अष्टक वर्ग फलित

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अष्टकवर्ग फलित
अष्टकवर्ग फलित

भारतीय ज्योतिष मेंअष्टक वर्ग एक प्रकार से अंक ज्योतिष का ही दूसरा रूप है. अष्टक वर्ग फलित का वर्णन बहुत ही दिलचस्प रूप में प्रस्तुत कर रहे है.

कुण्डली में बारह भावों की बारह राशियों में स्थित नवों ग्रह मिल कर किस प्रकार का फल जातक को प्रदान करते है यहाँ अष्टक वर्ग फलितमें बताया गया है .

अष्टक वर्ग फलित

यदि किसी भाव में किसी ग्रह कों केवल एक से तीन शुभ रेखाएं ही मिली हों तों मान कर चलिए उस राशि में स्थित ग्रह का फल शुभ नहीं होगा।

यदि चार से अधिक रेखाएं मिली हों तों फल मिश्रित होगा।

यदि 5 से 7 रेखाएं पड़ी हों तों उस राशिगत भाव का फल अच्छा होता है।

यदि 8 रेखाएं मिल जाए तो फिर फल ऐसा समझिये जैसे ग्रह उच्च का हो कर बैठा है। यानि उत्तमोत्तम।

इसी प्रकार से कुंडली में किसी राशि में एक,दो या तीन रेखा पड़ती है तो वह ग्रह उस राशि में अनेक प्रकार के रोग दु‘ख भय एवं कष्ट प्रदान करता है।

उपरोक्त फलों की प्राप्ति का समय विशंेष कर गोचर के दौरान ही देखने में आता है।

उदाहरण स्वरूप यदि सूर्य वृश्चिक राशि में जाएगा तो जातक को उस भाव का फल अच्छा नहीं होगा। यदि वह ग्रह गोचर के अनुसार उस राशि में जाता है। जिसमें 5,6 या 7 रेखाएं हों तो उत्तम फल होता है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के गोचर फलों को भी तारतम्यानुसार समझ लेना चाहिए।

पुरातन ज्योतिष कारों ने यहां तक कहा हैं कि यदि ग्रह गोचर के समय में उच्च स्थानगत क्यों न हों, मित्र गृही क्यों न हों पर यदि उस राशि में उचित संख्या में रेखाएं न हों तो फल अच्छा नहीं होता है।

उचित यानि 4 से अधिक रेखाएं। फिर अगर ग्रह गोचर में नीच राशि गत क्यों ने हों जाए, शत्रु राशि गत क्यों न हो जाए बुरे भावों में क्यों न हो जाए ( 6-8-12 भाव) लेकिन यदि उस राशि में रेखाएं 4 से अधिक हैं तो फल उत्तम ही होगा।

सूर्य अष्टक वर्ग से पिता का विचार होता है। जिस राशि में सूर्य बैठा हो उसको पिता का ग्रह कहते हैं। यदि जन्म में सूर्य लग्न में हो तो अनुमान कर लेना चाहिए कि यदि रेखाएं 4 से कम हैं तो पिता की स्थिति खराब ही होगी। और यदि 4 चार से अधिक है तो पिता की स्थिति अच्छी होगी।

यदि सूर्य कंेद्रिय घरों में हो और तीन से पांच रेखाए सूर्य को मिलें तो मान कर चलिए कि जातक के पिता को जातक की उम्र के 17 वें साल में पिता को कष्ट होगा।

यदि राहू 9वें भाव में हो और सूर्य को पंचम भाव में रहते हुए 8 रेखाएं मिले तो पिता की मृत्यु जातक के बचपन में ही हो जाती है।

सूर्य केंद्रिय भावों में 3से 7 रेखाएं लेकर धनु या मीन राशि में गुरू के साथ हो और गुरू मध्य द्रेष्काण में हो तो ऐसे जातक का पिता भारी भूसम्पत्ति शाली होता है।

सूर्य केंद्र में 5 रेखाओं के साथ शनि, बुध और चंद्र के साथ हो तो जातक के पिता को 10 वर्ष की आयु के बाद संपत्ति प्राप्त होती है।

यदि रवि अष्टक वर्ग में किसी भाव में 0 रेखा हो तो उस मास में जातक को कोई शुभ काम यथा शादी, व्यवसाय आरम्भ नहीं करना चाहिए।

चन्द्र का अष्टक वर्ग फलित

चंद्रमा से चैथे स्थान से माता, मकान गांव का विचार किया जाता है।

चंद्रमा यदि लग्न में 1से 3 रेखाओं के साथ दो या तीन ग्रहों के साथ बैठा हेा तो जातक निर्बल बीमारियों से ग्रस्त होता है।साथ ही जातक की आयु भी 50 वर्ष से कम होती है।

