अपनी कुंडली कैसे देखें

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ज्योतिष   में कितने  सब्जेक्ट?
ज्योतिष में कितने सब्जेक्ट?

कोई ज्ररूरी नही की कुंडली सिर्फ ज्योतिषी ही देखेंगे आप भी “अपनी कुंडली कैसे देखें” में इसे जानने का तरीका हम से सीख सकते है.

दोस्तो कुण्डली पर विचार करना एक बेहद सूक्ष्म और कठिन वि’षय है। अपनी कुंडली कैसे देखेंयह एक बहुत ही कठिन और लाभ प्रद विज्ञान है और आसानी से इसे सीखने की आशा नहीं की जा सकती। एक सही ज्योतिष बनने के लिए काफी प्रयास एकाग्रता और अंतर्ज्ञान की आवश्याकता होती है। इस विषय पर बेहद सावधानी और तत्परता दिखानी होती है वर्ना आपके सामने बैठे व्यक्ति पर इसका उपहासात्मक प्रभाव पड़ता है।

दक्षता (अपनी कुंडली कैसे देखें)

यदि हम कुंडली विचार में पारंगत है तो हमारे ज्ञान में कुछ भी कठिन नहीं है सिवाए यह बताने के कि किस घटना और परिस्थिति में कोई योग क्या फल देगा। उदाहरण के तौर पर यदि लग्न में सूर्य और शनि हो तो उससे पतन रोग, परिस्थिति जन्य कष्ट और धन हानि के संकेत के मिलते हैं। क्योंकि यहां एक दूसरे की धुर विरोधी शक्तियाॅ संयुक्त हो रही हैं।

इसी प्रकार और स्पष्ट करने के लिए चौथा भाव लेते हैं। यह भाव माँ शिक्षा भूमि भवन सम्पत्ति के लिए होता है। एक अशिक्षित व्यक्ति के पास बहुत से मकान हो सकते हैं जबकि एक शिक्षित के पास कुछ भी नहीं हो सकता है। तो संकेत यही मिलता है कि इस भाव का स्वामी, दर्शी (देखने वाला) भाव स्थित ग्रह किस किस प्रकार के प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं। वैसे भाव स्वामी के बली होने से (नवमांश में भी)से भाव के विषयों के सकारात्मकता के संकेत मिलते हैं।

अपनी कुंडली कैसे देखें

भारत में अनेक प्रख्यात वैज्ञानिक और विद्वान बातचीत में स्वीकार करते हैं कि ज्योतिष का आधार तर्क संगत है किंतु वे सार्वजनिक रूप से ऐसी घोषणा करने से कतराते हैं क्योंकि दकियानूसी वैज्ञानिकों ने कभी ज्योतिष को स्वीकारा ही नहीं।

प्राचीन काल के हमारी ज्योतिष वैज्ञानिको जिन्हें महर्षि भी कहते हैं की आत्मा काफी विकसित थी। उन्होने अपनी दिव्य दृष्टि से खगोलिय पूर्व आभासों का अध्ययन किया ओर इस नतीजे पर पहुंचे कि खागोलिय पिंड मानव जीवन पर अपना प्रभाव दिखाते है।

ग्रन्थ से (अपनी कुंडली कैसे देखें)

कभी कभी ऐसा होता है कि ज्योतिष की पुस्तकों में दिये गए अधिकतर सिंद्धांत वास्तविक चार्ट में दृष्टिगोचर नहीं होते हैं ऐसी परिस्थिति में कुंडली कैसे देखें का सिधान्तअसंगत हो जाता है । कोई भी व्यक्ति दृढ़ता पूर्वक यह नहीं कह सकता कि मानव जीवन की कोई विशेष घटना जन्म कुंडली के किसी विशेष भाव के कारण क्यों होती है। उदाहरण के तौर पर लग्न शरीर का व चोथा भाव माँ का द्योतक है इस बंटवारे का मूलाधार अब भी एक रहस्य है।

एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (अपनी कुंडली कैसे देखें)

किसी भाव पर विचार करते समय उस भाव की राशि ही नहीं नवमांश पर भी पर भी विचार करना चाहिए।

उस भाव स्वामी के बल, दृष्टि , युक्ति और स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
उस भाव के बल पर ध्यान देना चाहिए।

उस भाव उसके स्वामी और उसमें स्थित या उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रहों के प्राकृतिक गुण।
किसी भाव विशेष में बनने वाले योग का प्रभाव

भाव स्वामी की उच्च नीच उदय अस्त स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
भाव स्वामी जिस भाव में है उस भाव स्वामी की नवांश में क्या स्थिति है को भी ध्यान में रखना होता है।

