आइये ज्योतिष जाने

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आइये   ज्योतिष जाने
आइये ज्योतिष जाने

नमस्कार
जिस प्रकार मयूरो की शिखा,नागो की मणियाँ उनके शिखर को शोभित करती है ,उसी प्रकार वेदों में ज्योतिष शास्त्र सबसे ऊपर है तो आइये ज्योतिष जाने.

दोस्तो आपको ये तो पता ही होगा की हमारा भारत देश प्राचीन काल से ज्ञान का अक्षय भंडार रहा है। उस अक्षय ज्ञान को भंडारित करने मे यहा के ऋषि मुनियो का शेष योगदान रहा है। उसी ज्ञान मे ज्योतिष एक महत्वपूर्ण उपयोगी विषय है । तो फिर आइये ज्योतिष जाने.

वेद के छह अंगो

वेद के छह अंगो मे ज्योतिष चतुर्थ अंग है जिसे नेत्र कहा गया है ।

अन्य अंगो मे शिक्षा है नासिका, व्याकरण मुख है, निरुक्त कान है , कल्प हाथ है , छ्ंद चरण है । यह विद्या भारत मे प्राचीन काल से चली आ रही है।

लोकमान्य बालगंगा धर तिलक की कृति ‘वेदांग ज्योतिष’ से इसकी प्राचीनता का पर्याप्त परिचय मिलता है वेदिक कालीन महर्षियों को तारामंडल की गतिविधियो का पूर्ण ज्ञान था इसमे संदेह नहीं।

ब््रााह्मण ग्रंथों में ज्योतिष संबंधी प्रसंग बिखरे पड़ें हैं साम ब्राह्मण के छांदोग्य भाग में नारद सनतकुमार संवाद है जिसमें चैदह विद्याओं का उल्लेख है। इनमें 13वीं नक्षत्र विद्या है।

सूर्य सिद्धांत -आइये ज्योतिष जाने

इसमें सिद्धांत ज्योतिष की प्रायः सभी बातों का उल्लेख है। इनमें। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सूर्य, पृथ्वी, दिन तथा रात्रि के संबंध में जो चर्चा मिलती है उससे ज्ञात हेाता है कि प्राचीन काल में भी भारतवासी ग्रहों और ताराओं के भेद को भली भांति जानते थे।

फलित ज्योतिष में विश्वास न रखने वाले विद्वान सिद्धाँत ज्योतिष की अपेक्षा फलित ज्योतिष को अर्वाचीन ना मानते हुए झूठा कहते है। किन्तु रामायण एवं महाभारत के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उस काल में भी फलित ज्योतिष का बहुत प्रचार था।

महाभारत के अनुशासन पर्व में समस्त नक्षत्रों का उल्लेख पाया जाता है और बताया गया है कि भिन्न-भिन्न नक्षत्रों पर दान आदि देने से किस प्रकार से व्यक्ति विशेष का भला हो सकता है। भिष्म पर्व में उत्तरायण और दक्षिणायण पर्व में मृत्यु हो जाने के फल कहे गए हैं। वहीं 27 नक्षत्रों के 27 भिन्न भिन्न देवताओं का वर्णन है और देवताओ के स्वाभावानुसार नक्षत्रों का गुण अवगुण बताया गया है।

आइये ज्योतिष जाने

महाभारत के उद्योग पर्व अध्याय 146 में ग्रहों और नक्षत्रों के अशुभ योग विस्तारपूर्वक कह गये है। श्रीकृष्ण ने जब कर्ण से भेंट की तब कर्ण ने ग्रह स्थिति का इस तरह से वर्णन किया ‘‘उग्र शनि रोहिणी नक्षत्र में मंगल को पीड़ा दे रहा है। ज्येष्ठा नक्षत्र में मंगल वक्री होकर अनुराधा नक्षत्र से मिलना चाहता है।महापात संज्ञक ग्रह चित्रा नक्षत्र को पीड़ा दे रहा है। चंद्र के चिन्ह बदल गये हैं और राहू सूर्य को ग्रसना चाहता है।’’

भीष्म पर्व में फिर से अनिष्टकारी ग्रह स्थिति देखते हैं 14-15 और 16 दिनों के पक्ष होते हैं किंतु 13 दिनों का पक्ष इसी समय आया है। इससे भी अधिक विशेष बात यह है कि एक ही मास में चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का योग है। वह भी त्रयोदशी के दिन। महाभारत के इन तथा अन्य प्रसंगों से ज्ञात होता हैं कि नाना प्रकार की कठिनाइयों के लिए ग्रहों की चाल को कारण माना जाता है।

लोगों का विश्वास था कि व्यक्ति विशेष के सुख दुख व जीवन मरण भी संबंध भी ग्रहों तथा नक्षत्रों की गति से संबद्ध हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक तारागणों के प्रभाव से परिचित हैं समुद्र में ज्वार भाटा का कारण चंद्रमा का प्रभाव है। जिस प्रकार चंद्रमा समंुद्र के जल में उथल पुंथल कर देता है। उसी प्रकार वह शरीर के खून में भी अपना प्रभाव डालकर दुर्बल मनुष्य रोगी बना देता है। सूर्य चंद्रमा का प्रभाव न केवल मनुष्यो पर बल्कि वनस्पति, जानवरो में कुत्ते बिल्लियों की काम वासना पर भी पड़ता है इसे हमे समय विशेष आने पर देखते भी हैं।

इसी प्रकार आप से मेरा अनुंरोध है कि आप मेरी पोस्ट पढ़तें जाइये और ज्योतिष संबंधि ज्ञान का लाभ उठाते जाइये और हाँ लाइक करना बिल्कुल मत भूलियेगा। ं ै

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