चार से कम रेखाएं लेकर चंद्र यदि लग्न में हो तो जातक को दमें की बीमारी होती है।

केद्र स्थित चंद्रमा को यदि 8 रेखाएं मिली हो तो वह विद्वान, धनी, माननीय, बली एवं राजाओं जैसा होता है।

यदि चंद्रमा 7,8 या12वें भाव में तीन से कम रेखाएं लेकर बैठा है तो माता या तो बचपन में ही मर जाती हैं या आजन्म रोगिणी रहती है।

मंगल का अष्टक वर्ग फलित

मंगल जिस भाव में होता हैं उससे तीसरा घर भाई का होता है।

मंगल 8 अंक लेकर जिस राशि में बैठा होता है समझना चाहिए वह जमींदार होता है।यदि 1,2,10 घरों में 8 अंक लेंकर बैठा है तो सम्राट तुल्य होता है।ठीक इसी प्रकार 1,4,9,10 में मंगल 8 अंक लेकर बैठा हेा तो लक्ष्शाधीश तो कम से कम होता ही है।

केंद्र स्थित मंगल 4 रेखाएं लेकर 1-5-8-9-10 राशियों में बैठा होता है तो जातक की आर्थिक स्थिति मतबूत होती है।

यदि मंगल द्वितीयेश होकर 6 छठे स्थान में 6 रेखाएं लेकर बैठा होता है जातक के शत्रुओं की संख्या अधिक होती है।एवं व्याभिचारी होता है।

6,8,12 घरों मंे मंगल चंद्र के साथ नीच या अस्त 6 रखाएं लेकर बैठा हो तो जातक का भाई नहीं होता।

मंगल तीसरे स्थान में 4 से अधिक रेखाएं लेकर बैठा हो तो जातक के कई भाई बहन होते हैं। वैसे यह किताबी भाषा लेकिन व्यावहारिक रूप से कहा जाएगा कि भाई बहन हेाते हैं।

मंगल शनि के साथ तीसरे स्थान में 4 से कम रेखा लेकर नीच या अस्त बैठा हो तो जातक के भाई बहनों के साथ दुर्घटनाएं होती हैं।देखांे कुंडली में
यदि मंगल पर अथवा मंगल स्थित राशि से पंचम और नवम पर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ती हो और मंगल स्थित राशि अथवा त्रिकोणस्थ राशि ‘नवम,पंचम’ पर जितनी रेखायें पड़ती हों तो उतनी ही संख्याएं जातक के भाई अथवा बहन की होती है।

यहां स्थित कंुडली में सिंह राशि में मंगल बैठा है। और सिंह से पंचम राशि धन और नवम राशि में है। सिंह पर किसी भी ग्रह की पूर्ण दृष्टि नहीं है, परन्तु धन पर बृहस्पिति की पूर्ण दृष्टि है तथा मेंष पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि है मंगल अंष्टक वर्ग में धन पर 4 रेखाएं हैं और मेष राशि पर एक रेखा है, अर्थात कुल 5 रेखाएं है। अतः इस जातक को सचमुच में 4 भाई थो औरएक बहन भी थी।

बुधअष्टक वर्ग-

यदि बुध लग्न से कंेद्र अथवा त्रिकोण में हो और उस पर 8 रेखाएंे पड़ती हों तों जातक ख्याती प्राप्त व्यवसाई होता है।

बुध स्थित स्थान से दूसरे स्थान में कोई रेखा न हेा तो जातक गुूंगा होता है। तीन रेखाएं हो तो बकवास करने वाला होता है। 4 से अधिक रेखाएं हों तो कुशल वक्ता होता है।

बुध से दूसरे स्थान में पाप ग्रह की रेखाएं पड़ती हों तो व्यक्ति व्यंग पूर्ण बाते करता है। यदि सूर्य की रेखाएं पड़ती हेा तो जातक बुद्धिमत्ता पूर्ण बाते करता है।

यदि बुध 6-8-12 भाव में 4 से कम रेखाएंु लेकर बैठा हो तो जातक आलसी एवं बुरी आदतों वाला होता है।

ब्ृाहस्पति का अष्टक वर्ग-

गुरू से संतान का विचार होता हैं और गुरू के पंचम स्थान से धर्म, धन, एवं पुत्र का विचार होता है।

गुरू के अष्टक वर्ग में जिस राशि में ज्यादा रेखाएं पड़ती हो यदि उस राशि में लग्न व हो तो चंद्र भ्रमण के समय गर्भाधान हेा तो पुत्र प्राप्ति होती है।

यदि गुरू को धन, मीन, या कर्क में 6 से अधिक रेखाएं पड़ती हों तो धन व स़्त्री से चिर काल तक सुखी रहता है। वाहन मकान यश की प्राप्ति होती है।

