हो तो उल्टा बुरे फल ही करता है.

शंका 9

कहा ये जाता है की शनि दशम में अशुभता का निवारण करता है, लेकिन तीसरी स्थान से वह भाई सहस भाग्य दह्र्म पुत्र आदि को दृष्टि द्वारा हानि पहुंचाएगा तो फिर वो शुभ कैसे हुआ?

जब हम कहते है के शनि तितीय स्थान में शुभ फल देगा तो इसका मतलब होता है की शनि जिन शुभ भावो का स्वामी होता है उन भावो का शुभ फल करता है. नाकि जिन भावो पर दृष्टि दाल रहा है उन भावो का भी शुभ फल करेगा. उनकी तो वह हांनी ही करेगा.

शंका 10 कहा गया है की सब भावो से सप्तम स्थान उनके विपरीत संबंधो का होता है सप्तम भाव पति या पत्नी के रूप में प्रसिद्द है. तो क्या कारण है की दशम से चतुर्थ तो माता का स्थान है लेकिन दशम को पिता का स्थान नहीं माना जाता ?

पंचम भाव पुत्र स्थान होता है . अत लग्न नवं से ही पंचम बनता है. इसलिए नवं भाव ही पिता स्थान है.इससे अधिक शास्त्रों में वर्णन नहीं मिलता है.

शंका 11

कंद्र और कोण में ग्रह शुभ फल देते है और इसी प्रकार 6-8-12 में अशुभ फल देते है. दुसरे भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो कैसा फल होगा.

ऐसी स्थिति में दोनों प्रकार का प्रभाव समझना चाहिए.अर्थात एक प्रकार से बल अथवा शुभता की प्राप्ति और दूसरी और निर्बलता और अशुभता के प्राप्ति. निष्कर्ष रूप में फल माध्यम होगा.

ज्योतिष एक अथाह सागर है यहाँ केवाल नियम ही नहीं बोद्धिक कौषल की ज्योदा जरुरत होती है अत : आपसे मेंरा परामर्श है की ज्योतिष की उलझन की सुलझन को सुलझाने के लिए सभी नियमो को भली प्रकार अवलोकन करना चाहिए.

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