जातक की आयु स्थिति पद और लिंग का ध्यान रखा जाना चाहिए।
प्रत्येक लग्न राशि के लिए कुछ ग्रह उत्तम कुछ खराब होते हैं। मेश लग्न के लिए सूर्य उत्तम है। सूर्य और मंगल की स्थिति पर विचार करना चाहिए।

ग्रहों के अच्छे और बुरे होने संबंधि गुणों पर विचार करना चाहिए। भाव स्वामी और भाव की अच्छी और बुरी स्थिति का विचार करना चाहिए। जैसे कि लग्न का स्वामी कमजोर होकर सातवे भाव में स्थित हो और साथ ही क्रूर ग्रहों की दृष्टि है तो इस योग में जातक की अनेक पत्नियाॅ हो सकती हैैं।उस स्वामी की दशा भुक्ति के दौरान पत्निी की मृत्यु की भविष्य वाणी की जा सकती है।

कुंडली (अपनी कुंडली कैसे देखें)

दी गई कुंडली में शुक्र की दशा 12वर्ष 3मास 9 दिन शेष थी। (क) सूर्य और बुध (सू और बु चतुर्थ और पंचम अधिपति) की दशम में युक्ति से राज योग बनता है। यह इतना शक्ति वान योग नहीं है जितना कि अगला, क्योकि अष्टम और एकादश भाव के स्वामी गुरू के साथ युक्ति से यह योग खराब हो गया है।(ख) इसमें शनि योग कारक है क्योंकि वह नवम और दषम भाव का स्वामी होकर दूसरे भाव में बैठा है।

(क)लग्न में गुरू और मंगल की युक्ति से राज योग बनता है। (ख) मंगल स्वयं ही योग कारक है क्योंकि वह चतुर्थ और नवम का स्वामी है।

कुंडली में क्रूर ग्रह और क्रूर स्वामियों की पहचान

1.तीसरे छठे और एकादश भावों के स्वामी सदा क्रूर होते हैं। (2.) 4-7-10 के स्वामी तटस्थ होते हैं अच्छे हों तो बुरे नहीं होते हैं और बुरे हों तो बुरे नहीं होते हैं। स्वग्रही सदैव शुभ होते हैे। पुनः क्रूर में एकादश का स्वामी सदैव सबसे खराब होता है। शष्ठ भाव का स्वामी क्रूर होता है। जबकि तीसरे भाव का स्वामी कम क्रूर होता है।

कुंडली के तटस्थ ग्रह

चंद्रमा यदि वह लग्न का स्वामी हो। सूर्य या चंद्रमा अष्टम भाव के स्वामी के रूप में। सूर्य और चंद्रमा द्वितीय और द्वादष भाव के स्वामी के रूप में। इस प्रकार कुण्डली में बली निर्बल और अन्य विषेशताओं का संबद्ध करने में अति सावधानी बरतनी चाहिए।

कोई भी ग्रह योग कारक बन सकता है यदि वह दो भावों का मिला जुला स्वामी हो। कंेद्र और त्रिकोण का स्वामी योग कारक होता है। यह केवल मंगल शनि और शुक्र के लिए ही संभव होगा।
जब केंद्र पति और त्रिकोण पति की युक्ति होती है तब राजयोग बनता है। लेकिन इन दोनों के बीच किसी अन्य भाव का स्वामी न हो या 6-8-12 के स्वामी साथ न हों। यह देखना चाहिए कि नवम और दशम भाव के स्वामियों की युक्ति से प्रबल राजयोग बनता है।

उपसंहार अपनी कुंडली कैसे देखें

योगों तथा कुंडली के सामान्य स्वरूप की जांच करने में लग्न या चंद्रमा मे से जो भी बली हो वहां से आरम्भ करना चाहिए।

उपरोक्त परिस्थितियों से इतर भी अनेक योग बनते हैं। गुरू चंद्र की परस्पर दृष्टि अथवा स्थान परिवर्तन से भी प्रसिद्धि और मानसम्मान मिलेगा। योग बनाने वाले ग्रह यदि आपस में 12 डिग्री के भीतर हों या दृष्टि हो तो प्रबल योग बनता है।

तो आपनंे देखा कि किस प्रकार से किस प्रकार हमें ग्रहों के योगों दृश्टि स्थान परिवर्तन आदि का ध्यान रखते हुए कुंडली का धैर्य पूर्वक विष्लेशण करना चाहिए।

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अपनी कुंडली स्वयं बनाओ

बनी हुई कुंडली को देखन या कंप्यूटर से कुंडली बनाना एक ही बात है लेकिन अपनी कुंडली बनाओ इसको यहाँ बताना हमारा उद्देश्य है.