यदि चंद्र गुरू से छठे अथवा अष्टमस्थान में हो और गुरू के अष्टक वर्ग में चंद्र स्थित राशि पर ती या तीन से कम रेखाएं पड़ती हों तो जातक को राज योग रहने पर भी सर्वदा कर्ज युक्त रहना हेाता है।

त्रिकोणस्थ गुरू स्वक्षेत्री हेाकर 3 से कम रेखा लेकर बैठा है तो जातक के संतान की शीघ्र मृत्यु होती है।

गुरू स्थित राशि का स्वामी यदि 5 से अधिक रेखा लेकर गुरूवाष्टक वर्ग में होता है तो अच्छी आर्थिक स्थिति वाला हेाता है।

लग्नेश गुरू के साथ 3 से कम रेखा लेकर 8वें हो तो जातक आजन्म भाग्य हीन होता है।

पंचमेश गुरू के साथ या दृष्ट हो तो यदि उसे तीन से कम रेखाएं मिलती हों तो जातक की कोई एक संतान जातक से दुव्र्यवहार करती है।

गुरू और लग्न से नवमेश उच्च अथवा स्वगृही हों तथा वह केंद्र में हो और उन पर 4 से अधिक रेखाएं पड़ती हों तो जातक दण्डाधिकारी होता है। ‘दंड देने वाला’

गुरू अष्टक वर्ग की सबसे कम रेखाओं वाली राशि में जब शनि जाता है तो जातक को मृत्यु भय हेाता है।

-शुक्र अष्टक वर्ग का फल

शुक्र से स्त्री का विचार किया जाता है।

शुक्राष्टक वर्ग में सबसे कम राशि जहां सबसे कम रेखाएं हो उस दिशा में जातक अपना शयन करे तो पत्नि पति के वशीभूत रहती है।

क्ेंद्र अथवा कोण में 8 रेखाएं लेकर शुक्र बैठा हो तो सेना पति या वाहनाधिपति हेाता है। यदि नीच का शुक्र 6’-12-8 में होकर 4 से कम रेखा लेकर बैठा हेा तो राजयोगों को नष्ट कर देता है।

शुक्र कंेद्र में या त्रिकोण में होकर मंगल से दृष्ट ना हो और 4 से अधिक रेखा लेकर बैठा हो तो जातक का विवाह कम अवस्था में होता है।

यदि शुक्र मकर अथवा कुंभ में होकर मंगल से दृष्ट हेा तथा तीन से कम रेखाएं मिली हेां तो जातक की स्त्रि खराब स्वभाव की होती है।

शनिअष्टक वर्ग के फल-

शनि से अष्टम स्थान मृत्यु स्थान कहलाता है।

लग्न से लेकर शनि पर्यन्त जहां भी शनि बैठा हो उन रेखाओं को जोड़े उस वर्ष में जातक को बीमारी होती है। और शनि से लेकर लग्न तक शनि अष्टक वर्ग की रेखाओं को जोड़ कर योग को देखंे उस वर्ष में जातक को राग,मृत्यु,धन ़क्षय बाहर अन्य स्थान में गमन हेाता है।

लग्न से शनि और शनि से लग्न तक की रखाओं को उनको 7 से गुण करके 27 से भाग दें जो शेष रहे उस संख्यक ऩक्षत्र में जब गोचर का शनि आता है तो सुख एवं धन की हानि होती है।

उदाहरण कंुडली मे शनि लग्न में हैं इस कारण लग्न में जितनी रेखाएं हों अर्थात 2 उस को 2 से गुण कर के 14 से भाग नहीं देना पड़ेगा इस कारण चैदहवां नक्षत्र अर्थाात चित्रा नक्षत्र में जब गोचर का शनि आएगा तो जातक को सुख एंव धन की हानि होगी।

शनि अष्टक वर्ग में रेखा हीन राशि में शनि के जाने पर जातक की मृत्यु अथवा धन की हानि होती है।

इसके आगे अन्य विवरण में न जाकर केवल इतना जान लेना चाहिए कि जिस भाव में और जिस ग्रह के वर्ग में 4 रेखाओं से अधिक हैं तो वह ग्रह शुभ और वह राशि भी शुभ अवस्था में होती है। इसके उलट अशुभ अवस्था हेाती है।

आगे हम पाठकों एकाधिपत्य शोधन और त्रिकोण शोधन जैसे विचार पद्धतियों से अवगत नहीं कराना चाहता हूँ क्योकि एक तो यह बेहद टाइम खराब करने वाली चीज है और मेरे स्वयं के अनुभव के अनुसार भी इनका कोई औचित्य नहीं निकला है।

आगे की पद्धतियों के संबंध में पुराने ग्रंथकार स्वयं भी भ्रमित थे। कि कोन सी पद्धति को ठीक ठहराया जाए।

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