अशुभ ग्रहो से शुभ फल

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अशुभ ग्रहो के शुभ फल
अशुभ ग्रहो के शुभ फल


कभी कभी (पाप ग्रहो) अशुभ ग्रहो से शुभ फल प्राप्त हो जाते है, बुरे से बुरे व्यक्ति भी बुरे काम छोड़ कर समाज सेवा करने लग जाते हैं

ठीक इसी प्रकार ग्रह भी जो कि बुरे स्थानों के स्वामी होते हैं अच्छे योग देने लग जाते हैं। जी हाँ, ऐसा ही होता है छठे आठवें और बारहवें भावाधिपतियों के द्वारा। तो आइये जानते हैं ऐसा कैसे होता है।

अशुभ ग्रहो से शुभ फल

दान-पुन्य के फल
दान-पुन्य के फल

जिनकी कुंडली में आठवें भाव का स्वामी बारहवें या छठे भाव में या बारहवें भाव का स्वामी आठवें या छठे भाव में या छठे भाव का स्वामी आठवे या बारहवे भाव में या ये तीनो ही आपस में स्थान परिवर्तन कर लें या ये तीनों ही आपस में इन्हीं तीनों भावों में इकट्ठे साथ साथ बैठ जाए या ये अपने अपने घरों में बिना किसी और भाव या ग्रह स्वामी की दृष्टि से बचते हुए बैठ जाए। लेकिन शर्त यही है कि इन पर किसी भी परिस्थिति में सिवाए इनकी आपस में दृष्टि के अलावा किसी ओर ग्रह की दृष्टी नहीं पड़नी चाहिए।तो समझिये कि राजयोग आ गया है।

किसी भी जन्म पत्रिका में षष्ठ, अष्टम, और व्यय, ये तीन भाव अपना एक विशेष महत्त्व रखते हैं।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण

यद्यपि फलित के दृष्टि कोण से उपरोक्त तीनों भाव दुखदायक कहलाते हैं, परन्तु ‘उत्तर कालामृत’ ग्रन्थ में लिखा हैं कि इनमें इनके स्वामी ग्रहों की उचित स्थिति एवं समागम से वह दुखस्थान भी प्रबल राजयोग कारक हो जाते हैं।

इसमें भी स्मरण रखने की बात यह है कि यदि इन तीन स्थानों के स्वामियों के साथ कोई दूसरा ग्रह बैठा हो अथवा उन पर किसी अन्य भावेश की दृष्टि हो तो यह राजयोग भंग हो जाता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य नृपति प्रतापी बड़े ऐश्वर्य से युक्त राजाधिराज होता है।

स्पष्टीकरण –

उपरोक्त योग का स्पष्ट रहस्य मुझे यह प्रतीत होता है कि दुखस्थानों के स्वामी ग्रह अन्य भावेशों से सम्बन्ध रहित होकर इन्हीं तीन स्थानों में बैठ जाए तो साधारण नियमानुसार ‘‘जहर जहर को मारता है’’ जैसे अनिष्ट फलों का नाश होता है। अर्थात अनिष्ट प्रभाव के नाश का अर्थ सर्वसुख है, जिसको दूसरे शब्दों में राजयोग कह सकते हैं।
अशुभ ग्रहो से शुभ फल

यहा इस कुंडली वाले को अचानक राज्यलाभ हुआ था देखिए यहाँ दुखस्थानों पर न तो किसी ग्रह की पूर्ण दृष्टि है और न ही कोई दूसरा ग्रह इनके साथ है। अष्टमस्थ शुक्र पर द्वादश स्वामी शनि की ही दृष्टि है। राज्य लाभ के बाद इन्हें बड़ा महल आदि संपत्ति का भी लाभ हुआ था जो चतुर्थेश बुध के उच्चस्थ होकर केंद्र में पड़ने और फिर भाग्येश मंगल की चतुर्थ स्थान पर दृष्टि से यह अचल सम्पत्ति का लाभ होना स्वाभाविक ही था।


नोट- जन्म में नीचगत जो ग्रह हो उस ग्रह का नीच राशीश और उच्च राशीश जो ग्रह हो वह दोनों वा एक केन्द्रस्थ हो तो राजाओं में सम्मानित राजा होता है। (यहाँ चक्रवर्ती पद योग प्रशंसापरक है।) क्षेत्राधिपो लभेद ग्रामं ग्रामेशो नगर लभेत। नगरेशी लभेद्देशं देशेशो राज्यमाप्नुयात।

राजभंगयोग

जन्म समय से समस्त राजयोगप्रद ग्रह यदि नीच राशि गत ग्रह से वा शत्रुग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो राजयोगजनित फल को नहीं देते एवं परमं नीचांश जैसे तुंला में सूर्य 10 अंश का हो तो, या शुक्र, गुरू चंद्रमा हो तो राजयोग भंग भी करते हैं।
हमें हर प्रकार की परिस्थितियों को ध्यान में रख कर ही फला देश की ओर बढ़ना चाहिए।

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